संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीनगर त्रिपुरा सप्त कक्षा वर्णन ] [ ४५६
सन्तानवाटिकापालो ग्रीष्मर्तु स्तीक्ष्णलोचनः । ललिताकिङ्करो नित्यं तस्यास्त्वाज्ञाप्रवर्तकः ॥२४॥ शुक्रश्रीश्च शुचिश्रीश्च तस्य भार्ये उभे स्मृते । हरिचन्दनवाटी तु मुने वर्षर्तु ना स्थिता ॥२५॥ स वर्षर्तु र्महातेजा विद्युत्पिङ्गललोचनः । वज्राट्टहासमुखरो मत्तजीमूतवाहनः ॥२६॥ जीमूतकवचच्छन्नो मणिकार्मुकधारकः । ललितापूजनध्यानजपस्तोत्रपरायणः ॥२७॥ वर्तते विन्ध्यमथन त्रैलोक्याह्लाददायकः । नभःश्रीश्च नभस्यश्रीः स्वरस्वारस्वमालिनी ॥२८॥
यह वसन्त ऋतु पुष्पों के आसन पर विराजमान और पुष्पों की माध्वी के मद से अरुण वर्ण वाला है । इसके आयुध भी कुसुमों के ही हैं तथा पुष्प ही भूषणों वाला और पुष्पों के छत्र की भूषा वाला है ।२२। मधु श्री और माधव श्री—ये दो देवियाँ उसकी दीप्त हैं । ये दोनों ही पुष्पों की मदिरा से मत्त हैं और प्रसून शर (कामदेव) की लालसा वाली हैं ।२३। सन्तान वाटिका का पालक ग्रीष्म ऋतु है जिसके लोचन बहुत तीक्ष्ण हैं । यह भी श्रीललिता देवी का सेवक नित्य ही रहता है तथा उसकी आज्ञा का प्रवर्तक है ।२४। शुक्र श्री और शुचि श्री—ये दो उसकी भार्याएँ हैं । हे मुने ! वर्षा ऋतु हरिचन्दन वाटिका में स्थित रहा करती है ।२५। वह वर्षा ऋतु महान् तेज से युक्त हैं और विद्युत् के सदृश उसके पिङ्गल लोचन हैं। यह वज्रपात के समान अट्टहास से शब्दायमान हैं तथा मेघ ही इसका वाहन होता है ।२६। मेघों के कवच से यह ढका हुआ रहता है और मणियों के कार्मुक वाला है । यह भी ललिता देवी के अर्चन ध्यान और स्तोत्र पाठ में तत्पर रहा करता है ।२७। यह विन्ध्य मथन त्रैलोक्य के आह्लाद का देने वाला है । नभः श्री—नभस्य श्री स्वर स्वार स्वरमालिनी उसकी शक्तियाँ हैं ।२८।
अम्बा दुला निरलिश्वाभ्रयन्ती मेघप्रंत्रिका । वर्षयन्ती चिबुणिका वारिधारा च शक्तयः ॥२९॥