भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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चतुर्युगाख्यानवर्णनम् ] [ ११६

और स्मार्त्त धर्म के विनष्ट हो जाने पर वे उस समय में हत हो रहे थे । उन्होंने अपनी मर्यादा का त्याग कर दिया था और वे निराक्रन्द हो गये थे उनमें किसी के प्रति भी स्नेह नहीं था तथा वे लज्जाहीन हो गये थे ।६५। धर्म के विनष्ट हो जाने पर वे छोटे पच्चीस वर्ष में ही प्रतिहत हो जाते हैं । वे अपने पुत्रों को-पत्नियों को छोड़कर विवाद से व्याकुलित इन्द्रियों वाले हो जाते हैं ।६६। वर्षा न होने के कारण बहुत हत हो जाया करते हैं और वार्त्ता को त्याग कर परम दुःखित होते हैं । वे सब प्रजानन अपने जनपदों को त्याग कर प्रत्यन्तों का सेवन किया करते हैं ।६७। कुछ लोग नदियों का—सागरों का—अनूपों का और पर्वतों का सेवन किया करते हैं और परम दुःखित होते हुए अपनी उदरपूर्ति मांस और मूलों के द्वारा किया करते हैं ।६८।

चीरपत्राजिनधरा निष्क्रिया निष्परिग्रहाः ।
वर्णाश्रमपरिभ्रष्टाः संकरं घोरमास्थिताः ।
एतां काष्ठामनुप्राप्ता अल्पशेषाः प्रजास्ततः ॥६६
जराव्याधिक्षुधाविष्टा दुःखान्निर्वेदमागमन् ।
विचारणा तु निर्वेदात्साम्यावस्था विचारणात् ॥१००
साम्यावस्थात्मको बोधः संबोधाद्धर्मशीलता ।
तासूपशमयुक्तासु कलिंशिष्टासु वै स्वयम् ॥१०१
अहोरात्रं तदा तासां युगान्ते परिवर्त्तनि ।
चित्तसंमोहनं कृत्वा तासां वै सुप्तमत्तवत् ॥१०१
भाविनोऽर्थस्य च बलात्ततः कृतमवर्त्तत ।
प्रवृत्ते तु ततस्तस्मिन्पूते कृतयुगे तु वै ॥१०३
उत्पन्नाः कलिंशिष्टासु प्रजाः कार्त्तयुगास्तदा ।
तिष्ठंति चेह ये सिद्धा अदृष्टा विचरंति च ।४१०४
सह सप्तर्षिभिश्चैव तत्र ते च व्यवस्थिताः ।
ब्रह्मक्षत्रविशः शूद्रा बीजार्थं ये स्मृता इह ॥१०५

वस्त्रों के अभाव में सब लोग चीर, पत्र और चर्म को धारण करने वाले हैं । उनके पास कोई भी काम नहीं है अर्थात् एकदम कर्म शून्य है

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