भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

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युग संख्यावर्ण ] [ १०३

के सहित काल कहा गया है। युग निरस छब्बीस नियुत ही हैं। ३५। इन चारों युगों का संख्या से तैतालीस नियुत और बीस हजार वह सन्ध्यांश होता है। ३६। इस प्रकार से कृत से लेकर त्रेता आदि चारों युगों की साधिका इकहत्तर होती है। इसी को एक मन्वन्तर कहा जाता है अर्थात् इकत्तर चारों युगों की चोकड़ियाँ जब समाप्त हो जाती हैं तभी एक मनु के शासन का समय पूर्ण होकर दूसरा मन्वन्तर आता है ।३७।

अंतरिक्षे समुद्रे च पाताले पर्वतेषु च । इज्या दानं तपः सत्यं त्रेतायां धर्म उच्यते ॥३८ तदा प्रवर्त्तन्ते धर्मो वर्णाश्रमविभागशः । मर्यादास्थापनार्थं च दण्डनीतिः प्रवर्त्तते ॥३९ हृष्टपुष्टाः प्रजाः सर्व्वा अरोगाः पूर्णमानसाः । एको वेदश्चतुष्पादस्त्रेतायुगविधौ स्मृतः ॥४० त्रीणि वर्षसहस्राणि तदा जीवन्ति मानवाः । पुत्रपौत्रसमाकीर्णा म्रियन्ते च क्रमेण तु ॥४१ एष त्रेतायुगे धर्मस्त्रेतासंख्यां निबोधत । त्रेतायुगस्वभावानां संध्यापादेन वर्त्तते । संख्यापादः स्वभावस्तु सोऽशपादेन तिष्ठति ॥४२

अन्तरिक्ष में—समुद्र में—पाताल में और पर्वतों में इज्या-दान, तप और सत्य का समाचरण ही त्रेतायुग में धर्म कहा जाया करता है ।३८। उस समय में वर्गों और आश्रमों के विभाग के अनुसार धर्म की प्रवृत्ति हुआ करती है। मर्यादा की स्थापना करने के लिए दण्ड देने की नीति भी उस समय में प्रवृत्त होती है ।३९। उस समय में समस्त प्रजा के जन समुदाय दृष्ट-पुष्ट, रोगों से रहित और पूर्ण मानस वाले होते हैं। त्रेतायुग की विधि में चार पादों वाला एक ही वेद कहा गया है ।४०। उस समय में मानवों की आयु बड़ी होती थी और वे तीन हजार वर्षों तक जीवित करते रहा थे। वे सब अपने पुत्रों—पौत्रों से घिरे हुए रहा करते थे तथा उनकी मृत्यु भी आयु के अनुसार क्रम से ही हुआ करती थी ।४१। त्रेतायुग में इसी प्रकार से धर्म होता था। अब त्रेता की संख्या का भी ज्ञान प्राप्त कर लीजिए। त्रेता

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