संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
स्थित्वा नातिचिरं कालं तयोर्भूयोऽप्यनुज्ञया । अत्रागच्छ महाभाग क्षेमेणास्मद्दिदृक्षया ॥१५ क्षणार्द्धमपि शक्ताः स्थो न विना पुत्रदर्शनम् । तस्मात्पितामहगृहे न चिरात्स्थातुमर्हसि ॥१६ तदाज्ञयाथ वा पुत्र प्रपितामहसन्निधिम् । गतोऽपि शीघ्रमागच्छ क्रमेण तदनुज्ञया ॥१७ वसिष्ठ उवाच-इत्युक्तस्तौ परिक्रम्य प्रणम्य च महामतिः । पितरावप्यनुज्ञाप्य पितामहगृहं ततः ॥१८ स गत्वा भृगुवर्यस्य ऋचीकस्य महात्मनः । प्रविवेशाश्रमं रामो मुनिशिष्योपशोभितम् ॥१६ स्वाध्यायघोषैर्विपुलैः सर्वतः प्रतिनादितम् । प्रशांतवैरसत्त्वाढ्यं सर्वसत्वमनोहरम् ॥२० स प्रविश्याश्रमं रम्यमृचीकं स्थितमासने । ददर्श रामो राजेंद्र स पितामहमग्रतः ॥२१
बहुत समय तक वहाँ स्थित न रहकर फिर उन दोनों की अनुज्ञा से हे महाभाग ! हम लोगों के देखने की इच्छा से कुशलता के साथ यहीं पर आ जाना ।१५। अपने पुत्र के देखने के बिना हम लोग आधे क्षण भी नहीं रह सकते हैं। इसी कारण से आप पितामह के घर में अधिक लम्बे समय तक ठहरने के योग्य नहीं होते हैं ।१६। पितामह के समीप में गये हुए भी हे पुत्र ! उनकी ही आज्ञा प्राप्त कर उनकी अनुज्ञा से क्रम से शीघ्र ही यहाँ पर आ जाओ ।१७। वसिष्ठजी ने कहा—इस प्रकार से जब उससे कहा गया तो वह महान् बुद्धिमान् था । उसने उनको प्रणाम करके परिक्रमा की थी और माता-पिता की आज्ञा पाकर वहाँ से वह पितामह के घर को चल दिया था ।१८। वहाँ पर जाकर उस राम ने महात्मा भृगुवर्य ऋचीक के आश्रम में प्रवेश किया था जो कि अनेक मुनिगण और शिष्यों से उपशोभित था ।१६। वह आश्रम सभी ओर वेदाध्ययन के बहुत बड़े उद्घोष से प्रति-ध्वनित हो रहा था और वहाँ के सभी प्राणियों में सर्वथा वैर भाव नहीं था तथा सभी जीवोंके द्वारा वह अतीव मनोहर था ।२०। उस परशुराम ने परम