संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमतंग कन्या प्रादुर्भाव वर्णन ] [ ४५३
में मन्त्रिणी देवी के जो प्रचुर गुण थे उनका वर्णन ऐसा कौन है जो कर सकता है जिसके दो सहस्र जिह्वायें होवें ।८७। कादम्बरी के मद से लाल लोचनों वाली कल वीणा के द्वारा गायन करती हुई वहाँ पर क्रीड़ा किया करती है जो कि मान्य मातंगों की बालिकाएं हैं ।८८। अगस्त्यजी ने कहा- मतंग नाम वाला यह कौन कहा गया है और उसकी कन्या कैसी थीं जो सर्वदा ही मधु से मदालसा होकर मन्त्रिणी नाथा की सेवा किया करती हैं। ।८९। श्री हयग्रीव ने कहा-मतंग नाम वाला एक तपों का समूह तपस्वी था और यह महान् प्रभाव से संयुत था । यह जगत का सृजन करने में बहुत ही लम्पट था ।९०। तप की शक्ति से इसमें ऐसी बुद्धि हो गयी थी कि सर्वत्र आज्ञा का यह प्रवर्त्तक था । उसका पुत्र मातंग हुआ था । इसकी घोर तपस्या से मन्त्र नायिका मुद्रिणी तुष्ट हो गयी थी ।९१।
घोरैस्तपोभिरत्यर्थं पूरयामास धीरधीः । मतंगमुनिपुत्रेण सुचिरं समुपासिता ॥६२ मन्त्रिणी कृतसान्निध्या वृणीष्व वरमित्यशात् । सोऽपि सर्वमुनिश्रेष्ठो मातंगस्तपसां निधिः । उवाच तां पुरो दत्तसान्निध्यां श्यामलांबिकाम् ॥६३
मातंगमहामुनिरुवाच- देवी त्वत्स्मृतिमात्रेण सर्वाश्च मम सिद्धयः । जाता एवाणिमाद्यास्ताः सर्वाश्चान्या विभूतयः ॥६४ प्रापणीयन्न मे किंचिदस्त्यंबभुवनत्रये । सर्वतः प्राप्तकालस्य भवत्याश्चरितस्मृतेः ॥६५ अथापि तव सांनिध्यमिदं नो निष्फलं भवेत् । एवं परं प्रार्थयेऽहं तं वरं पूरयांबिके ॥६६ पूर्वं हिमवता सार्धं सौहार्दं परिहासवान् । क्रीडामत्तेन चावाच्येस्तत्र तेन प्रगल्भितम् ॥६७ अहं गौरीगुरुरिति श्लाघामात्मनि तेनिवान् । तद्वाक्यं मम नैवाभूद्यतस्तत्राधिको गुणः ॥६८