संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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और न उनके पास कुछ समान है। वर्णों और आश्रमों से परिभ्रष्ट हैं अर्थात् न उनका कोई वर्ण है और न कोई आश्रम ही रहा गया है। वे सब परम घोर सङ्कर में समास्थित है। बहुत ही थोड़े से बचे ने प्रजाजन फिर इस दिशा में आकर प्राप्त हुए हैं ।९९। वे बुढ़ापे और व्याधियों तथा भूख से समाविष्ट हैं और परमाधिक दुःख से निर्वेद को प्राप्त हो गये हैं। निर्वेद से उनको विचारणा उत्पन्न हुई और विचारणा से वे साम्य की अवस्था को प्राप्त हो गये हैं ।१००। साम्यावस्था के स्वरूप वाला उनको बोध हो गया था और उस भले ज्ञान से धर्म का स्वभाव हो गया था। कलि में शिष्ट वे स्वयं उपशम से अवस्था में प्राप्त हो गये थे ।१०१। उस समय मैं उनके अहो- रात्र (रात दिन) युगान्त के परिवत्तित होने पर उनके चित्त का संमोहन हो गया था और वे सब एक सोये हुए तथा प्रमत्त व्यक्ति के समान ही हो गये थे ।१०२। यह सब आगे होने वाले अर्थ के ही कारण से बलात् हुआ था। इसके अनन्तर कृतयुग हुआ था। फिर उस परम पूत कृतयुग के प्रवृत्त हो जाने पर उस समय में जो कलियुग में अवशिष्ट प्रजाएँ थीं उनमें सत्युग में होने वाली प्रजा ने जन्म ग्रहण किया था। जहाँ पर जो भी सिद्ध स्थित रहते हैं वे बिना किसी के द्वारा देखे गुप्त स्वरूप से विचरण किया करते हैं। वहाँ पर वे सप्तर्षियों के साथ व्यवस्थित हैं। यहाँ पर जो बीज के लिये ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य और शूद्र कहे गये हैं ।१०३-१०४-१०५।
कलिजैः सह ते संति निर्विशेषास्तदाभवन् ।
तेषां सप्तर्षयो धर्मं कथयंतीतरेषु च ॥१०६
वर्णाश्रमाचारयुक्तः श्रौतः स्मार्त्तो द्विधा तु सः ।
ततस्तेषु क्रियावत्सु वर्तंते वै प्रजाः कृते ॥१०७
श्रौतस्मार्त्ते कृतानां च धर्मे सप्तर्षिदर्शिते ।
केचिद्धर्मव्यवस्थार्थं तिष्ठंतीहायुगक्षयात् ॥१०८
मन्वंतराधिकारेषु तिष्ठंति मुनयस्तु वै ।
यथा दावप्रदग्धेषु तृणेष्विह तपेन तु ॥१०६
वनानां प्रथमं वृष्ट्या तेषां मूलेषु संभवः ।
तथा कार्तयुगानां तु कलिजेष्विह संभवः ॥११०
एवं युगो युगस्येह संतानस्तु परस्परम् ।