भारतकोश
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संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

युग संख्यावर्ण ] [ १०३

के सहित काल कहा गया है। युग निरस छब्बीस नियुत ही हैं। ३५। इन चारों युगों का संख्या से तैतालीस नियुत और बीस हजार वह सन्ध्यांश होता है। ३६। इस प्रकार से कृत से लेकर त्रेता आदि चारों युगों की साधिका इकहत्तर होती है। इसी को एक मन्वन्तर कहा जाता है अर्थात् इकत्तर चारों युगों की चोकड़ियाँ जब समाप्त हो जाती हैं तभी एक मनु के शासन का समय पूर्ण होकर दूसरा मन्वन्तर आता है ।३७।

अंतरिक्षे समुद्रे च पाताले पर्वतेषु च । इज्या दानं तपः सत्यं त्रेतायां धर्म उच्यते ॥३८ तदा प्रवर्त्तन्ते धर्मो वर्णाश्रमविभागशः । मर्यादास्थापनार्थं च दण्डनीतिः प्रवर्त्तते ॥३९ हृष्टपुष्टाः प्रजाः सर्व्वा अरोगाः पूर्णमानसाः । एको वेदश्चतुष्पादस्त्रेतायुगविधौ स्मृतः ॥४० त्रीणि वर्षसहस्राणि तदा जीवन्ति मानवाः । पुत्रपौत्रसमाकीर्णा म्रियन्ते च क्रमेण तु ॥४१ एष त्रेतायुगे धर्मस्त्रेतासंख्यां निबोधत । त्रेतायुगस्वभावानां संध्यापादेन वर्त्तते । संख्यापादः स्वभावस्तु सोऽशपादेन तिष्ठति ॥४२

अन्तरिक्ष में—समुद्र में—पाताल में और पर्वतों में इज्या-दान, तप और सत्य का समाचरण ही त्रेतायुग में धर्म कहा जाया करता है ।३८। उस समय में वर्गों और आश्रमों के विभाग के अनुसार धर्म की प्रवृत्ति हुआ करती है। मर्यादा की स्थापना करने के लिए दण्ड देने की नीति भी उस समय में प्रवृत्त होती है ।३९। उस समय में समस्त प्रजा के जन समुदाय दृष्ट-पुष्ट, रोगों से रहित और पूर्ण मानस वाले होते हैं। त्रेतायुग की विधि में चार पादों वाला एक ही वेद कहा गया है ।४०। उस समय में मानवों की आयु बड़ी होती थी और वे तीन हजार वर्षों तक जीवित करते रहा थे। वे सब अपने पुत्रों—पौत्रों से घिरे हुए रहा करते थे तथा उनकी मृत्यु भी आयु के अनुसार क्रम से ही हुआ करती थी ।४१। त्रेतायुग में इसी प्रकार से धर्म होता था। अब त्रेता की संख्या का भी ज्ञान प्राप्त कर लीजिए। त्रेता

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युग के जो स्वभाव हैं उनकी सन्ध्या पाद से बरता करती है। सन्ध्यापाद का स्वभाव जो है वह अंश पाद से स्थित होता है ॥४२॥

चतुर्युगाख्यान वर्णनम्

सूत उवाच--अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि द्वापरस्य विधिं पुनः । तत्र त्रेतायुगे क्षीणे द्वापरं प्रतिपद्यते ॥१ द्वापरादौ प्रजानां तु सिद्धिस्त्रेतायुगे तु या । परिवृत्ते युगे तस्मिंस्ततस्ताभिः प्रणश्यति ॥२ ततः प्रवर्तते तासां प्रजानां द्वापरे पुनः । संभेदश्चैव वर्णानां कार्याणां च विपर्ययः ॥३ यज्ञावधारणं दण्डो मदो दंभः क्षमा बलम् । एषा रजस्तमोयुक्ता प्रवृत्तिर्द्वापरे स्मृता ॥४ आद्ये कृते यो धर्मोऽस्ति स त्रेतायां प्रवर्तते । द्वापरे व्याकुलीभूत्वा प्रणश्यति कलौ युगे ॥५ वर्णानां विपरिध्वंसः संकीर्यन्ते तथाश्रमाः । द्वैविध्यं प्रतिपद्येते युगे तस्मिञ्छुतिस्मृती ॥६ द्वैधात्तथा श्रुतिस्मृत्योर्निश्चयो नाधिगम्यते । अनिश्चयाधिगमनाद्धर्मतत्त्वं न विद्यते ॥७

श्री सूतजी ने कहा —उसके आगे फिर द्वापर युग की विधि का वर्णन करूँगा। वहाँ पर त्रेता युग के क्षीण होने पर द्वापर युग प्रतिपन्न होता है ।१। द्वापर युग के आदि में प्रजाओं की वही सिद्धि थी जो कि त्रेतायुग में में थी। उस युग के परिवर्तित हो जाने पर इसके पश्चात् उन सिद्धियों से विनष्ट हो जाता है ।२। फिर द्वापर में उस प्रजाओं का संभेद प्रवृत्त हो जाता है और समस्त वर्णों का और कार्यों का विपर्यय हो जाया करता है ।३। यज्ञों का अवधारण, दण्ड, दम्भ, क्षमा और बल द्वापर में यह प्रवृत्ति जो भी थी वह रजोगुण और तमोगुण से युक्त कही गयी है ।४। सबसे आदि में होने वाले कृतयुग में जो धर्म है वह त्रेतायुग में प्रवृत्त होता है। द्वापर युग में वह धर्म व्याकुलित होकर कलियुग में विनष्ट ही जाता है ।५। सभी वर्णों का विशेष रूप से परिध्वंस होता है तथा सब आश्रम भी बिगड़ जाया करते

चतुर्युगाख्यान वर्णनम् ] | १०५

हैं। उस युग में श्रुतियाँ और स्मृतियाँ दो प्रकारों को प्राप्त कर लिया करती हैं। श्रुति-स्मृतियों के दो प्रकार के स्वरूप हो जाने से किसी निश्चय का अधिगम नहीं हुआ करता है और अनिश्चय के अधिगम से धर्म का वास्त- विक तत्त्व नहीं रहता है ।६-७।

धर्मासत्वेन मित्राणां मतिभेदो भवेन्नृणाम् । परस्परविभिन्नैस्तैर्दृष्टीनां विभ्रमेण च ॥८ अयं धर्मो ह्ययं नेति निश्चयो नाधिगम्यते । कारणानां च वैकल्यात्कार्याणां चाप्यनिश्चयात् ॥९ मतिभेदेन तेषां वै दृष्टीनां विभ्रमो भवेत् । ततो दृष्टिविभिन्नैस्तु कृतं शास्त्राकुलं त्विदम् ॥१० एको वेदश्चतुष्पाद्धि त्रेतास्विह विधीयते । संक्षयादायुषश्चैव व्यस्यते द्वापरेषु च ॥११ ऋषिमंत्रात्पुनर्भेदाद्भिद्यते दृष्टिविभ्रमैः । मंत्रब्राह्मणविन्यासैः स्वरवर्णविपर्ययैः ॥१२ संहिता ऋग्यजुः साम्नां संपठ्यंते महर्षिभिः । सामान्या वैकृताश्चैव दृष्टिभिन्ने क्वचित्क्वचित् ॥१३ ब्राह्मणं कल्पसूत्राणि मंत्रप्रवचनानि च । अन्येऽपि प्रस्थितास्तान्वै केचित्तान्प्रत्यवस्थिताः ॥१४

धार्मिकता के न रहने से भिन्न मनुष्यों की मति का भेद हो जाया करता है। वे सब आपस को भी किसी के साथ सहानुभूति नहीं होती है। सब की सृष्टि में विभ्रम हो जाया करता है ।८। यह धर्म है अथवा यह अधर्म है—इसका कोई भी निश्चय नहीं हुआ करता है। कारणों के विकल्प होने से और कार्यों के निश्चय नहीं होने से धर्माधर्म का कोई निश्चय नहीं हुआ करता है ।९। उन मनुष्यों की मति के विभेद होने से उनकी दृष्टियों का भी विभ्रम हो जाता है। फिर विभिन्न दृष्टियों वाले मनुष्यों के द्वारा शास्त्रों को भी आकुलित कर दिया था ।१०। वेद एक ही था उसको त्रेता- युग में चार पादों वाला किया जाता है। आयु के संक्षय होने से द्वापर युग में यह व्यवस्थित हो जाता है ।११। ऋषियों ने और मन्त्रों के फिर भेद

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होने से यह दृष्टि के विभ्रमों से युक्त हो जाता है । जिस से मन्त्र भाग और ब्राह्मण भाग का विन्यास होता है और स्वरों तथा वर्णों का विपर्यय होता है ।१२। महर्षियों के द्वारा ऋग्वेद-यजुर्वेद और सामवेद की संहितायें पढ़ी जाया करती हैं । कहीं पर सामान्य और कहीं-कहीं पर दृष्टि की भिन्नता होने पर वैकृत ये पढ़ी जाया है ।१३। ब्राह्मण-कल्प सूत्र और मन्त्र प्रवचन और अन्य भी प्रथित हैं और कुछ उनके प्रति अवस्थित हैं ।१४।

द्वापरेषु प्रवर्त्तन्ते निवर्त्तन्ते कलौ युगे ।
एकमाध्वर्यवं त्यासीत्पुनर्द्वैधमजायत ।।१५
सामान्यविपरीतार्थैः कृतशास्त्राकुलं त्विदम् ।
आध्वर्यवस्य प्रस्थानैर्बहुधा व्याकुलीकृतैः ।।१६
तथैवाथर्वऋक्सांम्नां विकल्पैश्चापि संज्ञया ।
व्याकुले द्वापरे नित्यं क्रियते भिन्नदर्शनैः ।।१७
तेषां भेदाः प्रतीभेदा विकल्पाश्चापि संख्यया ।
द्वापरे संप्रवर्त्तन्ते विनश्यन्ति ततः कलौ ।।१८
तेषां विपर्ययोत्पन्ना भवन्ति द्वापरे पुनः ।
अवृष्टिर्मरणं चैव तथैव व्याध्युपद्रवाः ।।१९
वाङ्मनः कर्मजैर्दुःखैर्निर्वेदो जायते पुनः ।
निर्वेदाज्जायते तेषां दुःखमोक्षविचारणा ।।२०
विचारणाच्च वैराग्यं वैराग्याद्दोषदर्शनम् ।
दोषदर्शनतश्चैव द्वापरेऽज्ञानसंभवः ।।२१

यह सब कुछ द्वापर युग में प्रवृत्त होते हैं और कलियुग में भी सभी भेद-प्रभेद निवृत्त हो जाते हैं । एक आध्वर्यव था और फिर दो प्रकार हो गये थे ।१५। साधारण और विपरीत अर्थों के द्वारा यह शास्त्र आकुल कर दिया गया था यह बहुधा आध्वर्यव के व्याकुली कृत प्रस्थानों के द्वारा ही हुआ था ।१६। तथा अर्थात् उसी प्रकार से संज्ञा के द्वारा अथर्व-ऋक् और सामों के विकल्पों से भी हुआ था । नित्य ही इस तरह से व्याकुल द्वापर में विभिन्न दर्शन शास्त्रों के द्वारा किया जाता है ।१७। संख्या से उनके भेद-प्रतीभेद-और विकल्प द्वापर युग में भली-भाँति प्रवृत्त होते हैं और फिर जब कलियुग आ जाता है तो सभी विनष्ट हो जाया करते हैं ।१८। द्वापर में फिर

चतुर्युगाख्यानवर्णनम् । [ १०७

उनके विपरीत समुत्पन्न हो जाते हैं। वृष्टि का अभाव-व्याधि-उपद्रव-मरण- ये सब होते हैं ।१६। कायिक, वाचिक और मानसिक सभी प्रकार के दुःख होते हैं और उन दुःखों के समुदाय से फिर मनों निर्वेद उत्पन्न हो जाता है । यह सभी निस्सार है—ऐसा जब निर्वेद हृदयों में होता है तो फिर उन प्राणियों के हृदयों में इन सब दुःखों से छुटकारा पाने का विचार होता है ।२०। ऐसी जब विचारणा होती है तो उससे सबके प्रति विरागता हो जाया करती है और उस वैराग्य से भोगोपभोगों में दोषों का दर्शन होने लगता है । दोषों के देखने से ही द्वापर में अज्ञान की उत्पत्ति हो जाती है ।२१।

तेषामज्ञानिनां पूर्वमाद्ये स्वायंभुवेऽन्तरे । उत्पद्यंते हि शास्त्राणां द्वापरे परिपंथिनः ॥२२ आयुर्वेदविकल्पश्च ह्यङ्गानां ज्योतिषस्य च । अर्थशास्त्रविकल्पाश्च हेतुशास्त्रविकल्पनम् ॥२३ प्रक्रियाकल्पसूत्राणां भाष्यविद्याविकल्पनम् । स्मृतिशास्त्रप्रभेदश्च प्रस्थानानि पृथक्पृथक् ॥२४ द्वापरेष्वभिवर्त्तंते मतिभेदाश्चयान्नृणाम् । मनसा कर्मणा वाचा कृच्छ्राद्वार्त्ता प्रसिद्ध्यति ॥२५ द्वापरे सर्वभूतानां कायक्लेशपुरस्कृता । लोभो वृत्तिर्वणिक्पूर्वा तत्त्वानांमविनिश्चयः ॥२६ वेदशास्त्रप्रणयनं धर्माणां संकरस्तथा । वर्णाश्रमपरिध्वंसः कामक्रोधौ तथैव च ॥२७ द्वापरेषु प्रवर्त्तन्ते रोगो लोभो वधस्तथा । वेदं व्यासश्चतुर्द्धा तु व्यस्यते द्वापरादिषु ॥२८

उन ज्ञान से रहित मानवों से पहिले स्वायम्भुव मन्वन्तर में जो कि सबसे पहिला है उस द्वापर में सभी शास्त्रों के परिपन्थी अर्थात् विरोध करने वाले लोग समुत्पन्न हो जाया करते हैं ।२२। रोगों के विषय में आयु- र्वेद शास्त्र का विकल्प और ज्योतिष शास्त्र का विकल्प-अर्थशास्त्र के विषय में विकल्प और हेतु शास्त्र का विकल्प है ।२३। कल्पसूत्रों की प्रक्रिया, भाष्य विद्या का विकल्प और स्मृति शास्त्रों के प्रभेद ऐसे अलग-अलग प्रस्थान हैं

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।२४। ये सभी द्वापर युग में मनुष्यों की बुद्धियों के भेद होने से अभिवर्तित हैं। मन से-वचन से और कर्म से बड़ी कठिनाई से वार्त्ता प्रसिद्ध होती है ।२५। द्वापर में समस्त प्राणियों के कार्य शारीरिक क्लेश के साथ ही होते हैं। सबकी वृत्ति होती है जैसी कि वणिजों की हुआ करती हैं और किसी को भी तत्वों का निश्चय नहीं होता है ।२६। लोग स्वयं ही वेदों और शास्त्रों का प्रणयन किया करते हैं और धर्म सब मिलकर एकमेक जाते हैं और धर्मों की सङ्करता हो जाती है। चारों वर्णों और चारों आश्रमों का पूर्णतया विध्वंस हो जाता है और प्राणियों में प्रायः काम और क्रोध उत्पन्न हो जाया करते हैं ।२७। द्वापर युग में लोगों के मनों में राग-लोभ और वध करने की भावनायें उत्पन्न हो जाया करती है। द्वापर के आदि में व्यासदेव जी ने वेद के चार भाग किये थे ।२८।

निःशेषे द्वापरे तस्मिंस्तस्य संध्या तु यादृशी । प्रतिष्ठितगुणैर्हीनो धर्मोऽसौ द्वापरस्य तु ॥२९ तथैव संध्या पादेन ह्यङ्गः संध्या इतीष्यते । द्वापरस्यावशेषेण तिष्यस्य तु निबोधत ॥३० द्वापरस्यांशषेण प्रतिपत्तिः कलेरपि । हिंसासूयानृतं माया वधश्चैव तपस्विनाम् ॥३१ एते स्वभावास्तिष्यस्य साधयंति च वै प्रजाः । एष धर्मः कृतः कृत्स्नो धर्मश्च परिहीयते ॥३२ मनसा कर्मणा स्तुत्या वार्त्ता सिध्यति वा न वा । कलौ प्रमारको रोगः सततं क्षुद्भयानि च ॥३३ अनावृष्टिभयं घोरं देशानां च विपर्ययः । न प्रमाणं स्मृतेरस्ति तिष्ये लोकेषु वै युगे ॥३४ गर्भस्थो म्रियते कश्चिद्यौवनस्थस्तथापरः । स्थविराः केऽपि कौमारे म्रियन्ते वै कलौ प्रजाः ॥३५

द्वापरयुग के निःशेष होने पर उसकी सन्ध्या का काल भी जैसा ही था। द्वापर का यह धर्म गुणों से हीन प्रतिष्ठित होता है ।२९। उसी भाँति की पाद से सन्ध्या होती है। अङ्ग-ही सन्ध्या अभीष्ट हुआ करती है। द्वापर

चतुर्युगाख्यानवर्णनम् ] [ १०६

के अवशेष से अब तिष्य के विषय में समझ लो ।३०। जब द्वापर युग का अंश शेष रहता है तभी कलियुग की भी प्रतिपत्ति हो जाया करती है। जो तपश्चर्या का समाचरण करने वाले हैं उनमें भी युग के प्रभाव से हिंसा—असूया—अनृत—माया और वध की भावनायें उत्पन्न हो जाती हैं ।३१। ये तिष्य (कलि) के स्वभाव हैं जिनका साधन प्रजा के जन किया करते हैं। यह ही किया गया पूर्ण धर्म है और वास्तविक जो भी धर्म है वह परिहीण हो जाया करता है ।३२। मन से-कर्म से और स्तुति से वार्त्ता सिद्ध होती है अथवा नहीं होती है। कलियुग में रोग प्रकृष्ट रूप से मारक होता है और क्षुधा तथा भय होते हैं ।३३। कलि में वृष्टि के समय पर न होने को घोर भय होता है तथा देशों का विपर्यय हो जाता है। कलियुग में लोगों में स्मृति का कोई भी प्रमाण नहीं माना जाता है। कोई तो माता के गर्भ में ही मृत्यु को प्राप्त हो जाता है, कोई युवावस्था में ही मर जाया करता है, कोई-कोई वृद्ध होकर मर जाते हैं। इस कलियुग में प्रजाजन कुमारावस्था में ही परलोक में चले जाया करते हैं ।३४-३५।

दुरिष्टैर्दु रधीतै श्च दुष्कृतैश्च दुरागमैः ।
विप्राणां कर्मदोषैस्तैः प्रजानां जायते भयम् ॥३६
हिंसा माया तथेष्र्या च क्रोधोऽसूयाक्षमा नृषु ।
तिष्ये भवन्ति जंतूना रोगा लोभश्च सर्वशः ॥३७
संक्षोभो जायतेऽत्यर्थं कलिमासाद्य वै युगम् ।
पूर्णे वर्षसहस्रे वै परमायुस्तदा नृणाम् ॥३८
नाधीयंते तदा वेदान्न यजंते द्विजातयः ।
उत्सीदंति नराश्चैव क्षत्रियाश्च विशः क्रमात् ॥३९
शूद्राणामंत्ययोनेस्तु संबंधा ब्राह्मणैः सह ।
भवंतीह कलौ तस्मिञ्छयनासनभोजनेः ॥४०
राजानः शूद्रभूयिष्ठाः पाखंडानां प्रवर्त्तकाः ।
गुणहीनाः प्रजाश्चैव तदा वै संप्रवर्त्तते ॥४१
आयुर्मेधा बलं रूपं कुलं चैव प्रणश्यति ।
शूद्राश्च ब्राह्मणाचाराः शूद्राचाराश्च ब्राह्मणाः ॥४२

११० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

बुरे मनोरथ-असद् विषयों का अध्ययन-बुरे पाप कर्म-बुरे शास्त्र और प्रजाओं के कुत्सित कर्मों के दोषों से ही भय उत्पन्न हो जाया करता है ।३६। हिंसा-माया-ईर्ष्या-क्रोध-निन्दा और अक्षमा-राग और सब प्रकार लोभ कलियुग में जन्तुओं में और मनुष्यों में होते हैं ।३७। अत्यधिक संक्षोभ कलियुग के प्राप्त होने पर समुत्पन्न हो जाता है । उस समय में मानवों की परमायु पूरे सहस्र वर्ष की होती है ।३८। उस समय में द्विजातिगण वेदों का अध्ययन नहीं किया करते हैं और न वे यजन ही किया करते हैं । सभी नर-क्षत्रिय और वैश्य क्रम से उत्पन्न हो जाया करते हैं ।३६। शूद्रों के ब्राह्मणों साथ अन्त्यजों से सम्बन्ध होते हैं और उस कलियुग में शय-आसर और भोजन का सब परस्पर में सम्बन्ध किया करते हैं ।४०। राजाओं में बहुधा शूद्र वर्ण वालों की अधिकता होती है जो कि पाखण्डों के प्रवर्त्तक ही हुआ करते हैं । उस समय में प्रजाजनों में भी गुणों की हीनता संप्रवृत होती है ।४१। न तो मानवों में मेधा होती है और न उनकी कुछ आयु ही होती है । बल-रूप और कुल सभी विनष्ट हो जाया करते हैं । जो शूद्र वर्ण वाले मानव हैं उनके आचार तो ब्राह्मणों के समान होते हैं और ब्राह्मण शूद्रों के तुल्य आचरण किया करते हैं ।४२।

राजवृत्ताः स्थिताश्चोराश्चोराचाराश्च पार्थिवाः । भृत्या एते ह्यसुभृतो युगांते समवस्थिते ॥४३

अशीलिन्योऽनृताश्चैव स्त्रियो मद्यामिषप्रियाः । मायाविन्यो भविष्यंति युगांते मुनिसत्तम ॥४४

एकपत्न्यो न शिष्यंति युगांते मुनिसत्तम । श्वापदप्रबलत्वं च गवां चैव ह्युपक्षयः ॥४५

साधूनां विनिवृत्तिश्च विद्यास्तस्मिन्युगक्षये । तदा धर्मो महोदर्को दुर्लभो दानमूलवान् ॥४६

चातुराश्रमशैथिल्यो धर्मः प्रविचरिष्यति । तदा ह्यल्पफला भूमिः क्वचिच्चापि महाफला ॥४७

न रक्षितारो भोक्तरो बलिभागस्य पार्थिवाः । युगान्ते च भविष्यंति स्वरक्षणपरायणाः ॥४८

चतुर्युगाख्यानवर्णनम् । [ १११

अरक्षितारो राजानो विप्राः शूद्रोपजीविनः । शूद्राभिवादिनः सर्वे युगान्ते द्विजसत्तमाः ॥४६

चौर्यं कर्म करने वाले पुरुष राजाओं के समान आचरण वाले हैं और जो पार्थिव हैं वे चोरों के समान आचरण करने वाले हैं। इस युग के अन्त समय के उपस्थित होने पर भृत्यगण प्राणों का भरण करने वाले हैं ।४३। नारियां शील से शून्य-मिथ्याचार वाली तथा मदिरा और मांस से प्रेम करने वाली होती हैं। हे मुनि श्रेष्ठ ! इस युग के अन्त में सभी स्त्रियां माया रचने वाली होती हैं ।४४। पुरुष भी एक ही पत्नी रखने के व्रत वाले नहीं होते हैं । हे मुनिसत्तम ! युग के अन्त समय में सर्वत्र ऐसा ही दिखलाई देता है । सब जगह अन्य पशुओं की प्रबलता होती है और गौओं के कुल का क्षय होता है ।४५। उस युग के क्षय में साधुजनों की विशेष रूप से निवृत्ति होती है। ऐसा ही जान लेना चाहिए। उस समय में अपने आपको बहुत ऊंचा उठाना ही धर्म है और दान के मूल वाला धर्म परम दुर्लभ होता है ।४६। ब्रह्मचर्य गार्हस्थ्य-वानप्रस्थ और संस्थान—इन चारों आश्रमों की शिथिलता वाला धर्म ही सब जगह चलेगा । उस समय में भूमि भी अल्प फल देने वाली होती है और कहीं पर महान् फल वाली होगी ।४७। राजा लोग केवल अपनी बलि का भोग करने वाले होंगे और प्रजा की रक्षा करने वाले नहीं होंगे । और युग के अन्त में ये नृपगण अपनी ही रक्षा करने में तत्पर रहा करेंगे । राजा लोग संरक्षण नहीं करने वाले और विप्रगण शूद्रों से उपजीविका चलाने वाले हो जायेंगे । और युग के अन्त में श्रेष्ठ द्विजगण भी शूद्रों के अभिवादन करने वाले हो जायेंगे ।४८-४६।

अट्टशूला जनपदाः शिवशूला द्विजास्तथा ।
प्रमदाः केशशूलाश्च युगान्ते समुपस्थिते ॥५०
तपोयज्ञफलानां च विक्रेतारो द्विजोत्तमाः ।
यतयश्च भविष्यंति बहवोऽस्मिन्कलौ युगे ॥५१
चित्रवर्षी यदा देवस्तदा प्राहुर्युगक्षयम् ।
सर्वे वाणिजकाश्चापि भविष्यन्त्यधमे युगे ॥५२
भूयिष्ठं कूटमानैश्च पण्यं विक्रीणते जनाः ।
कुशीलचर्यापाखंडैर्व्याधिरूपैः समावृतम् ॥५३

११२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

पुरुषालपं बहुस्त्रीकं युगान्ते समुपस्थिते । बाहुयाचनको लोको भविष्यति परस्परम् ॥५४ अव्याकर्त्ता क्रूरवाक्या नार्जवो नानसूयकः । न कृतो प्रतिकर्त्ता च युगे क्षीणे भविष्यति ॥५५ अशंका चैव पतिते युगान्ते तस्य लक्षणम् । ततः शून्या वसुमती भविष्यति वसुन्धरा ॥५६

सभी जनपद अट्टालिकाओं के शूल वाले हैं और शिव के शूल वाले सब द्विजातिगण हैं। इस युगान्त से समुपस्थित होने पर सभी प्रमदायें केशों के शूल वाली हैं ।५०। श्रेष्ठ द्विज भी अपनी तपस्या और यज्ञों के फल को द्रव्य लेकर बेच देने वाले हो जायेंगे । इस कलियुग में काषाय वस्त्रों के धारण करने वाले बहुत से यतिगण हो जायेंगे ।५१। जिस समय में विचित्र ढङ्ग से इन्द्रदेव वर्षा करने वाले हो जायेंगे उस समय में इस युग की क्षय कहते हैं । इस आधार युग में सभी वर्णों के मानव वाणिज्य व्यवसाय करने वाले हो जायेंगे ।५२। मनुष्य कूटमानों के द्वारा अधिक पण्य वस्तुओं का विक्रय किया करते हैं वह पण्य कुशील चर्या-पाखण्ड-ईर्ष्या और अन्यों से समावृत होगा ।५३। पुरुष के रूप से युक्त मनुष्य बहुत स्त्रियों वाला इस युग के अन्त के उपस्थित होने पर होंगे । लोग परस्पर में बहुत याचना करने वाले होंगे ।५४। इस युग के क्षीण होने पर मनुष्य प्रायः अव्याकर्त्ता-क्रूर वाक्य बोलने वाला-कुटिल-निन्दक और किए हुए उपकार का प्रत्युपकार न करने वाला होगा ।५५। इस युग के अन्त में यही उसका लक्षण है कि पतित में कोई भी शंका नहीं होती है अर्थात् निश्शङ्क होकर पतित व्यक्ति से सम्बन्ध स्थापित रक्खा करते हैं। इसके पश्चात् यह वसुमती वसुन्धरा शून्य हो जायगी ।५६।

गोप्तारश्चाप्यगोप्तारः प्रभविष्यंति शासकाः । हर्त्तारः पररत्नानां परदारविमर्शकाः ॥५७ कामात्मानो दुरात्मानो ह्यधमाः साहसाप्रियाः । प्रनष्टचेतना धूर्त्ता मुक्तकेशास्त्ववैशूलिनः ॥५८ ऊनषोडशवर्षाश्च प्रजायन्ते युगक्षये । शुक्लदंता जिताक्षाश्च मुण्डाः काषायवाससः ॥५९

चतुर्युगाख्यानवर्णनम् ] [ ११३

शूद्रा धर्मं चरिष्यंति युगान्तो समुपस्थिते ।
सस्यचोरा भविष्यंति तथा चैलापहारिणः ॥६०
चोराच्चोराश्च हर्त्तारो हर्तुर्हर्त्ता तथापरः ।
ज्ञानकर्मण्युपरते लोके निष्क्रियतां गते ॥६१
कीटमूषकसर्पाश्च धर्षयिष्यंति मानवान् ।
अभीक्ष्णं क्षेममारोग्यं सामर्थ्यं दुर्लभं तथा ॥६२
कौशिकान्प्रतिवत्स्यंति देशाः क्षुद्भयपीडिताः ।
दुःखेनाभिप्लुतानां च परमायुः शतं तदा ॥६३

जो रक्षक हैं वे भी रक्षा नहीं करने वाले शासक हो जायेंगे । ये दूसरों के रत्नों का हरण करने वाले तथा दूसरों की स्त्रियों से विमर्श करने वाले हो जायेंगे ।५७। सभी लोग काम वासना से परिपूर्ण—दुष्ट भावों वाले—बहुत अशूम और दुस्साहस से प्रेम करने वाले—नष्ट चेष्टा वाले—धूर्त्त—अमृली केशों को खुले हुए रखने वाले होंगे ।५८। इस युग के क्षय में सोलह वर्ष से भी छोटी उम्र वाले सन्तान का प्रजानन किया करते हैं। शुक्ल दन्तों वाले—जिताक्ष—मुण्डित शिर वाले और काषाय रङ्ग के वस्त्रों के धारण करने वाले होंगे ।५९। युगान्त के उपस्थित होने पर शूद्र लोग धर्म का आचरण करेंगे । लोग धान तथा फसल की चोरी करने वाले और वस्त्रों का अपहरण करने वाले होंगे ।६०। चोर से हरण करने वाले चोर तथा हरणकर्त्ता से दूसरे हरण करने वाले हो जायेंगे । ज्ञान पूर्वक कर्मों के उपरत हो जाने पर समस्त लोक निष्क्रियता को प्राप्त हो जायगा ।६१। कीड़े-मूषक और सर्प मानवों को प्रधर्षित करेंगे । उसी प्रकार से बराबर क्षेम कुशल-आरोग्य और सामर्थ्य सभी बहुत दुर्लभ हो जायेंगे । भूख के भय से पीड़ित मनुष्यों के देश कौशिकों को प्रति वास दिया करेंगे । इस प्रकार से दुःखों से जब मनुष्य पूर्ण रूप से अभिप्लुत होंगे तो उनकी उस समय से परमायु सौ वर्ष की ही रह जायगी ।६२-६३।

दृश्यंते च न दृश्यंते वेदा कलियुगेऽखिलाः ।
तत्सीदन्तो तथा यज्ञाः केवलाधर्मपीडिताः ॥६४
वेदविक्रयिणश्चान्ये तीर्थविक्रयिणोऽपरे ॥६५

११४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

वर्णाश्रमाणां ये चान्ये पाखण्डाः परिपंथिनः । उत्पद्यंते तदा ते वै संप्राप्ते तु कलौ युगे ॥६६ अधीयंते तदा वेदाञ्छूद्रा धर्मार्थकोविदाः । यजंते चाश्वमेधेन राजानः शूद्रयोनयः ॥६७ स्त्रीबालगोवधं कृत्वा हत्वान्ये च परस्परम् । अपहृत्य तथाऽन्योन्यं साधयंति तदा प्रजाः ॥६८ दुःखप्रवचनाल्पायुर्देहाल्पायुश्च रोगतः । अधर्माभिनिवेशित्वात्तमोवृत्तं कलौ स्मृतम् ॥६६ प्रजासु भ्रूणहत्या च तदा वैरात्प्रवर्त्तते । तस्मादायुर्बलं रूपं कलि प्राप्य प्रहीयते ॥७०

इस कलियुग मैं समस्त वेद दिखलाई दिया करते हैं अथवा नहीं दिखाई देते हैं। उसी प्रकार से इसलिए यज्ञ अधर्म से पीड़ित होकर दुःखित होते हैं।६४। इस घोर कलियुग के सम्प्राप्त होने पर इस जगती तल में कषाय वर्ण को वस्त्र धारण करने वाले संन्यासी के वेषधारी—निग्रन्थ तथा कापालक लोग बहुत दिखाई दिया करते हैं। कुछ अन्य वेदों का विक्रय करने वाले हैं अर्थात् धन लेकर वेद के मन्त्रों को पढ़ने वाले हैं और दूसरे तीर्थों को बेचने वाले हैं और अन्य लोग ऐसे हैं जो वर्णों और आश्रमों का कोश पाखण्ड दिखाया करते हैं और वास्तव में इन वर्णाश्रमों के विरोधी शत्रु होते हैं। ऐसे ही लोग बहुधा उत्पन्न हो जाता करते हैं।६५-६६। धर्म के अर्थ के पण्डित बनने वाले शूद्र लोग उस समय में वेदों का अध्ययन किया करते हैं जिनको वेदों के पढ़ने का शास्त्रानुसार कभी भी अधिकार नहीं होता है। शूद्र योनि वाले अश्वमेध यज्ञ का यजन किया करते हैं।६७। वह ऐसा महान् घोर समय होगा कि उसमें स्त्रियों का—गौओं का और छोटे-छोटे निरीह बालकों का वध करके और आपस में ही एक दूसरे का वध दूसरे लोग किया करते हैं तथा पारस्परिक वध करके ही प्रजा का साधन किया करते हैं।६८। दुःखों के तथा मिथ्या प्रवचनों के होने से अल्प आयु हो जाती है और रोगों के कारण भी उम्र छोटी हो जाया करती है। सबके हृदयों में अधर्म का ही विशेष अभिनिवेश होने से इस कलियुग में सर्वत्र तमोगुण का ही बोलबाला रहेगा ऐसा बताया गया है।६६। उस समय

चतुर्युगाख्यान वर्णनम् ] [ ११५

में प्रजाओं में भ्रूणों की अर्थात् गर्भस्थ शिशुओं की हत्याएं बैर के कारण हुआ करेगी । इसी कारण से कलियुग को प्राप्त करके लोगों की आयु-बल विक्रम तथा रूप का सौन्दर्य सभी नष्ट हो जाया करते हैं ॥७०॥ तदा चाल्पेन कालेन सिद्धिं गच्छन्ति मानवाः । धन्या धर्मं चरिष्यन्ति युगान्तो द्विजसत्तमाः ॥७१ श्रुतिस्मृत्युदितं धर्मं ये चरंत्यनसूर्यकाः । त्रेतायामाब्दिको धर्मो द्वापरे मासिकः स्मृतः ॥७२ यथाशक्ति चरन्प्राज्ञस्तदह्ना प्राप्नुयात्कलौ । एषा कलियुगावस्था संध्यांशं तु निबोधत ॥७३ युगे युगे तु हीयंते त्रित्रिपादास्तु सिद्धयः । युगस्वभावात्संध्यासु तिष्ठन्तीह तु यादृशः ॥७४ संध्यास्वभावाः स्वांशेषु पादशेषाः प्रतिष्ठिताः । एवं संध्यांशके काले संप्राप्ते तु युगांतिके ॥७५ तेषां शास्ता ह्यसाधूनां भृगूणां निधनोत्थितः । गोत्रेण वै चन्द्रमसो नाम्ना प्रमतिरुच्यते ॥७६ माधवस्य तु सांशेन पूर्वं स्वायंभुवेऽन्तरे । समाः स विंशतिः पूर्णाः पर्यटन्वै वसुन्धराम् ॥७७

उस कलियुग में मनुष्य थोड़े समय में सिद्धि को प्राप्त कर लिया करते हैं—इस युग की विशेषता है । इस युग के अन्त में वे मानव और श्रेष्ठ द्विज परम धन्य हैं जो धैर्य का समाचरण किया करते हैं ॥७१॥ जो अनिन्दित मानव श्रुति और स्मृतियों में कहे हुए धर्म का समाचरण किया करते हैं । ऐसा धर्म त्रेतायुग में एक वर्ष में बलवान् एवं पूर्ण होता है वही धर्म द्वापर में एक मास में साङ्ग सफल होता है और वही धर्म इस कलियुग में अपनी शक्ति के अनुसार समाचरित होने पर एक ही दिन में प्राज्ञ प्राप्त कर लिया करता है । यह कलियुग के समय की अवस्था है अब इस कलि के सन्ध्या का अंश समझ लो ॥७२-७३॥ युग-युग में सिद्धियाँ तीन-तीन पाद क्षीण हुआ करती हैं जैसा भी युग-स्वभाव से सन्ध्याओं में यहाँ पर स्थित रहा करती हैं जैसा भी युग का स्वभाव हो ॥७४। उनके अपने अंशों में संध्या के

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स्वभाव पाद शेष प्रतिष्ठित होते हैं। इसी प्रकार से युगान्तिक काल के सम्प्राप्त होने पर सन्ध्या के अंश में होता है ।७५। उन असाधु भृगुओं का शासन करने वाला निधनतोत्थित है । वह चन्द्रमा के गोत्र से है और नाम से प्रमति कहा जाया करता है ।७६। वह पूर्व स्वायम्भुव अन्तर में माधव के अंश से पूर्ण बीस पर्यन्त इस वसुन्धरा पर पर्यटन करता था ।७७।

अनुकर्षन्स वै सेनां सवाजिरथकुंजराम् ।
प्रगृहीतायुधैर्विप्रैः शतशोऽथ सहस्रशः ॥७८
स तदा तै परिवृतो म्लेच्छांन्हंति स्म सर्वशः ।
सह वा सर्वशश्चैव राज्ञस्ताञ्छूद्रयोनिजान् ॥७९
पाखण्डांस्तु ततः सर्वान् निःशेषं कृतवान्विभुः ।
तात्यर्थं धार्मिका ये च तान्सर्वांन्हंति सर्वशः ॥८०
वर्णव्यत्यासजातांश्च ये च ताननुजीविनः ।
उदीच्यान्मध्यदेश्यांश्च पर्वतीयांस्तथैव च ॥८१
प्राच्यान्प्रतीच्यांश्च तथा विन्ध्यपृष्ठचरानपि ।
तथैव दाक्षिणायांश्च द्रविहान्सिहलैः सह ॥८२
गांधारान्पारदांश्चैव प्रह्लवान्यवनाञ्शकान् ।
तुषारान्बर्बरांचीनाञ्छूलिकान्दरदान् खशान् ॥८३
लंपाकारान्सकलकान्किरातानां च जातयः ।
प्रवृत्तचक्रो बलवाम्म्लेच्छानामंतकृत्प्रभुः ॥८४

वह घोड़े-रथ और हाथियों के सहित सेना का अनुकर्षण करके सैकड़ों सहस्रों की संख्या में हथियार ग्रहण करने वाले विप्रों से समन्वित था ।७८। उस समय में इन सबसे परिवृत होते हुए उसने सभी ओर से म्लेच्छों का हनन किया था । उनके साथ ही अथवा सभी ओर से उन शूद्र योनि में समुत्पन्न राजाओं का भी हनन कर दिया था ।७९। पाखण्ड से जो परिपूर्ण थे फिर उन सबका उस विभु ने कर दिया था । जो अत्यधिक कर्म के मानने वाले नहीं थे उन सबको सभी ओर में पूर्णतया हनन करता है ।८०। जो लोग वर्णों के व्यत्यास से समुत्पन्न हुए थे अर्थात् वर्णसङ्कर थे और जो उनके अनुजीवी थे । चाहे वे उत्तर दिशा में रहने वाले होवें या

चतुर्युगसंख्यावर्णनम् ] [ ११७

अन्य देश के होवें तथा पर्वतों में निवास करने वाले होवें ।८१। दिशा में रहने वाले हों या पश्चिम में रहते हों अथवा विन्ध्याचल के पृष्ठ पर सञ्चरण करने वाले भी होवें। उसी भाँति जो दाक्षिणात्य थे, द्रविड़ थे और सिंहल थे ।८२। गान्धार-पारद-पह्लव-यवन-शक-तुषार-बर्बर-चीन- शूलिक-दरद-खश । लम्पाकार-सकतक और जो भी किरातों की जातियाँ थीं । इन सभी का म्लेच्छों का वह बलशाली प्रभु चक्र ग्रहण करके अन्त कर देने वाला था ।८३-८४।

अदृष्टः सर्वभूतानां चचाराथ वसुन्धराम् । माधवस्य तु सोऽंशेन देवस्येह विजज्ञिवान् ॥८५ पूर्वजन्मनि विख्यातः प्रमतिर्नाम वीर्यवान् । गोत्रतो वै चंद्रमसः पूर्वे कलियुगे प्रभुः ॥८६ द्वात्रिंशेऽभ्युदिते वर्षे प्रक्रांतो विंशतीः समाः । विनिघ्नन्सर्वभूतानि मानवानेव सर्वशः ॥८७ कृत्वा बीजावशेषं तु पृथ्व्यां क्रूरेण कर्मणा । परस्परं निमित्तेन कोपेनाकस्मिकेन तु ॥८८ सुसाधयित्वा वृषलान्प्रायशस्तानधार्मिकान् । गंगायमुनयोर्मध्ये निष्ठां प्राप्तः सहानुगः ॥८९ ततो व्यतीते कल्पे तु सामान्ये सहसैनिकः । उत्साद्य पार्थिवान्सर्वानम्लेच्छांश्चैव सहस्रशः ॥६० तत्र संध्यांशके काले संप्राप्ते तु युगांतके । स्थितस्वल्पावशिष्टासु प्रजास्विह क्वचित्क्वचित् ॥६१

समस्त प्राणियों के दर्शन में न आने वाला वह सम्पूर्ण वसुन्धरा पर विचरण किया करता था। वह वहाँ पर देव माधव के अंश से जाना गया था ।८५। वह पूर्व जन्म में महान् वीर्य वाला प्रमति के नाम से प्रसिद्ध था। वह प्रभु पूर्व कलियुग में चन्द्रमा के गोत्र से था ।८६। बत्तीसवें वर्ष के अभ्युदित हो जाने पर वह बीस वर्ष तक प्रक्रान्त हुआ था। सभी प्राणियों का और सभी ओर में मानवों का विहनन करते हुए उसने परिभ्रमण किया था ।८७। अकस्मात् परस्पर में समुत्पन्न कोप से उसने क्रूर कर्म से पृथ्वी में बीजावशेष कर दिया था। उसमें जो वृषल थे उनको और प्रायः अधार्मिक

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माषवों का सुसाधित किया था उसने अपने अनुचरों के साथ गंगा और यमुना के मध्य में बड़ी निष्ठा प्राप्त करली थी ।८८-८६। इसके अनन्तर सामान्य कल्प के व्यतीत हो जाने पर अपने सैनिकों के साथ रहकर सभी सहस्रों म्लेच्छों को और राजाओं का उत्पादन कर दिया था ।६०। यहाँ पर युग के अन्त कर लेने वाले सन्ध्या के अंश के सम्प्राप्त होने पर यहाँ पर कहीं-कहीं पर बहुत ही थोड़ी प्रजा अवशिष्ट रह गयी थी ।६१।

अपग्रहास्ततस्ता वै लोभाविष्टास्तु वृंदशः । उपहिंसंति चान्योन्यं पोथयंतः परस्परम् ॥६२ अराजके युगवशात्संसंक्षये समुपस्थिते । प्रजास्ता वै ततः सर्वाः परस्परभयाद्दिताः ॥६३ व्याकुलाश्च परिभ्रांतास्त्यक्त्वा दारान्गृहाणि च । स्वान्प्राणाननपेक्षंतो निष्कारणसुदुःखिताः ॥६४ नष्टे श्रौते स्मृतौ धर्मे परस्परहतास्तदा । निर्मर्यादा निराक्रन्दा निःस्नेहा निरपत्रपाः ॥६५ नष्टे धर्म प्रतिहता ह्रस्वकाः पंचविंशतिम् । हित्वा पुत्रांश्च दारांश्च विषाद्व्याकुलेंद्रियाः ॥६६ अनावृष्टिहताश्चैव वार्त्तामुत्सृज्य दुःखिताः । प्रत्यंतांस्ता निषेवंते हित्वा जनपदान्स्वकान् ॥६७ सरितः सागरानूपान्सेवंते पर्वतांस्तथा । मांसेर्मूलफलैश्चैव वर्तयंतः सुदुःखिताः ॥६८

वे अप ग्रहण करने वाले तथा झुण्ड के झुण्ड लोभ में आविष्ट हुए परस्पर में एक दूसरे का पोथन करते हुए उपहनन किया करते हैं ।६२। जब कोई भी समुचित शासन करने वाला नहीं था और सर्वत्र अराजकता फैली हुई थी तथा युग के प्रभाव के कारण सर्वत्र संशय प्राप्त हो गया था । फिर वह सभी प्रजा आपस में भय से उत्पीड़ित हो गये थे ।६३। वे सब बहुत व्याकुल हो गये थे और अपनी पत्नियों तथा गृहों को भी छोड़कर इधर-उधर परिभ्रमण कर रहे थे । बिना ही किसी कारण के बहुत अधिक दुःखित होकर अपने प्राणों की अपेक्षा नहीं करने वाले हो गये थे ।६४। श्रौत

चतुर्युगाख्यानवर्णनम् ] [ ११६

और स्मार्त्त धर्म के विनष्ट हो जाने पर वे उस समय में हत हो रहे थे । उन्होंने अपनी मर्यादा का त्याग कर दिया था और वे निराक्रन्द हो गये थे उनमें किसी के प्रति भी स्नेह नहीं था तथा वे लज्जाहीन हो गये थे ।६५। धर्म के विनष्ट हो जाने पर वे छोटे पच्चीस वर्ष में ही प्रतिहत हो जाते हैं । वे अपने पुत्रों को-पत्नियों को छोड़कर विवाद से व्याकुलित इन्द्रियों वाले हो जाते हैं ।६६। वर्षा न होने के कारण बहुत हत हो जाया करते हैं और वार्त्ता को त्याग कर परम दुःखित होते हैं । वे सब प्रजानन अपने जनपदों को त्याग कर प्रत्यन्तों का सेवन किया करते हैं ।६७। कुछ लोग नदियों का—सागरों का—अनूपों का और पर्वतों का सेवन किया करते हैं और परम दुःखित होते हुए अपनी उदरपूर्ति मांस और मूलों के द्वारा किया करते हैं ।६८।

चीरपत्राजिनधरा निष्क्रिया निष्परिग्रहाः ।
वर्णाश्रमपरिभ्रष्टाः संकरं घोरमास्थिताः ।
एतां काष्ठामनुप्राप्ता अल्पशेषाः प्रजास्ततः ॥६६
जराव्याधिक्षुधाविष्टा दुःखान्निर्वेदमागमन् ।
विचारणा तु निर्वेदात्साम्यावस्था विचारणात् ॥१००
साम्यावस्थात्मको बोधः संबोधाद्धर्मशीलता ।
तासूपशमयुक्तासु कलिंशिष्टासु वै स्वयम् ॥१०१
अहोरात्रं तदा तासां युगान्ते परिवर्त्तनि ।
चित्तसंमोहनं कृत्वा तासां वै सुप्तमत्तवत् ॥१०१
भाविनोऽर्थस्य च बलात्ततः कृतमवर्त्तत ।
प्रवृत्ते तु ततस्तस्मिन्पूते कृतयुगे तु वै ॥१०३
उत्पन्नाः कलिंशिष्टासु प्रजाः कार्त्तयुगास्तदा ।
तिष्ठंति चेह ये सिद्धा अदृष्टा विचरंति च ।४१०४
सह सप्तर्षिभिश्चैव तत्र ते च व्यवस्थिताः ।
ब्रह्मक्षत्रविशः शूद्रा बीजार्थं ये स्मृता इह ॥१०५

वस्त्रों के अभाव में सब लोग चीर, पत्र और चर्म को धारण करने वाले हैं । उनके पास कोई भी काम नहीं है अर्थात् एकदम कर्म शून्य है

१२० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

और न उनके पास कुछ समान है। वर्णों और आश्रमों से परिभ्रष्ट हैं अर्थात् न उनका कोई वर्ण है और न कोई आश्रम ही रहा गया है। वे सब परम घोर सङ्कर में समास्थित है। बहुत ही थोड़े से बचे ने प्रजाजन फिर इस दिशा में आकर प्राप्त हुए हैं ।९९। वे बुढ़ापे और व्याधियों तथा भूख से समाविष्ट हैं और परमाधिक दुःख से निर्वेद को प्राप्त हो गये हैं। निर्वेद से उनको विचारणा उत्पन्न हुई और विचारणा से वे साम्य की अवस्था को प्राप्त हो गये हैं ।१००। साम्यावस्था के स्वरूप वाला उनको बोध हो गया था और उस भले ज्ञान से धर्म का स्वभाव हो गया था। कलि में शिष्ट वे स्वयं उपशम से अवस्था में प्राप्त हो गये थे ।१०१। उस समय मैं उनके अहो- रात्र (रात दिन) युगान्त के परिवत्तित होने पर उनके चित्त का संमोहन हो गया था और वे सब एक सोये हुए तथा प्रमत्त व्यक्ति के समान ही हो गये थे ।१०२। यह सब आगे होने वाले अर्थ के ही कारण से बलात् हुआ था। इसके अनन्तर कृतयुग हुआ था। फिर उस परम पूत कृतयुग के प्रवृत्त हो जाने पर उस समय में जो कलियुग में अवशिष्ट प्रजाएँ थीं उनमें सत्युग में होने वाली प्रजा ने जन्म ग्रहण किया था। जहाँ पर जो भी सिद्ध स्थित रहते हैं वे बिना किसी के द्वारा देखे गुप्त स्वरूप से विचरण किया करते हैं। वहाँ पर वे सप्तर्षियों के साथ व्यवस्थित हैं। यहाँ पर जो बीज के लिये ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य और शूद्र कहे गये हैं ।१०३-१०४-१०५।

कलिजैः सह ते संति निर्विशेषास्तदाभवन् ।
तेषां सप्तर्षयो धर्मं कथयंतीतरेषु च ॥१०६
वर्णाश्रमाचारयुक्तः श्रौतः स्मार्त्तो द्विधा तु सः ।
ततस्तेषु क्रियावत्सु वर्तंते वै प्रजाः कृते ॥१०७
श्रौतस्मार्त्ते कृतानां च धर्मे सप्तर्षिदर्शिते ।
केचिद्धर्मव्यवस्थार्थं तिष्ठंतीहायुगक्षयात् ॥१०८
मन्वंतराधिकारेषु तिष्ठंति मुनयस्तु वै ।
यथा दावप्रदग्धेषु तृणेष्विह तपेन तु ॥१०६
वनानां प्रथमं वृष्ट्या तेषां मूलेषु संभवः ।
तथा कार्तयुगानां तु कलिजेष्विह संभवः ॥११०
एवं युगो युगस्येह संतानस्तु परस्परम् ।

चतुर्युगाख्यानवर्णनम् ] [ १२१

वर्त्तंते ह्यव्यवच्छेदाद्यावन्मन्वंतरक्षयः ॥१११ सुखमायुर्बलं रूपं धर्मोऽर्थः काम एव च । युगेष्वेतानि हीयंते त्रित्रिपादाः क्रमेण च ॥११२

वे सब कलियुग में समुत्पन्न हुओं के साथ ही हैं और उस समय में विशेषता से रहित ही हैं। उनके इतरों में यहाँ पर सप्तर्षिगण धर्म को कहते हैं ।१०६। वह धर्म वर्णों और आश्रमों से आचार से युक्त वैदिक तथा स्मृतियों के द्वारा प्रतिपादित दो प्रकार का है । इसके अनन्तर कृतयुग में उन क्रियाशीलों में निश्चय ही प्रजा होती है ।१०७। कृतयुग के मनुष्यों का सप्तर्षियों के द्वारा प्रदर्शित श्रौत और स्मार्त्त धर्म हैं। यहाँ पर कुछ लोग धर्म की व्यवस्था के लिए युगक्षय से स्थित रहते हैं ।१०८। मन्वन्तर के अधिकारों मुनिगण स्थित रहा करते हैं जिस प्रकार से ताप दावाग्नि के द्वारा प्रदग्ध तृणों में रहते हैं ।१०६। प्रथम वृष्टि से उन वनों के भूतों में समुत्पत्ति होती है । ठीक उसी भाँति कलियुग में समुत्पन्न व्यक्तियों से कृतयुग के व्यक्तियों की उत्पत्ति होती है ।११०। इसी रीति से यहाँ पर युग की ही सन्तान परस्पर में युग हुआ करता है । जब तक वर्तमान मन्वन्तर का क्षय होता है तब तक बिना किसी व्यवच्छेद के इसी प्रकार से युग से दूसरे युग की समुत्पत्ति हुआ करती है ।१११। निम्न सब बातें सुख-आयु-बल रूप-धर्म-अर्थ और काम ये सभी क्रम से युगों में तीन-तीन पाद क्षीण हुआ करते हैं ।११२।

ससंध्यांशेषु हीयंते युगानां धर्मसिद्धयः । इत्येष प्रतिसंधिर्यः कीर्त्तितस्तु मया द्विजाः ॥११३ चतुर्युगानां सर्वेषामेतेनैव प्रसाधनम् । एषा चतुर्युगावृत्तिरासहस्राद्गुणीकृता ॥११४ ब्रह्मणस्तदहः प्रोक्तं रात्रिश्चैतावती स्मृता । अत्रार्जवं जडीभावो भूतानामायुगक्षयात् ॥११५ एतदेव तु सर्वेषां युगानां लक्षणं स्मृतम् । एषा चतुर्युगानां च गुणिता ह्येकसप्ततिः ॥११६ क्रमेण परिवृत्ता तु मनोरंतरमुच्यते ।

१२२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

चतुर्युगे यथैकस्मिन्भवन्तीह यथा तु यत् ।।११७ तथा चान्येषु भवति पुनस्तद्वद्यथाक्रमम् । सर्गे सर्गे तथा भेदा उत्पद्यंते तथैव तु ।।११८ पंचत्रिंशत्परिमिता न न्यूना नाधिकाः स्मृताः । कथा कल्पा युगैः सार्द्धं भवंति सह लक्षणैः । मन्वंतराणां सर्वेषामेतदेव तु लक्षणम् ।।११९

सन्ध्यांशों में युगों की धर्म सिद्धियों का ह्रास हुआ करता है । इस प्रकार से यह जो प्रति सन्धि है । हे द्विजो ! मैंने कीर्त्तित कर दी हैं ।११३। इसी से चारों युगों का सबका प्रसाधन है। यह चारों युगोंकी आवृत्ति सहस्र से लेकर गुणीकृत है ।११४। यह ब्रह्मा का दिन कहा गया है । जितना बड़ा दिन होता है उतनी ब्रह्माजी की रात्रि हुआ करती है । यहाँ पर युग क्षय से लेकर भूतों का जो सोधापन है वह जड़ी मान होता है ।११५। यही ही समस्त युगों का लक्षण कहा गया है । यह चारों युगों की चौकड़ी अब इकहत्तर हो जाया करती ।११६। जब क्रम से यह चौकड़ियां इकहत्तर समाप्त होकर दूसरी बदलती हैं तभी दूसरे मनु का अन्तर हुआ करता है । चारों युगों की चौकड़ी में किस प्रकार से यहाँ होती है उसी प्रकार से यह होता है ।११७। उसी भाँति अन्यों में होता है और फिर उसी के समान यथा क्रम से हुआ करता है । उसी प्रकार से प्रत्येक सर्ग में भेद उत्पन्न हुआ करते हैं ।११८। ये पैंतीस परिमित ही हैं और न इनसे कम हैं और न अधिक होते हैं ऐसा ही बताया गया है । उसी रीति से कल्प युगों के साथ लक्षणों के होते हैं । समस्त मन्वन्तर का यह ही लक्षण होता है ।११९।

यथा युगानां परिवर्त्तनानि चिरप्रवृत्तानि युगस्वभावात् । तथा न संतिष्ठति जीवलोकः क्षयोदयाभ्यां परिवर्त्तमानः ।।१२० इत्येतल्लक्षणं प्रोक्तं युगानां वै समासतः ।।१२१ अतीतानागतानां हि सर्वमन्वंतरेष्विह । मन्वंतरेण चैकेन सर्वाण्येवांतराणि वै ।।१२२ ख्यातानीह विजानीध्वं कल्प कल्पेन चैव ह । अनागतेषु तद्वच्च तर्कः कार्यो विजानता ।।१२३