संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 121, कुल 893 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरशुराम का संवाद ] [ १२५
पितामह्या बहुमुखैरिच्छन्त्या मम दर्शनम् ॥६॥ पितॄन्पितामहस्यापि प्रियमेव प्रदर्शनम् । मदीयं तेन तत्पार्श्वं गन्तुं मामनुजानत ॥१०॥ वसिष्ठ उवाच-इति तस्य वचः श्रुत्वा संभ्रांतं समुदीरितम् । हर्षेण महता युक्तौ साश्रुनेत्रौ बभूवतुः ॥११॥ तमालिङ्ग्य महाभागं मूर्ध्न्युपाघ्राय सादरम् । अभिनन्द्याशिषा तात ह्युभौ ताविदमाहतुः ॥१२॥ पितामहगृहं तात प्रयाहि त्वं यथासुखम् । पितामहपितामह्योः प्रीतये दर्शनाय च ॥१३॥ तत्र गत्वा यथान्यायं तं शुश्रूषापरायणः । कंचित्कालं तयोर्वत्स प्रीतये वस तद्गृहे ॥१४॥
मैं अधिक समय से पितामह के दर्शन करने के लिए उत्कण्ठित मन वाला हो रहा हूँ। इस कारण से आप दोनों की आज्ञा से इस समय में उनके समीप में गमन करूंगा ।८। हे तात ! बड़े प्रसन्न मन वाली पितामही के द्वारा मैं कितनी ही बार बुलाया गया हूँ और उनके हृदय में मुझमें मिलने की अधिक उत्कण्ठा है । बहुत लोगों के द्वारा उन्होंने यह कहलाया है कि वे मुझे देखने की अधिक इच्छा करती है ।६। मेरा मिलना पितृगण और पितामह जो भी प्रिय है। इस कारण से उनके समीप में जाने की आप मुझे आज्ञा प्रदान कीजिए ।१०। श्री वसिष्ठजी ने कहा—इस प्रकार से उनके इस परम सम्भ्रान्त कहे हुए वचन का श्रवण करके वे दोनों माता-पिता बहुत ही प्रहर्षित हुए थे और उनके नेत्रों में अश्रुओं के कण झलक उठे थे ।११। उन दोनों ने उस महान् भाग वाले पुत्र का आलिंगन किया था और बड़े आदर के साथ उसके मस्तक का उपाघ्राण किया था । आशीर्वाद से उसका अभिनन्दन करके उन दोनों ने उससे कहा था ।१२। हे तात ! पितामह के गृह को तुम सुख पूर्वक जाओ जिससे पितामह और पितामही के दर्शन प्राप्त करोगे ओर उनकी प्रीति भी होगी ।१३। वहाँ पहुँच कर न्यायपूर्वक उनकी शुश्रूषा में तत्पर रहना । कुछ समय तक हे वत्स ! उनकी प्रीति को प्राप्त करने के लिए उनके घर में निवास करो ।१४।