भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१२४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

रामोऽपि नृपशार्दूल सर्वधर्मभृतां वरः । वेदवेदांगतत्त्वज्ञः सर्वशास्त्रविशारदः ॥२॥ पित्रोश्चकार शुश्रूषां विनीतात्मा महामतिः । प्रीतिं च निजचेष्टाभिरन्वहं पर्यवर्त्तयत् ॥३॥ इत्थं प्रवर्त्तमानस्य वर्षाणि कतिचिन्नृप । पित्रोः शुश्रूषयानैषीद्रामो मतिमतां वरः ॥४॥ स कदाचिन्महातेजाः पितामहगृहं प्रति । गन्तुं व्यवसितो राजन्दैवेन च नियोजितः ॥५॥ निपीड्य शिरसा पित्रोश्चरणौ भृगुपुंगवः । उवाच प्रांजलिर्भूत्वा सप्रश्रयमिदं वचः ॥६॥ कंचिदर्थमहं तात मातरं त्वां च साम्प्रतम् । विज्ञापयितुमिच्छामि मम तच्छ्रोतुमर्हथः ॥७॥

श्री वसिष्ठजी ने कहा—हे राजन् ! अमित ओज से समन्वित महान् आत्मा वाले जमदग्नि के इस प्रकार से प्रवृत्तमान होते हुए कुछ वर्ष व्यतीत हो गये थे ।१। हे नृपशार्दूल । समस्त धर्मों के धारण करने वालों में परम-श्रेष्ठ राम भी वेदांग के तत्वों के ज्ञाता और सब शास्त्रों के विशारद थे ।२। महान् मति से समन्वित और विनीत आत्मा वाले उनने अपने माता-पिता की शुश्रूषा की थी और निज की चेष्टाओं से प्रतिदिन प्रीति को बढ़ा दिया था ।३। बुद्धिमानों में परम श्रेष्ठ राम ने हे नृप ! माता-पिता की शुश्रूषा के द्वारा इस तरहसे प्रवृत्त जान होते हुए कुछ वर्ष बिता दिये थे ।४। हे राजन् ! किसी समय में महान् तेज वाले पितामह ने उस परम गृह की ओर गमन करने का निश्चय देव के द्वारा नियोजित होते हुए किया था ।५। भृगु पुंगव ने माता-पिता के चरणों में अपना शिर रखकर अपने दोनों हाथ जोड़ते हुए नम्रता पूर्वक यह वचन बोले थे ।६। हे तात ! इस समय में आपके और माता के समक्ष में कुछ अर्थ विज्ञापित करने की अभिलाषा रखता हूँ । आप मेरी उस अभिलाषित को श्रवण करने के योग्य होते हैं ।७।

पितामहमहं द्रष्टुमुत्कंठितमनाश्चिरम् । तस्मात्तत्पार्श्वमधुना गमिष्ये वामनुज्ञया ॥८॥ आहूतश्चासकृत्तात सोत्कंठं प्रीयमाणया ।

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