भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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परशुराम का संवाद ] [ १२७

सुन्दर आश्रम में प्रवेश करके हे राजेन्द्र ! आसन पर विराजमान ऋचीक का दर्शन किया था और आगे स्थित पितामह को देखा था ।२१।

जाज्वल्यमानं तपसा धिष्ण्यस्थमिव पावकम् ।
उपासितं सत्यवत्या यथा दक्षिणयाऽध्वरम् ॥२२
स्वसमीपमुपायातं राममालोक्य तौ नृप ।
सुचिरं तं विमर्शेतां समाज्ञापूर्वकदर्शनौ ॥२३
कोऽयमेष तपोराशिः सर्वलक्षणपूजितः ।
बालोऽयं बलवान्भाति गांभीर्यात्प्रश्रयेण च ॥२४
एवं तयोश्चिन्तयतोः सहर्षं हृदि कौतुकात् ।
आससाद शनै रामः समीपे विनयान्वितः ॥२५
स्वनामगोत्रे मतिमानुक्त्वा पित्रोर्मुदान्वितः ।
संस्पृशंश्चरणौ मूर्ध्ना हस्ताभ्यां चाभ्यवादयत् ॥२६
ततस्तौ प्रीतमनसौ समुत्थाप्य च सत्तमम् ।
आशीर्भिरभिनन्देतां पृथक् पृथगुभावपि ॥२७
तमाश्लिष्यांकमारोप्य हर्षाश्रुप्लुतलोचनौ ।
वीक्षंतौ तन्मुखांभोजं परं हर्षमवापतुः ॥२८

उनका स्वरूप धिष्ण्यमें स्थित पावकके ही समान तपसे जाज्वल्यमान था। दक्षिणा के द्वारा अध्वर की ही भाँति सत्यवती के द्वारा वे उपासित थे ।२२। हे नृप ! उन दोनों ने अपने समीप में समागत हुए राम को देखा था और समाज्ञा पूर्वक देखने वाले उन दोनों ने उसके विषय में बहुत समय तक मनमें विमर्श किया था।२३। यह तपश्चर्या के राशि के ही सदृश कौन है जो कि सभी लक्षणों से पूजित हैं। है तो यह बालक परन्तु गम्भीरता और विनय से युक्त बहुत बलवान् प्रतीत होता है।२४। उन दोनों के हृदय में बड़ा कुतूहल हो रहा था और वे हर्ष के साथ यही मन में चिन्तन कर रहे थे कि राम परम विनीत भाव से समन्वित होते हुए धीरे से उनके समीप में पहुँच गया था।२५। उस बुद्धिमान् रामने अपने नाम और गोत्र का उच्चारण करके परमानन्दित होते हुए उन दोनों के चरणों का स्पर्श मस्तक के द्वारा किया और दोनों हाथों से उनका अभिवादन किया था।२६। इसके अनन्तर परम प्रीतियुक्त मन वाले उनने उस श्रेष्ठतम को उठा लिया था