संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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माषवों का सुसाधित किया था उसने अपने अनुचरों के साथ गंगा और यमुना के मध्य में बड़ी निष्ठा प्राप्त करली थी ।८८-८६। इसके अनन्तर सामान्य कल्प के व्यतीत हो जाने पर अपने सैनिकों के साथ रहकर सभी सहस्रों म्लेच्छों को और राजाओं का उत्पादन कर दिया था ।६०। यहाँ पर युग के अन्त कर लेने वाले सन्ध्या के अंश के सम्प्राप्त होने पर यहाँ पर कहीं-कहीं पर बहुत ही थोड़ी प्रजा अवशिष्ट रह गयी थी ।६१।
अपग्रहास्ततस्ता वै लोभाविष्टास्तु वृंदशः । उपहिंसंति चान्योन्यं पोथयंतः परस्परम् ॥६२ अराजके युगवशात्संसंक्षये समुपस्थिते । प्रजास्ता वै ततः सर्वाः परस्परभयाद्दिताः ॥६३ व्याकुलाश्च परिभ्रांतास्त्यक्त्वा दारान्गृहाणि च । स्वान्प्राणाननपेक्षंतो निष्कारणसुदुःखिताः ॥६४ नष्टे श्रौते स्मृतौ धर्मे परस्परहतास्तदा । निर्मर्यादा निराक्रन्दा निःस्नेहा निरपत्रपाः ॥६५ नष्टे धर्म प्रतिहता ह्रस्वकाः पंचविंशतिम् । हित्वा पुत्रांश्च दारांश्च विषाद्व्याकुलेंद्रियाः ॥६६ अनावृष्टिहताश्चैव वार्त्तामुत्सृज्य दुःखिताः । प्रत्यंतांस्ता निषेवंते हित्वा जनपदान्स्वकान् ॥६७ सरितः सागरानूपान्सेवंते पर्वतांस्तथा । मांसेर्मूलफलैश्चैव वर्तयंतः सुदुःखिताः ॥६८
वे अप ग्रहण करने वाले तथा झुण्ड के झुण्ड लोभ में आविष्ट हुए परस्पर में एक दूसरे का पोथन करते हुए उपहनन किया करते हैं ।६२। जब कोई भी समुचित शासन करने वाला नहीं था और सर्वत्र अराजकता फैली हुई थी तथा युग के प्रभाव के कारण सर्वत्र संशय प्राप्त हो गया था । फिर वह सभी प्रजा आपस में भय से उत्पीड़ित हो गये थे ।६३। वे सब बहुत व्याकुल हो गये थे और अपनी पत्नियों तथा गृहों को भी छोड़कर इधर-उधर परिभ्रमण कर रहे थे । बिना ही किसी कारण के बहुत अधिक दुःखित होकर अपने प्राणों की अपेक्षा नहीं करने वाले हो गये थे ।६४। श्रौत