भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४५६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

श्यामकंचुकधारी च मदारुणविलोचनः ।
ब्रह्मांडचषके पूर्णं पिबन्विश्वरसायनम् ॥ ३
महाकालीं घनश्यामामनंगार्द्रामपाङ्गयत् ।
सिंहासने समासीनः कल्पांते कलनात्मके ॥ ४
ललिताध्यानसम्पन्नो ललितापूजनोत्सुकः ।
वितन्वंल्ललिताभक्तेः स्वायुषो दीर्घदीर्घताम् ।
कालमृत्युप्रमुखैश्च किंकरैरपि सेवितः ॥ ५
महाकालीमहाकालौ ललिताज्ञाप्रवर्त्तकौ ।
विश्वं कलयतः कृत्स्नं प्रथमेऽध्वनि वासिनौ ॥ ६
कालचक्रं मतङ्गस्य तस्यैवासनतां गताम् ।
चतुरावर णोपेतं मध्ये बिन्दुमनोहरम् ॥ ७

श्री अगस्त्यजी ने कहा—लोहादि सात शालाओं के रक्षक भी होंगे ही। हे प्राज्ञ ! अब आप उनके नामों को भी बतला दीजिए जिससे मेरे मन में संशय का छेदन हो जावे ।१। श्री हयग्रीव जी ने कहा—हे कुम्भ सम्भव ! अनेक प्रकार के वृक्षों के महान उद्यान में समस्त लोकों के भक्षण करने वाला जिसका श्याम शरीर है वह महाकाल विद्यमान रहा करता है ।२। यह श्याम वर्ण की कञ्चुकी के धारण करने वाला था और मद से उसके लाल नेत्र थे । तथा ब्रह्माण्ड के प्याले में वह विश्व रसायन का पान किया करता है ।३। घन के समान श्याम वर्ण वालो की ओर जो काम से आर्द्र थी कटाक्ष-पात कर रहा था। कलनात्मक कल्प के अन्त में वह सिंहासन पर विराज-मान रहा करता है ।४। यह सदा ललिता देवी के ध्यान में सम्पन्न रहता है और ललितादेवी के पूजन करने में इसकी उत्सुकता रहती है । जो भी ललितादेवी के भक्त हैं उनकी आयु की दीर्घता का विस्तार अधिक किया करता है । कालमृत्यु जिनमें प्रधान है ऐसे अनेक किङ्करों के द्वारा वह सेवित रहता है ।५। महाकाली और महाकाल ये दोनों ही ललितादेवी की आज्ञा के प्रवर्तक हैं ये प्रथम मार्ग में वास करने वाले सम्पूर्ण विश्व को कलित किया करते हैं ।६। उसी मतंग का यह काल चक्र आसनता को प्राप्त हुआ था। यह चार आवरणों से उपेत था और मध्य में मनोहर बिन्दु था ।७।