भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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परशुराम का संवाद ] [ १२६

देने वाला होगया था । उनकी सुश्रूषा में तत्पर होकर उसने वहाँ पर कुछ मास तक निवास किया था ।३३। हे राजन् ! इसके पश्चात् महान् मन वाले भृगु वर्य ने उन दोनों की आज्ञा प्राप्त करके पितामह के गुरु के निवास स्थल आश्रम में गमन करने की इच्छा की थी ।३४। परम प्रीति से संयुत उन दोनों के द्वारा उसका आशीर्वचनों से अभिनन्दन किया गया था और उन दोनों ने जिस प्रकार में और्याश्रम के प्रति प्रदर्शन कर दिया था ।३५।

तं नमस्कृत्य विधिवच्च्यवनं च महातपाः ।
सप्रहर्षं तदाज्ञातः प्रययावाश्रमं भृगोः ॥३६
स गत्वा मुनिमुख्यस्य भृगोराश्रममंडलम् ।
ददर्श शांतचेतोभिर्मुनिभिः सर्वतो वृतम् ॥३७
सुस्निग्धशीतलच्छायैः सर्वर्तुकगुणान्वितैः ।
तरुभिः संवृतं प्रीतः फलपुष्पोत्तरान्वितैः ॥३८
नानाखगकुलारावैर्मनः श्रोत्रसुखावहः ।
ब्रह्मघोषैश्च विविधैः सर्वतः प्रतिनादितम् ॥३९
समंत्राहुतिहोमोत्थधूमगंधेन सर्वतः ।
निरस्तनिखिलाघौघं वनांतरविसर्पिणा ॥४०
समित्कुशाहरैर्दण्डमेखलाजिनमंडितैः ।
अभितः शोभितं राजन्म्यैर्मु निकुमारकैः ॥४१
प्रसूनजलसंपूर्णपात्रहस्ताभिरंतरा ।
शोभितं मुनिकन्याभिश्चरंतीभिरितस्ततः ॥४२

उस महान् तपस्वी ने विधिपूर्वक च्यवन की सेवा में प्रणाम किया था और बड़े हर्षपूर्वक उनसे आज्ञा प्राप्त कर वह राम भृगु के आश्रम की ओर रवाना हो गया था ।३५। वह समस्त मुनिगणों में मुख्य भृगु के आश्रम मण्डल में जाकर देखा था कि वह आश्रम परम शान्त चित्त वाले मुनियों से सभी ओर घिरा हुआ है ।३७। अतीव घनी और शीतल छाया वाले और सभी ऋतुओं के गुणों से समन्वित तथा प्रीतिदायक फलों और पुष्पों से युक्त तरुवरों से वह आश्रम संयुत था ।३८। विविध अकार के पक्षियों की ध्वनियां पर हो रही थी जो मन और कानों को परम सुख प्रदान करने वाली थीं।