भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४५४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

धीरबुद्धि वाले उसने परमाति घोर तपों के द्वारा पूरित कर दिया था और मतंग मुनि के पुत्र ने उसकी उपासना भली-भांति से की थी ।६२। मन्त्रिणी के समीप में उपस्थित हो गयी थी और उसने उससे वरदान का वरण करने के लिए कहा था। वह भी समस्त मुनियों में परम श्रेष्ठ था और मातंग तपों की खान था। उसने समीप में उपस्थित श्यामला देवी के आगे यही कहा था ।६३। मातंग महामुनि ने हे देवि मुझे आपकी केवल स्मृति ही से समस्त सिद्धियाँ अणिमा आदि हो जावें और अन्य भी सब विभूतियाँ भी हो जावें ।६४। हे अम्ब ! तीनों भुवनों में मुझे कुछ भी प्राप्त करने के योग्य न रहे। केवल आपके चरित की स्मृति से ही सभी ओर से मुझे सब कुछ की प्राप्ति का समय हो जावे ।६५। और आपका मेरे समीप में उपस्थित हो जाना भी निष्फल न होवे। इस रीति से मैं दूसरा वर माँगता हूँ उसको भी हे अम्बिके ! आप पूर्ण करिए ।६६। पूर्व में मेरा हिमवान् के साथ परिहास वाला सौहार्द था। क्रीड़ा में मत्त उसने कुछ अवाच्य वचन कह डाले थे ।६७। उसने कहा था कि मैं गौरी का गुरु हूँ—ऐसी बहुत आत्म प्रशंसा की थी। उसका वह वाक्य ऐसा था कि मेरे पास कुछ भी उत्तर नहीं था क्योंकि उसमें अधिक गुण था ।६८।

उभयोर्गुणसाम्ये तु मित्रयोरधिके गुणे । एकस्य कारणाज्जाते तत्रान्यस्य स्पृहा भवेत् ।।९९ गौरीगुरुत्वश्लाघार्थं प्राप्ताकामोऽप्यहं तपः । कृतवान्मंत्रिणीनाथे तत्त्वं मत्तनया भव ।।१०० यतो मन्नामविख्याता भविष्यसि न संशयः । इत्युक्तं वचनं श्रुत्वा मातंगस्य महामुनेः । तथास्त्विति तिरोधत्त स च प्रीतोऽभवन्मुनिः ।।१०१ मातंगस्य महर्षेस्तु तस्य स्वप्ने तदा मुदा । तापिच्छमञ्जरीमेकां ददौ कर्णावतंसतः ।।१०२ तत्स्वप्नस्य प्रभावेण मातंगस्य सधर्मिणी । नाम्ना सिद्धिमती गर्भे लघुश्यामामधारयत् ।।१०३ तत एव समुत्पन्ना मातंगी तेन कीर्तिताः । लघुश्यामेति सा प्रोक्ता श्यामा यन्मूलकन्दभूः ।।१०४