संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
चतुर्युगे यथैकस्मिन्भवन्तीह यथा तु यत् ।।११७ तथा चान्येषु भवति पुनस्तद्वद्यथाक्रमम् । सर्गे सर्गे तथा भेदा उत्पद्यंते तथैव तु ।।११८ पंचत्रिंशत्परिमिता न न्यूना नाधिकाः स्मृताः । कथा कल्पा युगैः सार्द्धं भवंति सह लक्षणैः । मन्वंतराणां सर्वेषामेतदेव तु लक्षणम् ।।११९
सन्ध्यांशों में युगों की धर्म सिद्धियों का ह्रास हुआ करता है । इस प्रकार से यह जो प्रति सन्धि है । हे द्विजो ! मैंने कीर्त्तित कर दी हैं ।११३। इसी से चारों युगों का सबका प्रसाधन है। यह चारों युगोंकी आवृत्ति सहस्र से लेकर गुणीकृत है ।११४। यह ब्रह्मा का दिन कहा गया है । जितना बड़ा दिन होता है उतनी ब्रह्माजी की रात्रि हुआ करती है । यहाँ पर युग क्षय से लेकर भूतों का जो सोधापन है वह जड़ी मान होता है ।११५। यही ही समस्त युगों का लक्षण कहा गया है । यह चारों युगों की चौकड़ी अब इकहत्तर हो जाया करती ।११६। जब क्रम से यह चौकड़ियां इकहत्तर समाप्त होकर दूसरी बदलती हैं तभी दूसरे मनु का अन्तर हुआ करता है । चारों युगों की चौकड़ी में किस प्रकार से यहाँ होती है उसी प्रकार से यह होता है ।११७। उसी भाँति अन्यों में होता है और फिर उसी के समान यथा क्रम से हुआ करता है । उसी प्रकार से प्रत्येक सर्ग में भेद उत्पन्न हुआ करते हैं ।११८। ये पैंतीस परिमित ही हैं और न इनसे कम हैं और न अधिक होते हैं ऐसा ही बताया गया है । उसी रीति से कल्प युगों के साथ लक्षणों के होते हैं । समस्त मन्वन्तर का यह ही लक्षण होता है ।११९।
यथा युगानां परिवर्त्तनानि चिरप्रवृत्तानि युगस्वभावात् । तथा न संतिष्ठति जीवलोकः क्षयोदयाभ्यां परिवर्त्तमानः ।।१२० इत्येतल्लक्षणं प्रोक्तं युगानां वै समासतः ।।१२१ अतीतानागतानां हि सर्वमन्वंतरेष्विह । मन्वंतरेण चैकेन सर्वाण्येवांतराणि वै ।।१२२ ख्यातानीह विजानीध्वं कल्प कल्पेन चैव ह । अनागतेषु तद्वच्च तर्कः कार्यो विजानता ।।१२३