भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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परशुराम का संवाद ] [ १२३

मन्वंतरेषु सर्वेषु अतीतानागतेष्विह । तुल्याभिमानिनः सर्वे नामरूपैर्भवंत्युत ॥१२४॥ देवा ह्यष्टविधा ये वा इह मन्वंतरेश्वराः । ऋषयो मनवश्चैव सर्वे तुल्याः प्रयोजनैः ॥१२५॥ एवं वर्णाश्रमाणां तु प्रविभागं पुरा युगे । युगस्वभावांश्च तथा विधत्ते वै सदा प्रभुः ॥१२६॥ वर्णाश्रमविभागाश्च युगानि युगसिद्धयः । अनुषंगात्समाख्याताः सृष्टिसर्गं निबोधत । विस्तरेणानुपूर्व्या च स्थितिं वक्ष्ये युगेष्विह ॥१२७॥

जिस तरह से युगों के परिवर्त्तन युगों के स्वभाव से चिरप्रवृत्त होते हैं उस प्रकार से क्षय और उदय से परिवर्त्तमान जीव लोक भली भांति स्थित नहीं रहता है ।१२०। बहुत ही संक्षेप के साथ यह इतना ही युगों का लक्षण बताया गया है ।१२१। यहाँ पर मन्वन्तरों में जो बीत चुके हैं तथा जो अनागत हैं उनका सब यही है और एक मन्वन्तर के द्वारा ही समस्त अन्तर होते हैं ।१२२। कल्प से कल्प जो होता है वे सब विख्यात हैं उनको जान लो । जो अभी तक नहीं आये हैं उनमें ज्ञान पुरुष के द्वारा उसी प्रकार से तर्क कर लेना चाहिए ।१२३। समस्त मन्वन्तरों में व्यतीत हो गये हैं और जो अनागत हैं उनमें यहाँ पर नाम और रूपों से सब तुल्य अभिमान वाले हैं ।१२४। जो आठ प्रकार के देवगण हैं अथवा यहाँ पर मन्वन्तरेश्वर हैं । ऋषिगण और मनुगण सब प्रयोजनों से तुल्य हैं ।१२५। इस तरह से पहिले युग में वर्णों और आश्रमों के प्रकृष्ट विभाग को और युगों के स्वभावों को सदा प्रभु किया करते हैं ।१२६। वर्णाश्रमों के विभाग युग और युगों की सिद्धियां अनुषंग से यह कह दिये गये हैं । अब सृष्टि के सर्ग को समझ लो । यहाँ पर युगों में विस्तार के साथ और आनुपूर्वी से अर्थात् आरम्भ से अन्त तक क्रम में से स्थिति का वर्णन करूँगा ।१२७।

—X—

॥ परशुराम का संवाद ॥

वसिष्ठ उवाच—इत्थं प्रवर्त्तमानस्य जमदग्नेर्महात्मनः । वर्षाणि कतिचिद्राजन्यतीयुरमितौजसः ॥१॥