भारतकोश
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संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

४५८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

एताः षोडश पत्राब्जवासिन्यः शक्तयः स्मृताः । इद्वत्सरा ततश्चेन्दुवत्सरावत्सरेऽपि च ॥१६॥ तिथिवारांश्च नक्षत्रं योगांश्च करणानि च । एतास्तु शक्तयो नागपत्रांभोरुहसंस्थिताः ॥१७॥ कलिः कल्पा च कलना काली चेति चतुष्टयम् । द्वारपालकतां प्राप्तं कालचक्रस्य भास्वतः ॥१८॥ एता महाकालदेव्यो मदप्रहसिताननाः । मदिरापूर्णचषकमशेषं चारुणप्रभम् । दधानाः श्यामलाकाराः सर्वाः कालस्य योषितः ॥१९॥ ललितापूजनध्यानजपस्तोत्रपरायणाः । निषेवन्ते महाकालं कालचक्रासनस्थितम् ॥२०॥ अथ कल्पकवट्यास्तु रक्षकः कुम्भसम्भव । वसन्तर्तुर्महातेजा ललिताप्रियकिङ्करः ॥२१॥

कृष्णपक्ष—अयन—विषुवा और—त्रयोदशी—सम्वत्सरा परि वत्सरा इडा वत्सरा ।१५। ये सोलह पत्राब्ज वासिनी शक्तियां कही गयी हैं । इद्वत्सरा—इन्दुवत्सरा—तिथि—वत्सरा—तिथि—वार—नक्षत्र—योग—करण ये शक्तियां नाग पत्रांबु रुह में संस्थित रहती हैं ।१६-१७। कलि—कल्प—कलना—काली—ये चार भास्वात काल चक्र के द्वार पालता को प्राप्त होते हैं ।१८। ये महाकाल देवियां मद से प्रहसित मुखों वाली हैं । उनका चषक अर्थात् प्याला मदिरा से परिपूर्ण रहा करता है और उसकी प्रभा अरुण होती है । ये सब काल की स्त्रियाँ श्यामल आकार वाली हैं ।१९। ये कालचक्र के आसन पर स्थित होती हुई श्री ललितादेवी के ध्यान—पूजन जप और स्तोत्रों के पाठ में ही परायण रहती हैं और महाकाल की सेवा किया करती हैं ।२०। हे कुम्भसम्भव ! कल्पक वटी का रक्षक वसन्त ऋतु होता है जो महान् तेज से युक्त ललितादेवी का परम प्रिय किङ्कर है ।२१।

पुष्पसिंहासनासीनः पुष्पमाध्वीमदारुणः । पुष्पायुधः पुष्पभूषः पुष्पच्छत्रेण शोभितः ॥२२॥ मधुश्रीमर्धवश्रीश्च द्वे देव्यौ तस्य दीव्यतः । प्रसूनमदिरामत्तो प्रसून शरलालसे ॥२३॥

श्रीनगर त्रिपुरा सप्त कक्षा वर्णन ] [ ४५६

सन्तानवाटिकापालो ग्रीष्मर्तु स्तीक्ष्णलोचनः । ललिताकिङ्करो नित्यं तस्यास्त्वाज्ञाप्रवर्तकः ॥२४॥ शुक्रश्रीश्च शुचिश्रीश्च तस्य भार्ये उभे स्मृते । हरिचन्दनवाटी तु मुने वर्षर्तु ना स्थिता ॥२५॥ स वर्षर्तु र्महातेजा विद्युत्पिङ्गललोचनः । वज्राट्टहासमुखरो मत्तजीमूतवाहनः ॥२६॥ जीमूतकवचच्छन्नो मणिकार्मुकधारकः । ललितापूजनध्यानजपस्तोत्रपरायणः ॥२७॥ वर्तते विन्ध्यमथन त्रैलोक्याह्लाददायकः । नभःश्रीश्च नभस्यश्रीः स्वरस्वारस्वमालिनी ॥२८॥

यह वसन्त ऋतु पुष्पों के आसन पर विराजमान और पुष्पों की माध्वी के मद से अरुण वर्ण वाला है । इसके आयुध भी कुसुमों के ही हैं तथा पुष्प ही भूषणों वाला और पुष्पों के छत्र की भूषा वाला है ।२२। मधु श्री और माधव श्री—ये दो देवियाँ उसकी दीप्त हैं । ये दोनों ही पुष्पों की मदिरा से मत्त हैं और प्रसून शर (कामदेव) की लालसा वाली हैं ।२३। सन्तान वाटिका का पालक ग्रीष्म ऋतु है जिसके लोचन बहुत तीक्ष्ण हैं । यह भी श्रीललिता देवी का सेवक नित्य ही रहता है तथा उसकी आज्ञा का प्रवर्तक है ।२४। शुक्र श्री और शुचि श्री—ये दो उसकी भार्याएँ हैं । हे मुने ! वर्षा ऋतु हरिचन्दन वाटिका में स्थित रहा करती है ।२५। वह वर्षा ऋतु महान् तेज से युक्त हैं और विद्युत् के सदृश उसके पिङ्गल लोचन हैं। यह वज्रपात के समान अट्टहास से शब्दायमान हैं तथा मेघ ही इसका वाहन होता है ।२६। मेघों के कवच से यह ढका हुआ रहता है और मणियों के कार्मुक वाला है । यह भी ललिता देवी के अर्चन ध्यान और स्तोत्र पाठ में तत्पर रहा करता है ।२७। यह विन्ध्य मथन त्रैलोक्य के आह्लाद का देने वाला है । नभः श्री—नभस्य श्री स्वर स्वार स्वरमालिनी उसकी शक्तियाँ हैं ।२८।

अम्बा दुला निरलिश्वाभ्रयन्ती मेघप्रंत्रिका । वर्षयन्ती चिबुणिका वारिधारा च शक्तयः ॥२९॥

४६० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

वर्षंत्यो द्वादश प्रोक्ता मदारुणविलोचनाः । ताभिः समं स वर्षर्तुः शक्तिभिः परमेश्वरीम् ॥३०॥ सदैव संजपन्नास्ते निजोत्थैः पुष्पमंडलैः । ललिताभक्तदेशांस्तु भूषयन्स्वस्य सम्पदा ॥३१॥ तद्वैरिणां तु वसुधामनावृष्ट्या निपीडयन् । वर्तते सततं देवकिङ्करो जलदागमः ॥३२॥ मन्दारवाटिकायां तु सदा शरहतुर्वसन् । तां कक्षां रक्षति श्रीमांल्लोकचित्तप्रसादनः ॥३३॥ इषश्रीश्च तथोर्जश्रीस्तस्यतौः प्राणनायिके । ताभ्यां संजहृतुस्तोयं निजोत्थैः पुष्पमंडलैः । अभ्यर्चयति साम्राज्ञीं श्रीकामेश्वरयोषितम् ॥३४॥ हेमन्तर्तुर्महातेजा हिमशीतलविग्रहः । सदा प्रसन्नवदनो ललिताप्रियकिङ्करः ॥३५॥

अम्बा—दुला—निरत्नि—अभ्रयन्ती—मेघयन्त्रिका—वर्षयन्ती—चिबु- णिका और वारिधारा—वर्षन्ती ये बारह जो महान् नेत्रों वाली हैं इसकी शक्तियां हैं ।२६। उस ऋतु की इष श्री और ऊर्ज श्री दो प्राण नाभिकाएं हैं। अपने उठाये हुए पुष्प मण्डलों से उन दोनों के द्वारा जल का भली-भांति हरण किया जाया करता था। श्री कामेश्वर ही योषित का जो महा साम्रस्तो थी ये अभ्यर्चन करती हैं। उन सबके साथ जो वर्षा ऋतु की शक्तियां हैं वे श्रम से उत्थित पुष्पमण्डलों से सदा ही सम्पन्न हैं। जो ललिता के भक्तों के देश हैं उन पर कृपा से सम्पदा के द्वारा भूषित किया करती हैं ।३०-३१। उनके शत्रुओं की वसुधा को अनावृष्टि से पीड़ित करता हुआ देवी का किङ्कर जलदागम वर्तमान रहता है ।३२। मन्दारों की वाटिका में सदा ही शरद ऋतु निवास किया करता है। वह श्रीमान् लोगों के चित्त को प्रसन्न करने वाला उस कक्षा की रक्षा करता है ।३२-३३। हेमन्त ऋतु हिमसे शीतल विग्रह वाला होता है। यह सदा ही प्रसन्न मुख वाला है ओर ललिता देवी का बहुत ही प्रिय किंकर है ।३४-३५।

श्रीनगर त्रिपुरा सप्त कक्षा वर्णन ] [ ४६१

निजोत्थैः पुष्पसंभारै रचयन्परमेश्वरीम् । पारिजातस्य वाटीं तु रक्षति ज्वलनार्दनः ॥३६ सहःश्रीश्च सहस्यश्रीस्तस्य द्वे योषिते शुभे । कदम्बवनवाट्यास्तु रक्षकः शिशिराकृतिः ॥३७ शिशिरर्तुर्मुनिश्श्रेष्ठ वर्तते कुम्भसम्भव । सा कक्ष्या तेन सर्वत्र शिशिरीकृतभूतला ॥३८ तद्वासिनी ततः श्यामा देवता शिशिराकृतिः । तपःश्रीश्च तपस्यश्रीस्तस्य द्वे योषिदुत्तमे । ताभ्यां सहार्चयत्यंबां ललितां विश्वपावनीम् ॥३९ अगस्त्य उवाच- गन्धर्ववदन श्रीमन्नानावृक्षादिसप्तकैः । प्रथमोद्यानपालस्तु महाकालो मया श्रितः ॥४० चतुरावरणं चक्रं त्वया तस्य प्रकीर्तितम् । षण्णामृतूनामन्येषां कल्पकोद्यानवाटिषु । पालकत्वं श्रुतं त्वत्तश्चक्रदेव्यस्तु न श्रुताः ॥४१ अत एव वसन्तादिचक्रावरणदेवताः । क्रमेण ब्रूहि भगवन्सर्वज्ञोऽसि यतो महान् ॥४२

अपने में समुत्पन्न कुसुमों के संभारों से यह परमेश्वरी की अर्चना किया करता है। ज्वलनार्दन यह पारिजात की वाटिका की सर्वदा रक्षा किया करता है ॥३६॥ सहः श्री और सहस्य श्री—ये दो परम शुभ उसकी पत्नियां हैं। उन अपनी उत्तम नारियों को साथ में लेकर यह विश्व पावनी अम्बा ललिता का समर्चन किया करता है। कदम्ब वन की वाटिका की शिशिराकृति रक्षा करता था ॥३७॥ हे मुनिश्रेष्ठ ! हे कुम्भ सम्भव ! यह शिशिर ऋतु है। वह सभी जगह कक्ष्या उसी से शीतल भूतल वाली है ॥३८॥ उसमें निवास करने वाली शिशिराकृति श्यामा देवता है। तपः श्री और तपस्य श्री ये दो उसकी उत्तम स्त्रियां हैं। उन दोनों के ही साथ वह विश्व-पावती ललिता देवी का अर्चन करता है ॥३९॥ अगस्त्यजी ने कहा—हे

४६२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

गन्धर्व वदन ! श्री सम्पन्न अनेक वृक्षों के सप्तक से प्रथमोद्यान का पालक महाकाल मयाश्रित है । चतुरशारण चक्र आपने उसका कीर्तित किया है । अन्यों का छै ऋतुएँ कल्पोद्यान वाटिकाओं में पाला है—यह भी सुना है और आप से चक्र की देवियाँ नही सुनी हैं ।४०-४१। अतएव वसन्त आदि चक्र के आवरण देवता आप क्रम से बताइए । क्योंकि आप तो महान सर्वज्ञ महापुरुष हैं ।४२।

हयग्रीव उवाच— आकर्णय मुनिश्रेष्ठ तत्तच्चक्रस्थदेवता ।।४३ कालचक्रं पुरा प्रोक्तं वासन्तं चक्रमुच्यते । त्रिकोणं पञ्चकोणं च नागच्छदसरोरुहम् । षोडशारं सरोजं च दशारद्वितयं पुनः ।।४४ चतुरस्रं च विज्ञेयं सप्तावरणसंयुतम् । तन्मध्ये बिन्दुचक्रस्थो वसन्तर्तु महाद्युतिः ।।४५ तदेकद्वयसंलग्ने मधुश्रीमाधवश्रियो । उभाभ्यां निजहस्ताभ्यामुभयोस्तनमेककम् ।।४६ निपीडयन्स्वहस्तस्य युगलेन ससौरभम् । सपुष्पमदिरापूर्णचषकं पिशितं वहन् ।।४७ एवमेव तु सर्वर्तुं ध्यानं विन्ध्यनिषूदन । वर्षर्तौस्तु पुनर्ध्याने शक्तिद्वितयमादिमम् । अंकस्थितं तु विज्ञेयं शक्तयोऽन्याः समीपगाः ।।४८ अथ वासन्तचक्रस्थदेवीः शृणु वदाम्यहम् । मधुशुक्लप्रथमिका मधुशुक्लद्वितीियका ।।४९

श्री हयग्रीवजी ने कहा—हे मुनिश्रेष्ठ ! आप उन-उन चक्रों में स्थित देवताओं को श्रवण कीजिए ।४३। पहिले हमने कालचक्र बता दिया है । अब वासन्त बताया जाता है । त्रिकोण पञ्चकोण नागच्छद सरोरुह है । सोलह आर हैं ऐसा सरोज है फिर चौबीस हैं ।४४। सात आवरणों से युक्त चतुरस्र जान लेना चाहिए । उसके मध्य में बिन्दुचक्र में स्थित महान् द्युति वाला

श्रीनगर त्रिपुरा सप्त कक्षा वर्णन ] | ४६३

वसन्त ऋतु है ।४५। उसके एक के साथ दो प्रियाएँ संलग्न रहती हैं जिनके नाम मधु श्री और माधव श्री हैं। दोनों के स्तनों को अपने एक-एक हाथ से ग्रहण किये हुए हैं ।४६। उन उरोजों को अपने दोनों हाथों से निपीडित करता है और सौरभ से समन्वित है। वह सौरभ वाली मदिरा पुष्पों से संयुक्त है उसका चषक भरा हुआ है और पिशित भी है इनका वहन कर रहा है ।४७। विन्ध्य निषूदन ! इस रीति से सब ऋतुओं का ध्यान करे । वर्षा ऋतु के ध्यान ये फिर दो शक्तियों आदि का ध्यान करे । जो उसके अङ्क में ही स्थित हैं तथा अन्य शक्तियाँ का उसके समीप में स्थित हैं ।४८। उसके अनन्तर अब उस वासन्त चक्र में जो देवियाँ वर्तमान रहती हैं उनको भी मैं आपको अभी बतलाता हूँ—आप उनका श्रवण कीजिए । मधु शुक्ला पहली है और मधु शुक्ल द्वितीय हैं ।४६।

मधुशुक्लतृतीया च मधुशुक्लचतुर्थिका ।
मधुशुक्ला पञ्चमी च मधुशुक्ला च षष्ठिका ॥५०॥
मधुशुक्ला सप्तमी च मधुशुक्लाष्टमी पुनः ।
नवमी मधुशुक्ला च दशमी मधुशुक्लिका ॥५१॥
मधुशुक्लैकादशी च द्वादशी मधुशुक्लतः ।
मधुशुक्लत्रयोदश्यां मधुशुक्ला चतुर्दशी ॥५२॥
मधुशुक्ला पौर्णमासी प्रथमा मधुकृष्णिका ।
मधुकृष्णा द्वितीया च तृतीया मधुकृष्णिका ॥५३॥
चतुर्थी मधुकृष्णा च मधुकृष्णा च पञ्चमी ।
षष्ठी तु मधुकृष्णा स्यात्सप्तमी मधुकृष्णतः ॥५४॥
मधुकृष्णाष्टमी चैव नवमी मधुकृष्णतः ।
दशमी मधुकृष्णा च विन्ध्यदर्पनिषूदन ॥५५॥
मधुकृष्णैकादशी तु द्वादशी मधुकृष्णतः ।
मधुकृष्णत्रयोदश्या मधुकृष्णचतुर्दशी ॥५६॥

मधुशुक्ल तृतीया है और मधुशुक्ल चतुर्थिका है। मधु शुक्ला पञ्चमी और मधुशुक्ल षष्ठिका है ।५०। मधुशुक्ला सप्तमी और फिर मधु-शुक्ला अष्टमी है 'नवमी मधुशुक्ला है ।५१। मधुशुक्ला एकादशी और

४६४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

द्वादशी मधुशुक्ल है मधु शुक्ल त्रयोदशीमें तथा मधुशुक्ला चतुर्दशी है ।५२। मधुशुक्ला पोर्णमासी और मधुकृष्णा प्रथमा है । मधुकृष्णा द्वितीया और तृतीया मधुकृष्णिका है ।५३। चतुर्थी मधुकृष्णा और मधुकृष्णा पञ्चमी । षष्ठी मधुकृष्णा और सप्तमी मधु कृष्ण से है ।५४। मधुकृष्णा अष्टमी मधुकृष्ण से नवमी है । हे विन्ध्यदर्प निषूषदन ! दशमी मधुकृष्णा है ।५५। मधुकृष्णा एकादशी है तथा द्वादशी मधु कृष्ण से है । मधु कृष्ण त्रयोदशी से है और मधु कृष्ण चतुर्दशी है ।५६।

मध्वमा चेति विज्ञेयास्त्रिंशदेतास्तु शक्तयः । एवमेव प्रकारेण माधवाख्यो परिस्थितिः ॥५७

शुक्लप्रतिपदाद्यास्तु शक्तयस्त्रिंशदन्यकाः । मिलित्वा षष्टिसंख्यास्तु ख्याता वासन्तशक्तयः ॥५८

स्वैःस्वैर्मन्त्रैस्तत्र चक्रे पूजनीया विधानतः । वासन्तचक्रराजस्य सप्तावरणभूमयः ॥५९

षष्टिः स्युर्देवतास्तासु षष्टिभूमिषु संस्थिताः । विभज्य चार्चनीयाः स्युस्तत्तन्मन्त्रैस्तु साधकैः ॥६०

तथा वासन्तचक्रं स्यात्तथैवान्येषु च त्रिषु । देवतास्तु परं भिन्नाः शुक्रशुच्यादिभेदतः ॥६१

शक्तयः षष्टिसंख्याता ग्रीष्मचक्रे महोदयाः । एवं वर्षादिके चक्रे भेदान्नभनभस्यजान् ॥६२

षष्टिषष्टिसु शक्तीना चक्रेचक्रे प्रतिष्ठिताः । ग्रन्थविस्तारभीत्या तु तत्संख्यानाद्विरम्यते ॥६३

मधु अमा है—ये तीस शक्तियाँ हैं । इसी प्रकार से माधवाख्य के ऊपर में स्थित हैं ।५७। शुक्ल प्रतिपदा आदिक अन्य तीस शक्तियाँ हैं । ये सब मिलकर वासन्त शक्तियाँ साठ विख्यात हैं ।५८। अपने-अपने मन्त्रों के द्वारा वहाँ चक्र में वासन्त चक्रराज में वासन्त चक्रराज की सात आवरण भूमियाँ विधि से पूजन करने के योग्य हैं ।५९। साठ भूमियों में ये साठ देवता संस्थित हैं । साधकों के द्वारा विभाग करके उन-उन मन्त्रों से पूजन करने के योग्य हैं ।६०। उसी भांति से वासन्त चक्र तीन अन्यों में है और

पुष्पराग प्रकारादि मुक्ताकार वर्णन ] | ४६५

शुक्र शुच्यादि के भेद से देवता भिन्न हैं ।६१। शक्तियाँ संख्या में साठ हैं जो महोदया ग्रीष्म चक्र में हैं । इसी तरह से वर्षादिक चक्र में भेद से नभन-भस्यज हैं ।६२। ये साठ-साठ शक्तियाँ प्रतिष्ठित हैं । ग्रन्थ के विस्तार से भय से उनकी संख्या करने से विराम लिया जा रहा है ।६३।

आर्तव्याः शक्तयस्त्वेता ललिताभक्त सौख्यदाः । ललितापूजनध्यानजपस्तोत्रपरायणाः ॥६४॥ कल्पादिवाटिकाचक्रे सञ्चरंत्यो मदालसाः । स्वस्वपुष्पोत्थमधुभिस्तर्पयंत्यो महेश्वरीम् ॥६५॥ मिलित्वा चैव संख्याताः षट्युत्तरशतत्रयम् । एवं सप्तसु शालेषु पालिकाश्चक्रदेवताः ॥६६॥ नामकीर्तनपूर्वं तु प्रोक्तस्तुभ्यं प्रपृच्छते । अन्येषामपि शालानामुपादानं तु पूरकम् । विस्तारं तत्र शक्तिं च कथयाम्यवधारय ॥६७॥

ये शक्तियाँ ललिता देवी के सौख्य के देने वाली हैं इनका आहरण करना चाहिए । जो भी ललिता के पूजन ध्यान जप और स्तोत्र में परायण हैं ।६४। कल्पादि वाटिका के चक्र में मदालसा ये सञ्चरण किया करती हैं । अपने-अपने पुष्पों के मधु से ये महेश्वरी का तर्पण किया करती हैं ।६५। सब मिलकर तीन सौ साठ होती हैं । इसी तरह से सात सालों में चक्र देवता पालिका हैं ।६६। आपने पूछा है तो आपके सामने नामों का कीर्तन कर दिया है । अन्य शालाओं का उपादान पूरक है । उनका विस्तार और शक्ति कहता हूँ, आप अवधारण कीजिए ।६७।

॥ पुष्पराग प्रकारादि मुक्ताकार वर्णन ॥

हयग्रीव उवाच- कथितं सप्तशालानां लक्षणं शिल्पिभिः कृतम् । अथ रत्नमयाः शालाः प्रकीर्त्यंतेऽवधारय ॥१॥ सुवर्णमयशालस्य पुष्परागमयस्य च । सप्तयोजनमात्रं स्यान्मध्येन्तरमुदाहृतम् ॥२॥

४६६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

तत्र सिद्धाः सिद्धनार्यः खेलंति मदविह्वलाः ।
रसै रसायनैश्चापि खड्गैः पादांजनैरपि ॥३
ललितायां भक्तियुक्तास्तर्पयन्तो महाजनान् ।
वसन्ति विविधास्तत्र पिबन्ति मदिरारसान् ॥४
पुष्परागादिशालानां पूर्ववद्द्वारक्लृप्तयः ।
पुष्परागादिशालेषु कवाटार्गलगोपुरम् ।
पुष्परागादिजं ज्ञेयमुच्चैन्द्रादित्यभास्वरम् ॥५
हेमप्राकारचक्रस्य पुष्परागमयस्य च ।
अन्तरे या स्थली सापि पुष्परागमयी स्मृता ॥६
वक्ष्यमाणमहाशालाकक्षासु निखिलास्वपि ।
तद्वर्णाः पक्षिणस्तत्र तद्वर्णानि सरांसि च ॥७

श्री हयग्रीवजी ने कहा—शिल्पियों के द्वारा निर्मित सप्त शालाओं का लक्षण बता दिया गया है । इसके अनन्तर रत्नों से परिपूर्ण शालायें अब कीर्त्तित की जाती है उनका आप अवधारण कीजिए ।१। सुवर्ण से परिपूर्ण शाल और पुष्प रोगों से परिपूर्ण शाल का जो मध्य में अन्तर है वह सात योजन मात्र कहा गया है ।२। वहाँ पर सिद्ध और मद से विह्वल सिद्धों की नारियाँ खेला करती हैं । उनकी क्रीड़ा के साधन रस-रसायन-खड्ग और पादाञ्जन होते हैं ।३। ये ललिता देवी में भक्ति से युक्त हैं और महाजनों का तर्पण किया करती हैं । वहाँ पर अनेक प्रकार के वास करते हैं और मदिरारस का पान किया करते हैं ।३। पुष्पराज आदि की जो शालाएँ हैं उनके द्वारों की रचनाएं पूर्व की ही भाँति हैं । पुष्प राग प्रभृति की शालों में कपाट अर्गला और गोपुर हैं । यह सभी पुष्प राग आदि से समुत्पन्न है तथा इन्दु और सूर्य के समान ही परम भास्वर हैं ।५। हेम के प्राकार वाले चक्र का और पुष्परागों से परिपूर्ण का जो अन्तर है उसमें जो स्थल है वह भी पुष्परागों से परिपूर्ण है ऐसा ही कहा गया है ।६। आगे कहे जाने वाली महा शालाओं की कक्षाओं में समस्तों में भी उनके ही वर्ण वाले सब पक्षी हैं और उनके ही वर्णों वाले सब सरोवर हैं ।७।

तद्वर्णसलिला नद्यस्तद्वर्णाश्च मणिद्रुमाः ।

पुष्पराग प्रकारादि मुक्ताकार वर्णन ] [ ४६७

सिद्धजातिषु ये देवीमुपास्य विविधैः क्रमैः । त्यक्तवन्तो वपुः पूर्वं ते सिद्धास्तत्र सांगनाः ॥८ ललितामन्त्रजप्तारो ललिताक्रमतत्पराः । ते सर्वे ललितादेव्या नामकीर्तनकारिणः ॥९ पुष्परागमहाशालांतरे मारुतयोजने । पद्मरागमयः शालश्चतुरस्रः समंततः ॥१० स्थली च पद्मरागाढ्या गोपुराद्यं च तन्मयम् । तत्र चारणदेशस्थाः पूर्वदेहविनाशतः । सिद्धिं प्राप्ता महाराज्ञीचरणाम्भोजसेवकाः ॥११ चारणीनां स्त्रियश्चापि चार्वंग्यो मदलालसाः । गायन्ति ललितादेव्या गीतिबन्धान्मुहुर्मुहुः ॥१२ तत्रैव कल्पवृक्षाणां मध्यस्थवेदिकास्थिताः । भर्तृभिः सहचारिण्यः पिबन्ति मधुरं मधु ॥१३ पद्मरागमहाशालान्तरे मरुतयोजने । गोमेदकमहाशालः पूर्वशालासमाकृतिः । अतितुङ्गो हीरशालस्तयोर्मध्ये च हीरभूः ॥१४

वहां की समस्त नदियाँ भी उसी के वर्ण वाली हैं तथा मणियों के वृक्ष भी उसी वर्णों वाले हैं। अनेक प्रकार के क्रमों से जो सिद्ध जातियों में देवी की उपासना करने वाले थे पूर्व शरीर को त्याग कर अङ्गनाओं के साथ ही थे ।८। वे सभी ललितादेवी के मन्त्र का जाप करने वाले और ललिता के ही क्रम में परायण थे । वे सभी ललितादेवी के नाम का कीर्त्तन करने वाले ही थे ।९। पुष्पराग के महाशाल के अन्तर में मारुत योजन में पद्मरागमय एक शाल है जो सभी ओर से चौकोर है ।१०। वहाँ की जो स्थली है वह भी पद्मरागों से संयुत है और गोपुर आदि भी उसी पद्मराग से परिपूर्ण है । वहो पर चारण देश में संस्थित होने वाले अपने देह के विनाश हो जाने से सिद्धि को प्राप्त हो गये हैं क्योंकि वे सभी महाराज्ञी के चरण कमलों के सेवक थे ।११। चारणों की स्त्रियाँ भी परम सुन्दर अङ्गों

४६८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

वाली हैं और मद से अलस । वे सभी ललितादेवी के गीत बन्धों को वार-बार गाया करती हैं ।१२। वहीं पर कल्प वृक्षों के मध्य में जो वेदिकाएं थीं उनमें संस्थित होकर अपने भक्तों के साथ सहचरण करती हुए मधू य मधु का पान किया करती हैं ।१३। पद्मरागों के महाशाल के मध्य में मारुत योजन में गोमेद को महाशाल है और उसका आकार प्रकार भी के पूर्व के ही समान है । अत्यन्त ऊँचा हीरों का पाल है और उन दोनों के मध्य में ही रत्नों की ही भूमि भी है ।१४।

तत्र देवीं समभ्यर्च्य पूर्वजन्मनि कुम्भज । वसन्त्यप्सरसां वृन्दैः साकं गन्धर्वपुङ्गवाः ॥१५ महाराज्ञीगुणगणान्गायन्तो वल्लकीस्वनैः । कामभोगैकरसिकाः कामसन्निभविग्रहाः । सुकुमारप्रकृतयः श्रीदेवीभक्तिशालिनः ॥१६ गोमेदकस्य शालस्तु पूर्वशालसमाकृतिः । तदन्तरे योगिनीनां भैरवाणां च कोटयः । कालसंकर्षणीमंबां सेवन्ते तत्र भक्तितः ॥१७ गोमेदकमहाशालान्तरे मारुतयोजने । उर्वशी मेनका चैव रम्भा चालंबुषा तथा ॥१८ मञ्जुघोषा सुकेशी च पूर्वचित्तिघृताचिका । कृतस्तला च विश्वाची पुञ्जिकस्थलया सह ॥१९ तिलोत्तमेति देवानां वेश्या एतादृशोऽपराः । गन्धर्वैः सह नव्यानि कल्पवृक्षमधूनि च ॥२० पिबन्त्यो ललितादेवीं ध्यायन्त्यश्च मुहुर्मुहुः । स्वसौभाग्यविवृद्धयर्थं गुणयन्त्यश्च तन्मनुम् ॥२१

हे कुम्भज ! वहां पर देवी की भली भांति अर्चना करके परम श्रेष्ठ गन्धर्वों का समूह अप्सराओं के समुदायों के ही साथ में निवास किया करते हैं ।१५। वे सब्र वल्लकी वाद्य के शब्दों से महाराज्ञी के गुणगणों का गायन किया करते हैं । ये काम भोग में बड़े रसिक हैं तथा कामदेव के ही समान

पुष्पराग प्रकाशादि मुक्ताकार वर्णन ] [ ४६६

शरीरों वाले परमाधिक सुन्दर हैं। ये श्री देवी की भक्ति करने वाले हैं और इनकी प्रकृतियां भी परम सुकुमार होती हैं। १६। गोमेदों का जो शाल है वह भी पहिले शाल के ही सदृश आकार वाला है। उसके मध्य में करोड़ों योगिनियां और भैरवों की श्रेणियां विद्यमान हैं वहां पर वे भक्तिभाव से काल संकर्षिणी अम्बा की सेवा किया करते हैं। १७। गोमेदक शाल के मध्य में बहुत सी प्रमुख परम सुन्दरी अप्सराएं रहा करती हैं जो कि मारुत योजन में हैं। उर्वशी-मेनका-रम्भा-अलम्बुषा-मन्जुघोषा-सुकेशी-पूर्वचित्ति-घृताचिका-विश्वाची और पुञ्जिका स्थला-ये सभी वहीं पर रहती हैं। १८-१९। देवों की वेश्या तिलोत्तमा भी है और ऐसी अनेक दूसरी भी हैं। वे सब गन्धर्वों के साथ में रहकर कल्प वृक्षों के मधुओं का पान किया करती हैं। २०। तथा ललिता देवी का ध्यान बार-बार करती हैं। सौभाग्य की वृद्धि के लिए ही उस देवी के मन्त्र का गुणन किया करती हैं। २१।

चतुर्दशसु चोत्पन्ना स्थानेष्वप्सरसोऽखिलाः ।
तत्रैव देवीमर्चन्त्यो वसन्ति मुदिताशयाः ॥२२

अगस्त्य उवाच-
चतुर्दशापि जन्मानि तासामप्सरसां विभो ।
कीर्तय त्वं महाप्राज्ञ सर्वविद्यामहानिधे ॥२३

हयग्रीव उवाच-
ब्राह्मणो हृदयं कामो मृत्युरुर्वी च मारुतः ।
तपनस्य कराश्चन्द्रकरो वेदाश्च पावकः ॥२४
सौदामिनी च पीयूषं दक्षकन्या जलं तथा ।
जन्मनः कारणान्येतान्यामनांति मनीषिणः ॥२५
गीर्वाणगण्यनारीणां स्फुरत्सौभाग्यसंपदाम् ।
एताः समस्ता गंधर्वैः सार्धमर्चति चक्रिणीम् ॥२६
किन्नराः सह नारीभिस्तथा किंपुरुषा मुने ।
स्त्रीभिः सह मदोन्मत्ता हीरकस्थलमाश्रिताः ॥२७

४७० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

महाराज्ञीमन्त्रजापैर्विधूताशेषकल्मषाः ।
नृत्यंतश्चैव गायंतो वर्तंते कुम्भसम्भव ॥२८

चौदह स्थानों में समस्त अप्सराएं समुत्पन्न हुई हैं। वहीं पर परमानन्द से सुसम्पन्न होकर देवी का अर्चन करती हुईं निवास किया करती हैं।२२। अगस्त्यजी ने कहा—हे विभो ! आप तो समस्त विद्याओं के निधि हैं। हे महाप्राज्ञ ! उन अप्सराओं के चौदहों जन्मों का आप वर्णन कीजिए।२३। श्री हयग्रीव ने कहा—ब्राह्मण—हृदय—काम—मृत्यु—उर्वी—मारुत-तपन के कर—चन्द्रकर—वेद—पावक—सौदामिनी—पीयूष—दक्ष कन्या-जल-ये ही मनीषी गण जन्म के कारण माना करते हैं।२४-२५। स्फुरित सौभाग्य की सम्पदा वाली देवगणों में मुख्यों की नारियों की ये समस्त गन्धर्वों के ही साथ में चक्रिणी की अर्चना किया करती हैं।२६। हे मुने ! अपनी नारियों के साथ किन्नर तथा किम्पुरुष अपनी स्त्रियों के सहित मद से उन्मत्त होते हुए उस हीरों के स्थल में आश्रम लिए हुए हैं।२७। हे कुम्भसम्भव ! महाराज्ञी के मन्त्र के जापों से समस्त कल्मषों को दूर कर देने वाले नृत्य करते हुए और गान करते हुए विद्यमान रहा करते हैं।२८।

तत्रैव हीरकक्षोण्यां वज्रा नाम नदी मुने ।
वज्राकारैर्निबिडिता भासमाना तटद्रुमैः ॥२९
वज्ररत्नेकसिकता वज्रद्रवमयोदका ।
सदा वहति सा सिंधुः परितस्तत्र पावनी ॥३०
ललितापरमेशान्यां भक्ता ये मानवोत्तमाः ।
ते तस्या उदकं पीत्वा वज्ररूपकलेवराः ।
दीर्घायुषश्च नीरोगा भवन्ति कलशोद्भव ॥३१
भंडासुरेण गलिते मुक्ते वज्रे शतक्रतुः ।
तस्यास्तीरे तपस्तेपे वज्रेशीं प्रति भक्तिमान् ॥३२
तज्जवलादुदिता देवी वज्रं दत्त्वा बलद्विषे ।
पुनरंतर्दधे सोऽपि कृतार्थः स्वर्गमेयिवान् ॥३३
अथ वज्राख्यशालस्यांतरे मारुतयोजने ।
वैदूर्यंशाल उत्तुंगः पूर्ववद्गोपुरान्वितः

पुष्पराग प्रकारादि मुक्ताकार वर्णन ] [ ४७१

स्थली च तत्र वैडूर्यनिर्मिता भास्वराकृतिः ॥३४ पातालवासिनो ये ये श्रीदेव्यर्चनसाधकाः । ते सिद्धमूर्त्तयस्तत्र वसन्ति सुखमेदुराः ॥३५

हे मुने ! वहीं पर हीरों की भूमि में एक वज्र नाम वाली नदी है। उसके तट पर जो द्रुम हैं वे वज्राकार हैं। उनसे वह निविड़ित है ऐसी ही भासमान होती है ।२६। वह नदी परम पावनी सदा ही बहती रहती है और सभी ओर उसका बहाव रहता है। उसका जल ही ऐसा प्रतीत होता है कि वज्रों से परिपूर्ण है तथा उसकी सिकता भी वज्र (हीरा) रत्नों का ही मुख्य भाग है ।३०। परमेशानी ललिता के जो मानव परम भक्त हैं वे ही उस नदी के जल का पान करके वज्र स्वरूप कलेवरों वाले हो जाया करते हैं। वे दीर्घ आयु वाले नीरोग हे कलशोद्भव ! हुआ करते हैं ।३१। भण्डासुर के द्वारा गलित और वज्र के मुक्त होने पर इन्द्रदेव ने वज्रेशी के चरणों में भक्ति भाव से उस नदी के तट पर तपश्चर्या की थी ।३२। उसके जल से समुदित हुई देवी ने इनके लिए वज्र दिया था। फिर वह अन्तर्हित हो गयी थीं और वह इन्द्र भी कृतार्थ होकर स्वर्ग को चला गया था ।३३। इसके अनन्तर वज्राख्य शाल के अन्तर में माहत योजन में ठीक बहुत ऊँचा वैदर्य शाल है और उसका भी गोपुर तथा द्वार पूर्व के ही समान है। वहाँ की स्थली भी वैदूर्यों से निर्मित है और उसकी आकृति परम भास्वर है ।३४। जो भी पाताल के निवासी श्री देवी के साधक प्राणी हैं वे ही सिद्ध मूर्ति वाले सुख से मेदुर होकर वहाँ पर निवास किया करते हैं ।३५।

शेषकर्कोटकमहापद्मवासुकिशंखकाः । तक्षकः शङ्खचूडश्च महादन्तो महाफणः ॥३६ इत्येवमादयस्तत्र नागानागस्त्रियोऽपि च । बलीन्द्रप्रमुखानां च दैत्यानां धर्मवर्तिनाम् । गणस्तत्र तथा नागैः सार्धं वसति सांगनाः ॥३७ ललितामन्त्रजप्तारो ललिताशास्त्रदीक्षिताः । ललितापूजका नित्यं वसन्त्यसुरभोगिनः ॥३८ तत्र वैडूर्यकक्षायां नद्यः शिशिरपायसः । सरांसि विमलांभांसि सारसालंकृतानि च ॥३६

४७२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

भवनानि तु दिव्यानि वैदूर्यमणिमन्ति च । तेषु क्रीडन्ति ते नागा असुराश्च सहांगनाः ॥४०॥ वैदूर्याख्यमहाशालान्तरे मारुतयोजने । इन्द्रनीपमयः शालश्चक्रवाल इवापरः ॥४१॥ तन्मध्यकक्षाभूमिश्च नीलरत्नमयी मुने । तत्र नद्यश्च मधुराः सरांसि शिशिराणि च । नानाविधानि भोग्यानि वस्तूनि सरसान्यपि ॥४२॥

शेष—कर्कोटक—महापद्म—वासुकि—शंखक—तक्षक—शंखचूड़—महादन्त—महाफण—इत्येवमादिक नाग वहाँ पर तथा उन नागों की स्त्रियाँ भी हैं और बलेन्द्र प्रभृती धर्मवर्ती दैत्यों का गण भी अपनी अङ्गनाओं के साथ वहाँ पर नागों के सहित वास किया करते हैं ।३६-३७। ये सभी ललिता देवी के शास्त्र में दीक्षित हैं और ललिता देवी की पूजा करने वाले वहाँ पर निवास किया करते हैं ।३८। वहाँ पर वैदूर्य मणियों की कक्षा में नदियाँ भी शिशिर जलों वाली हैं । सरोवर भी विमल जलों वाले तथा सारस पक्षियों से विभूषित हैं ।३६। वहाँ पर जो भवन हैं वे परम दिव्य हैं तथा वैदूर्यमणियों के ही द्वारा निर्मित हैं । उन भवनों में नागों के समुदाय और अपनी अङ्गनाओं के साथ लेकर असुरगण क्रीड़ा किया करते हैं ।४०। वैदूर्याख्य महाशाल के अन्तर में मारुत योजन में एक इन्द्रनील मणियों से परिपूर्ण-दूसरे चक्रवाल के ही तुल्य शाल है ।४१। उसके मध्य की कक्षा की भूमि भी हे मुने ! नील रत्नमयी है और वहाँ पर नदियाँ मधुर हैं और सरोवर भी शिशिर हैं । वहाँ पर अनेक प्रकार की परम दिव्य एवं सरस भोगने के योग्य वस्तुएँ भी हैं ।४२।

ये भूलोकगता मर्त्या ललितामन्त्रसाधकाः । ते देहान्ते शक्रनीलकक्षां प्राप्य वसन्ति वै ॥४३॥ तत्र दिव्यानि वस्तूनि भुञ्जाना वनितासखाः । पिबन्तो मधुरं मद्यं नृत्यन्तो भक्तिनिर्भराः ॥४४॥ सरस्सु तेषु सिंधूनां कुलेषु कलशोद्भव । लतागृहेषु रम्येषु मन्दिरेषु महद्धिषु ॥४५॥

[ पुष्पराग प्रकारादि मुक्ताकार वर्णन ] [ ४७३

सदा जपंतः श्रीदेवी पठन्तश्चापि तद्गुणान् ।
निवसंति महाभागा नारीभिः परिवेष्टिताः ॥४६॥
कर्मक्षये पुनर्यांति भूलोके मानुषीं तनुम् ।
पूर्ववासनया युक्ताः पुनरर्चंति चक्रिणीम् ।
पुनर्यांति श्रीनगरे शक्रनीलमहास्थलीम् ॥४७॥
तत्स्थलस्यैव संपर्काद् रागद्वेषसमुद्भवैः ।
नीलैर्भावैः सदा युक्ता वर्तंते मनुजा मुने ॥४८॥
ये पुनर्ज्ञानिनो मर्त्या निर्द्वंद्वा नियतेन्द्रियाः ।
ते मुने विस्मयाविष्टाः संविशंति महेश्वरीम् ॥४९॥

जो मानव भूलोक के मध्य में हैं और ललितादेवी के मन्त्र की साधना करने वाले हैं वे अपने देहों के अन्त में इन्द्र देव की नील कक्ष्या को प्राप्त करके वहाँ पर ही निवास किया करते हैं ।४३। वहाँ पर अपनी वनिताओं के साथ में दिव्य वस्तुओं का भोग करते हुए मधुर मद्य का पान किया करते हैं और भक्तिभाव में निर्भर होते हुए नृत्य किया करते हैं ।४४। हे कलशोद्भव ! उन सरोवरों में और नदियों के समुदायों में—लताओं के गृहों में तथा रम्य एवं महान् ऋद्धियों वाले मन्दिरों में वे सदा श्रीदेवी का जाप करते और उसके ही गुणगणों को पढ़ा करते हैं। ये महान् भाग वाले पुरुष अपनी नारियों से परिवेष्टित होकर निवास किया करते हैं ।४५-४६। जब इनके पुण्य कर्मों का क्षय हो जाता है तो उस स्वर्गीय सुख का त्याग करके फिर इसी मनुष्य का देह प्राप्त किया करते हैं। पूर्व की वासना उनकी आत्मा में बनी ही रहा करती है और वे पुनः चक्रिणी का अर्चन किया करते हैं । फिर वे श्रीनगर में शक्रनील महास्थली में गमन किया करते हैं। ।४७। हे मुने ! उस स्थल के सम्पर्क से ही राग-द्वेष से समुत्पन्न भावों से जो नील होते हैं वे सर्वदा युक्त होते हैं ऐसे ही मनुष्य रहते हैं ।४८। जो ज्ञान वाले मनुष्य होते हैं वे निर्द्वन्द्व और नियत इन्द्रियों वाले हैं। हे मुने ! वे विस्मय युक्त होकर महेश्वरी में प्रवेश किया करते हैं ।४९।

इन्द्रनीलाख्यशालस्यांतरे मारुतयोजने ।
मुक्ताफलमयः शालः पूर्ववद्गोपुरान्वितः ॥५०॥

४७४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

अत्यंतभास्वरा स्वच्छा तयोर्मध्ये स्थली मुने ।
सर्वापि मुक्ताखचिताः शिशिरातिमनोहराः ॥५१॥
ताम्रपर्णी महापर्णी सदा मुक्ताफलोदका ।
एवमाद्या महानद्यः प्रवहन्ति महास्थले ॥५२॥
तासां तीरेषु सर्वेऽपि देवलोकनिवासिनः ।
वसंति पूर्वजनुषि श्रीदेवीमन्त्रसाधकाः ॥५३॥
पूर्वाद्यष्टसु भागेषु लोकाः शक्रादिगोचराः ।
मुक्ताशालस्य परितः संयुज्य द्वारनेशकान् ॥५४॥
मुक्ताशालस्य नीलस्य द्वारयोर्मध्यदेशतः ।
पूर्वभागे शक्रलोकस्तत्कोणे वह्निलोकभूः ॥५५॥
याम्यभागे यमपुरं तत्र दण्डधरः प्रभुः ।
सर्वत्र ललितामन्त्रजापी तीव्रस्वभाववान् ॥५६॥

इन्द्रनील नामक शाल के अन्तर में मरुत योजन में एक मुक्ताफलों से परिपूर्ण शाल है और वह पहिली भांति ही गोपुर से समन्वित है ।५०। हे मुने ! उन दोनों के मध्य में अत्यधिक भास्वर स्थली है जो परम स्वच्छ है । वह सब ही मुक्ताओं से खचित है और शिशिर से अतीव मनोहर है । ।५१। उस महा स्थल में ताम्रपर्णी—महापर्णी आदि महा नदियाँ हैं जिनका जल मुक्ता फलों के ही समान हैं । ऐसी नदियाँ सर्वदा वहाँ बहा करती हैं । ।५२। उनके तटों पर सभी देवलोक के निवासी वास किया करते हैं जो अपने पूर्वजन्म में श्रीदेवी के मन्त्र की साधना करने वाले हैं ।५३। पूर्व आदि आठ भागों में शक्रादि गोचर लोक हैं जो मुक्ता शाल के सब ओर द्वार-देशकों को संयोजित करते हैं ।५४। मुक्ता शाल नील के द्वारों में मध्य देश से पूर्व भाग में इन्द्र लोक हैं और उसके कोण में वह्निलोक की भूमि है । ।५५। याम्य भाग में यम राज का नगर है । वहाँ पर दण्डधर प्रभु निवास किया करते हैं । सर्वत्र ललिता के मन्त्र का जाप करने वाले हैं और वीन स्वभाव वाले हैं ।५६।

आज्ञाधरो यमभटैश्चित्रगुप्तपुरोगमैः ।
सार्धं नियमयत्येव श्रीदेवीसमयं गुहः ॥५७॥

पुष्पराग प्रकारादि मुक्ताहार वर्णन ] [ ४७५

गुहसप्तान्दुराचाराँल्ललिताद्वेषकारिणः । कूटभक्तिपरान्मूर्खान् स्तब्धानत्यंतदर्पितान् ॥५८ मन्त्रचोरान्कुमन्त्रांश्च कुविद्यानघसंश्रयान् । नास्तिकान्पापशीलांश्च वृथैव प्राणिहिंसकान् ॥५९ स्त्रीद्विष्टाँल्लोकविद्विष्टान्पाषंडानां हि पालिनः । कालसूत्रे रौरवे च कुम्भीपाके च कुम्भज ॥६० असिपत्रवने घोरे कृमिभक्षे प्रतापने । लालाक्षेपे सूचिवेधे तथैवांगारपातने ॥६१ एवमादिषु कष्टेषु नरकेषु घटोद्भव । पातयत्याज्ञया तस्याः श्रीदेव्याः स महौजसः ॥६२ तस्यैव पश्चिमे भागे निर्ऋतिः खड्गधारकः । राक्षसं लोकमाश्रित्य वर्तते ललितार्चकः ॥६३

चित्रगुप्त जिनमें अग्रणी है ऐसे यमराज के भटों के साथ आज्ञा के धारण करने वाले गुह श्री देवी के समय को नियमित किया करते हैं ।५७। जो गुह के द्वारा शप्त हैं—दुराचारी हैं—ललिता के साथ द्वेष करने वाले हैं—कूटभक्ति में तत्पर हैं—मूर्ख हैं—स्तब्ध हैं और बहुत ही अधिक दर्प वाले हैं—मन्त्र चोर हैं—कुत्सित मन्त्र वाले हैं—कुविद्या के पाप का संश्रय करने वाले हैं—नास्तिक हैं—पाप कर्मों के करने वाले हैं उनको भिन्न-भिन्न नरकों में डाल दिया जाता है। उन नरकों के नाम ये हैं—कालसूत्र-रौरव-कुम्भीपाक-वह महान ओज वाला उसी श्री देवी की आज्ञा से हे घटोद्भव ! इन नरकों में डाल दिया करता है ।५८-६२। उसके ही पश्चिम भाग में खड्ग का धारण करने वाला निर्ऋति है। वह भी श्री ललिता का अर्चक राक्षस लोक का आश्रय ग्रहण करके रहा करते हैं ।६३।

तस्य चोत्तरभागे तु द्वारयोरंतरस्थले । वारुणं लोकमाश्रित्य वरुणे वर्तते सदा ॥६४ वारुण्यास्वादनोन्मत्तः शुभ्रांगो झषवाहनः । सदा श्रीदेवतामंत्रजापी श्रीक्रमसाधकः ॥६५

४७६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

श्रीदेवतादर्शनस्य द्वेषिणः पाशबन्धनैः ।
बद्ध्वा नयत्यधोमार्गं भक्तानां बन्धमोचकः ॥६६॥
तस्य चोत्तरकोणेषु वायुलोको महाद्युतिः ।
तत्र वायुशरीराश्च सदानन्दमहोदयाः ॥६७॥
सिद्धा दिव्यर्षयश्चैव पवनाभ्यासिनोऽपरे ।
गोरक्षप्रमुखाश्चान्ये योगिनो योगतत्पराः ॥६८॥
एतैः सह महासत्त्वस्तत्र श्रीमारुतेश्वरः ।
सर्वथा भिन्नमूर्त्तिश्च वर्तते कुम्भसम्भव ॥६९॥
इडा च पिङ्गला चैव सुषुम्णा तस्य शक्तयः ।
तिस्रो मारुतनाथस्य सदा मधुमदालसाः ॥७०॥

उसके उत्तर भाग में दोनों के मध्य स्थल में वारुण लोक का आश्रयके लेकर सदा वरुण देवता रहा करता है ॥६४॥ यह वारुणी के अस्वादन में मत्त रहता है । इसका परमशुभ्र है और वृष इसका वाहन है । यह भी श्रीदेवी के मन्त्र के जप करने वाला है और श्री के क्रम की साधन करने वाला है ।६५। जो भी श्री देवता से द्वेष करने वाले हैं उनको पाशों के बन्धनों से बाँधकर भक्तों के बन्धन को छुड़ाने वाला यह अधो मार्ग में पहुँचा दिया करता है ।६६। और उसके उत्तर कोने में महती द्युति वाला वायुलोक है । वहाँ पर वायु के ही शरीरों वाले तथा सर्वदा आनन्द से पूर्ण महोदय सिद्ध-गण और दिव्य ऋषिगण तथा दूसरे पवन के अभ्यास वाले—गो की रक्षा में प्रधान—योग में परायण योगी रहा करते हैं और इन्हीं के साथ महान सत्त्व वाला श्रीमारुतेश्वर निवास करते हैं । इनकी मूर्ति सर्वथा भिन्न है ।६७-६९। हे कुम्भ-सम्भव ! इडा-पिङ्गला और सुषुम्णा इसकी शक्तियाँ हैं । ये तीन शक्तियाँ मरुतनाथ की सर्वदा मधु के मद से अलस रहा करती हैं ।७०।

ध्वजहस्तो मृगवरे वाहने महति स्थितः ।
ललितायजनध्यानक्रमपूजनतत्परः ॥७१॥
आनन्दपूरिताङ्गीभिरन्याभिः शक्तिभिर्वृतः ।
स मारुतेश्वरः श्रीमान्सदा जपति चक्रिणीम् ॥७२॥
तेन सत्त्वेन कल्पान्ते त्रैलोक्यं सचराचरम् ।

पुष्पराग प्रकारादि मुक्ताकार वर्णन ] [ ४७७

परागमयतां नीत्वा विनोदयति तत्क्षणात् ॥७३ तस्य सत्वस्थ सिद्ध्यर्थं तानेव ललितेश्वरीम् । पूजयन्भावयन्नास्ते सर्वाभरणभूषितः ॥७४ तल्लोकपूर्वभागस्थे यक्षलोके महाद्युतिः । यक्षेंद्रो वसति श्रीमांस्तद्द्वारद्रुममध्यगः ॥७५ निधिभिश्च नवाकारैर्ऋद्धिवृद्ध्यादिशक्तिभिः । सहितो ललिताभक्तान्पूरयन्धनसम्पदा ॥७६ यक्षीभिश्च मनोज्ञाभिरनुकूलप्रवृत्तिभिः । विविधैर्मधुभेदैश्च सम्पूजयति चक्रिणीम् ॥७७

वह मरुतेश्वर श्रेष्ठ सिंह के वाहन पर विराजमान हैं—हाथ में ध्वजा लिए हुए हैं और ललिता देवी के यजन-ध्यान और अर्चन के क्रम में परायण रहते हैं ।७१। आनन्द से पूरित अङ्गों वाली अन्य शक्तियों से समावृत रहते हैं । वह श्रीमान मरुतेश्वर सदा चक्रिणी का जाप किया करते हैं ।७२। उसी के सत्त्व से चराचर त्रैलोक्य को कल्प के अन्त में परागमयता को प्राप्त करके उसी क्षण में विनोदित किया करते हैं ।७३। उसी सत्त्व की सिद्धि के लिए उसी ललितेश्वरी की भावना तथा अर्चना करते हुए समस्त आभरणों से भूषित हैं ।७४। उस लोक के पूर्व भाग में यक्षलोक है उसमें महान कान्ति सम्पन्न यक्षराज निवास किया करते हैं । यह श्री सम्पन्न हैं और उसके द्वारों के मध्य में स्थित हैं ।७५। निधियों के द्वारा जो नौ हैं तथा ऋद्धि, वृद्धि आदि शक्तियों के द्वारा ललिता के भक्तों की धन सम्पदा से पूर्ति किया करते हैं ।७६। अनुकूल प्रवृत्ति वाली परम सुन्दरी पत्नियों के सहित अनेक प्रकार के मधु के भेदों से उसी चक्रिणी देवी की सविधि पूजा किया करते हैं ।७७।

मणिभद्रः पूर्णभद्रो मणिमान्माणिकन्धरः । इत्येवमादयो यक्षसेनान्यस्तत्र सन्ति वै ॥७८ तल्लोकपूर्वभागे तु रुद्रलोको महोदयः । अनर्घ्यरत्नखचितस्तत्र रुद्रोऽधिदेवता ॥७९ सदैव मन्युना दीप्तः सदा बद्धमहेषुधिः ।