संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीनगर त्रिपुरा सप्तकक्षा वर्णन ] [ ४५७
त्रिकोणं पञ्चकोणं च षोडशच्छदपंकजम् । अष्टारपंकजं चैवं महाकालस्तु मध्यगः ॥८ त्रिकोणे तु महाकाल्या महासंध्या महानिशा । एतास्तिस्रो महादेव्यो महाकालस्य शक्तयः ॥६ तत्रैव पञ्चकोणाग्रे प्रत्यूषश्च पितृप्रसूः । प्राह्णापराहणमध्याह्नाः पञ्च कालस्य शक्तयः ॥१० अथ षोडशपत्राब्जे स्थिता शक्तीर्मुने शृणु । दिनमिश्रा तमिस्रा च ज्योत्स्नी चैव तु पक्षिणी ॥११ प्रदोषा च निशीथा च प्रहरा पूर्णिमापि च । राका चानुमतिश्चैव तथैवामावस्यिका पुनः ॥१२ सिनीवाली कुहूर्भद्रा उपरागा च षोडशी । एता षोडशमात्रस्थाः शक्तयः षोडश स्मृताः ॥१३ कला काष्ठा निमेषाश्च क्षणाश्चैव लवास्त्रुटिः । मुहूर्ताः कुतपाहोरा शुक्लपक्षस्तथैव च ॥१४
एक त्रिकोण है—फिर पञ्च कोण हैं—फिर सोलह दलों वाला पङ्कज है—फिर आठ आरों काल पङ्कज है—और महाकाल मध्यगामी रहता है ।८। त्रिकोण में महाकाल्या—महासन्ध्या और महा निशा—ये तीन महा देवियां जो महाकाल की शक्तियां हैं विद्यमान हैं ।६। वहाँ पर ही पञ्चकोण के अग्रभाग से प्रत्यूष—पितृ प्रसू—प्राह्णपराहण—मध्याह्न ये पाँच काल की शक्तियां हैं ।१०। हे मुने ! अब आप सुनिए इसके पश्चात् सोलह दलों वाले कमल में जो शक्तियाँ स्थित रहा करती हैं । तमिस्रा—दिनमिश्रा—ज्योत्स्नी—पक्षिणी—प्रदोषा—निशीथा—प्रहरा—पूर्णिमा—राका—अनुमति और अमावस्यिका हैं ।११-१२। सिनीवाली—कुहू—भद्रा और सोलहवीं उपरागा है । ये सोलह मात्रस्थ षोडश शक्तियाँ कही गयीं हैं ।१३। कला—काष्ठा—निमेषा—क्षणा—लवा—त्रुटि मुहूर्त्त तथा कुतपा होरा और शुक्ल पक्ष है ।१४।
कृष्णपक्षायनाश्चैव विषुवा च त्रयोदशी । संवत्सरा च परिवत्सरेडावत्सरापि च ॥१५