संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्युगसंख्यावर्णनम् ] [ ११७
अन्य देश के होवें तथा पर्वतों में निवास करने वाले होवें ।८१। दिशा में रहने वाले हों या पश्चिम में रहते हों अथवा विन्ध्याचल के पृष्ठ पर सञ्चरण करने वाले भी होवें। उसी भाँति जो दाक्षिणात्य थे, द्रविड़ थे और सिंहल थे ।८२। गान्धार-पारद-पह्लव-यवन-शक-तुषार-बर्बर-चीन- शूलिक-दरद-खश । लम्पाकार-सकतक और जो भी किरातों की जातियाँ थीं । इन सभी का म्लेच्छों का वह बलशाली प्रभु चक्र ग्रहण करके अन्त कर देने वाला था ।८३-८४।
अदृष्टः सर्वभूतानां चचाराथ वसुन्धराम् । माधवस्य तु सोऽंशेन देवस्येह विजज्ञिवान् ॥८५ पूर्वजन्मनि विख्यातः प्रमतिर्नाम वीर्यवान् । गोत्रतो वै चंद्रमसः पूर्वे कलियुगे प्रभुः ॥८६ द्वात्रिंशेऽभ्युदिते वर्षे प्रक्रांतो विंशतीः समाः । विनिघ्नन्सर्वभूतानि मानवानेव सर्वशः ॥८७ कृत्वा बीजावशेषं तु पृथ्व्यां क्रूरेण कर्मणा । परस्परं निमित्तेन कोपेनाकस्मिकेन तु ॥८८ सुसाधयित्वा वृषलान्प्रायशस्तानधार्मिकान् । गंगायमुनयोर्मध्ये निष्ठां प्राप्तः सहानुगः ॥८९ ततो व्यतीते कल्पे तु सामान्ये सहसैनिकः । उत्साद्य पार्थिवान्सर्वानम्लेच्छांश्चैव सहस्रशः ॥६० तत्र संध्यांशके काले संप्राप्ते तु युगांतके । स्थितस्वल्पावशिष्टासु प्रजास्विह क्वचित्क्वचित् ॥६१
समस्त प्राणियों के दर्शन में न आने वाला वह सम्पूर्ण वसुन्धरा पर विचरण किया करता था। वह वहाँ पर देव माधव के अंश से जाना गया था ।८५। वह पूर्व जन्म में महान् वीर्य वाला प्रमति के नाम से प्रसिद्ध था। वह प्रभु पूर्व कलियुग में चन्द्रमा के गोत्र से था ।८६। बत्तीसवें वर्ष के अभ्युदित हो जाने पर वह बीस वर्ष तक प्रक्रान्त हुआ था। सभी प्राणियों का और सभी ओर में मानवों का विहनन करते हुए उसने परिभ्रमण किया था ।८७। अकस्मात् परस्पर में समुत्पन्न कोप से उसने क्रूर कर्म से पृथ्वी में बीजावशेष कर दिया था। उसमें जो वृषल थे उनको और प्रायः अधार्मिक