भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४५८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

एताः षोडश पत्राब्जवासिन्यः शक्तयः स्मृताः । इद्वत्सरा ततश्चेन्दुवत्सरावत्सरेऽपि च ॥१६॥ तिथिवारांश्च नक्षत्रं योगांश्च करणानि च । एतास्तु शक्तयो नागपत्रांभोरुहसंस्थिताः ॥१७॥ कलिः कल्पा च कलना काली चेति चतुष्टयम् । द्वारपालकतां प्राप्तं कालचक्रस्य भास्वतः ॥१८॥ एता महाकालदेव्यो मदप्रहसिताननाः । मदिरापूर्णचषकमशेषं चारुणप्रभम् । दधानाः श्यामलाकाराः सर्वाः कालस्य योषितः ॥१९॥ ललितापूजनध्यानजपस्तोत्रपरायणाः । निषेवन्ते महाकालं कालचक्रासनस्थितम् ॥२०॥ अथ कल्पकवट्यास्तु रक्षकः कुम्भसम्भव । वसन्तर्तुर्महातेजा ललिताप्रियकिङ्करः ॥२१॥

कृष्णपक्ष—अयन—विषुवा और—त्रयोदशी—सम्वत्सरा परि वत्सरा इडा वत्सरा ।१५। ये सोलह पत्राब्ज वासिनी शक्तियां कही गयी हैं । इद्वत्सरा—इन्दुवत्सरा—तिथि—वत्सरा—तिथि—वार—नक्षत्र—योग—करण ये शक्तियां नाग पत्रांबु रुह में संस्थित रहती हैं ।१६-१७। कलि—कल्प—कलना—काली—ये चार भास्वात काल चक्र के द्वार पालता को प्राप्त होते हैं ।१८। ये महाकाल देवियां मद से प्रहसित मुखों वाली हैं । उनका चषक अर्थात् प्याला मदिरा से परिपूर्ण रहा करता है और उसकी प्रभा अरुण होती है । ये सब काल की स्त्रियाँ श्यामल आकार वाली हैं ।१९। ये कालचक्र के आसन पर स्थित होती हुई श्री ललितादेवी के ध्यान—पूजन जप और स्तोत्रों के पाठ में ही परायण रहती हैं और महाकाल की सेवा किया करती हैं ।२०। हे कुम्भसम्भव ! कल्पक वटी का रक्षक वसन्त ऋतु होता है जो महान् तेज से युक्त ललितादेवी का परम प्रिय किङ्कर है ।२१।

पुष्पसिंहासनासीनः पुष्पमाध्वीमदारुणः । पुष्पायुधः पुष्पभूषः पुष्पच्छत्रेण शोभितः ॥२२॥ मधुश्रीमर्धवश्रीश्च द्वे देव्यौ तस्य दीव्यतः । प्रसूनमदिरामत्तो प्रसून शरलालसे ॥२३॥

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