भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१२८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

और दोनों ने अलग-अलग आशीर्वाद के द्वारा उसका अभिनन्दन किया था ।२७। उसको अपने वक्षःस्थल से लगाकर आलिंगन किया था और अपनी गोद में बिठाकर उन दोनों के हृदय में इतना हर्ष हुआ था कि उनके नेत्र अश्रुओं से समाप्लुत हो गये थे । उस राम के मुख कमल को देखते हुए उन दोनों ने बहुत अधिक हर्ष प्राप्त किया था ।२८।

ततः सुखोपविष्टं तमात्मवंशसमुद्वहम् ।
अनामयपृच्छेतां तावुभौ दंपती तदा ॥२९
पितरौ ते कुशलिनौ वत्स किंवातरस्तथा ।
अनायासेन ते वृत्तिर्वर्तते चाथ कर्हिचित् ॥३०
समस्ताभ्यां ततो राजन्नाचचक्षे यथोदितः ।
तथा स्वानुगतं पित्रोर्भ्रातृ णां चैव चेष्टितम् ॥३१
एवं तयोर्महाराज सत्प्रीतिजनितैर्गुणैः ।
प्रीयमाणोऽवसद्रामः पितुः पित्रोर्निवेशने ॥३२
स तस्मिन्सर्वभूतानां मनोनयननन्दनः ।
उवास कतिचिन्मासांस्तच्छुश्रूषापरायणः ॥३३
अथानुज्ञाप्य तौ राजन्भृगुवर्यो महामनाः ।
पितामहगुरोर्गंतुमियेषाश्रयमाश्रमम् ॥३४
स ताभ्यां प्रीतियुक्ताभ्यामाशीर्भिरभिनंदितः ।
यथा चाभ्यां प्रदिष्टेन ययावौर्वाश्रमं प्रति ॥३५

इसके उपरान्त जब वह सुख पूर्वक बैठ गये तो उस आत्मवंश के समुद्वहन करने वाले से उस समय में उन दोनों दम्पति ने क्षेम कुशल पूछा था ।२६। उन्होंने पूछा था कि हे वत्स ! तुम्हारे माता-पिता सकुशल हैं और तुम्हारे सब भाई सानन्द तो हैं । तुम्हारी वृत्ति अनायास से ही कम हो गई हैं ।३०। इसके अनन्तर हे राजन् ! जैसा कहा गया था वह सम्पूर्ण उसने कह दिया था । अपने माता-पिता की अनुगामिता और भाइयों का जो चेष्टित था वह भी कह दिया था ।३१। हे महाराज ! इस तरह से उन दोनों की सम्प्रीति से समुत्पन्न गुणगणों से बहुत ही प्रसन्न राम पिता के, पिता के घर में रहा था ।३२। वह घर में सभी प्राणियों के मन और नेत्रों को आनन्द