भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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श्रीनगर त्रिपुरा सप्त कक्षा वर्णन ] [ ४६१

निजोत्थैः पुष्पसंभारै रचयन्परमेश्वरीम् । पारिजातस्य वाटीं तु रक्षति ज्वलनार्दनः ॥३६ सहःश्रीश्च सहस्यश्रीस्तस्य द्वे योषिते शुभे । कदम्बवनवाट्यास्तु रक्षकः शिशिराकृतिः ॥३७ शिशिरर्तुर्मुनिश्श्रेष्ठ वर्तते कुम्भसम्भव । सा कक्ष्या तेन सर्वत्र शिशिरीकृतभूतला ॥३८ तद्वासिनी ततः श्यामा देवता शिशिराकृतिः । तपःश्रीश्च तपस्यश्रीस्तस्य द्वे योषिदुत्तमे । ताभ्यां सहार्चयत्यंबां ललितां विश्वपावनीम् ॥३९ अगस्त्य उवाच- गन्धर्ववदन श्रीमन्नानावृक्षादिसप्तकैः । प्रथमोद्यानपालस्तु महाकालो मया श्रितः ॥४० चतुरावरणं चक्रं त्वया तस्य प्रकीर्तितम् । षण्णामृतूनामन्येषां कल्पकोद्यानवाटिषु । पालकत्वं श्रुतं त्वत्तश्चक्रदेव्यस्तु न श्रुताः ॥४१ अत एव वसन्तादिचक्रावरणदेवताः । क्रमेण ब्रूहि भगवन्सर्वज्ञोऽसि यतो महान् ॥४२

अपने में समुत्पन्न कुसुमों के संभारों से यह परमेश्वरी की अर्चना किया करता है। ज्वलनार्दन यह पारिजात की वाटिका की सर्वदा रक्षा किया करता है ॥३६॥ सहः श्री और सहस्य श्री—ये दो परम शुभ उसकी पत्नियां हैं। उन अपनी उत्तम नारियों को साथ में लेकर यह विश्व पावनी अम्बा ललिता का समर्चन किया करता है। कदम्ब वन की वाटिका की शिशिराकृति रक्षा करता था ॥३७॥ हे मुनिश्रेष्ठ ! हे कुम्भ सम्भव ! यह शिशिर ऋतु है। वह सभी जगह कक्ष्या उसी से शीतल भूतल वाली है ॥३८॥ उसमें निवास करने वाली शिशिराकृति श्यामा देवता है। तपः श्री और तपस्य श्री ये दो उसकी उत्तम स्त्रियां हैं। उन दोनों के ही साथ वह विश्व-पावती ललिता देवी का अर्चन करता है ॥३९॥ अगस्त्यजी ने कहा—हे