संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्युगाख्यानवर्णनम् ] [ १२१
वर्त्तंते ह्यव्यवच्छेदाद्यावन्मन्वंतरक्षयः ॥१११ सुखमायुर्बलं रूपं धर्मोऽर्थः काम एव च । युगेष्वेतानि हीयंते त्रित्रिपादाः क्रमेण च ॥११२
वे सब कलियुग में समुत्पन्न हुओं के साथ ही हैं और उस समय में विशेषता से रहित ही हैं। उनके इतरों में यहाँ पर सप्तर्षिगण धर्म को कहते हैं ।१०६। वह धर्म वर्णों और आश्रमों से आचार से युक्त वैदिक तथा स्मृतियों के द्वारा प्रतिपादित दो प्रकार का है । इसके अनन्तर कृतयुग में उन क्रियाशीलों में निश्चय ही प्रजा होती है ।१०७। कृतयुग के मनुष्यों का सप्तर्षियों के द्वारा प्रदर्शित श्रौत और स्मार्त्त धर्म हैं। यहाँ पर कुछ लोग धर्म की व्यवस्था के लिए युगक्षय से स्थित रहते हैं ।१०८। मन्वन्तर के अधिकारों मुनिगण स्थित रहा करते हैं जिस प्रकार से ताप दावाग्नि के द्वारा प्रदग्ध तृणों में रहते हैं ।१०६। प्रथम वृष्टि से उन वनों के भूतों में समुत्पत्ति होती है । ठीक उसी भाँति कलियुग में समुत्पन्न व्यक्तियों से कृतयुग के व्यक्तियों की उत्पत्ति होती है ।११०। इसी रीति से यहाँ पर युग की ही सन्तान परस्पर में युग हुआ करता है । जब तक वर्तमान मन्वन्तर का क्षय होता है तब तक बिना किसी व्यवच्छेद के इसी प्रकार से युग से दूसरे युग की समुत्पत्ति हुआ करती है ।१११। निम्न सब बातें सुख-आयु-बल रूप-धर्म-अर्थ और काम ये सभी क्रम से युगों में तीन-तीन पाद क्षीण हुआ करते हैं ।११२।
ससंध्यांशेषु हीयंते युगानां धर्मसिद्धयः । इत्येष प्रतिसंधिर्यः कीर्त्तितस्तु मया द्विजाः ॥११३ चतुर्युगानां सर्वेषामेतेनैव प्रसाधनम् । एषा चतुर्युगावृत्तिरासहस्राद्गुणीकृता ॥११४ ब्रह्मणस्तदहः प्रोक्तं रात्रिश्चैतावती स्मृता । अत्रार्जवं जडीभावो भूतानामायुगक्षयात् ॥११५ एतदेव तु सर्वेषां युगानां लक्षणं स्मृतम् । एषा चतुर्युगानां च गुणिता ह्येकसप्ततिः ॥११६ क्रमेण परिवृत्ता तु मनोरंतरमुच्यते ।