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संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

चतुर्युगाख्यानवर्णनम् ] [ १२१

वर्त्तंते ह्यव्यवच्छेदाद्यावन्मन्वंतरक्षयः ॥१११ सुखमायुर्बलं रूपं धर्मोऽर्थः काम एव च । युगेष्वेतानि हीयंते त्रित्रिपादाः क्रमेण च ॥११२

वे सब कलियुग में समुत्पन्न हुओं के साथ ही हैं और उस समय में विशेषता से रहित ही हैं। उनके इतरों में यहाँ पर सप्तर्षिगण धर्म को कहते हैं ।१०६। वह धर्म वर्णों और आश्रमों से आचार से युक्त वैदिक तथा स्मृतियों के द्वारा प्रतिपादित दो प्रकार का है । इसके अनन्तर कृतयुग में उन क्रियाशीलों में निश्चय ही प्रजा होती है ।१०७। कृतयुग के मनुष्यों का सप्तर्षियों के द्वारा प्रदर्शित श्रौत और स्मार्त्त धर्म हैं। यहाँ पर कुछ लोग धर्म की व्यवस्था के लिए युगक्षय से स्थित रहते हैं ।१०८। मन्वन्तर के अधिकारों मुनिगण स्थित रहा करते हैं जिस प्रकार से ताप दावाग्नि के द्वारा प्रदग्ध तृणों में रहते हैं ।१०६। प्रथम वृष्टि से उन वनों के भूतों में समुत्पत्ति होती है । ठीक उसी भाँति कलियुग में समुत्पन्न व्यक्तियों से कृतयुग के व्यक्तियों की उत्पत्ति होती है ।११०। इसी रीति से यहाँ पर युग की ही सन्तान परस्पर में युग हुआ करता है । जब तक वर्तमान मन्वन्तर का क्षय होता है तब तक बिना किसी व्यवच्छेद के इसी प्रकार से युग से दूसरे युग की समुत्पत्ति हुआ करती है ।१११। निम्न सब बातें सुख-आयु-बल रूप-धर्म-अर्थ और काम ये सभी क्रम से युगों में तीन-तीन पाद क्षीण हुआ करते हैं ।११२।

ससंध्यांशेषु हीयंते युगानां धर्मसिद्धयः । इत्येष प्रतिसंधिर्यः कीर्त्तितस्तु मया द्विजाः ॥११३ चतुर्युगानां सर्वेषामेतेनैव प्रसाधनम् । एषा चतुर्युगावृत्तिरासहस्राद्गुणीकृता ॥११४ ब्रह्मणस्तदहः प्रोक्तं रात्रिश्चैतावती स्मृता । अत्रार्जवं जडीभावो भूतानामायुगक्षयात् ॥११५ एतदेव तु सर्वेषां युगानां लक्षणं स्मृतम् । एषा चतुर्युगानां च गुणिता ह्येकसप्ततिः ॥११६ क्रमेण परिवृत्ता तु मनोरंतरमुच्यते ।

१२२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

चतुर्युगे यथैकस्मिन्भवन्तीह यथा तु यत् ।।११७ तथा चान्येषु भवति पुनस्तद्वद्यथाक्रमम् । सर्गे सर्गे तथा भेदा उत्पद्यंते तथैव तु ।।११८ पंचत्रिंशत्परिमिता न न्यूना नाधिकाः स्मृताः । कथा कल्पा युगैः सार्द्धं भवंति सह लक्षणैः । मन्वंतराणां सर्वेषामेतदेव तु लक्षणम् ।।११९

सन्ध्यांशों में युगों की धर्म सिद्धियों का ह्रास हुआ करता है । इस प्रकार से यह जो प्रति सन्धि है । हे द्विजो ! मैंने कीर्त्तित कर दी हैं ।११३। इसी से चारों युगों का सबका प्रसाधन है। यह चारों युगोंकी आवृत्ति सहस्र से लेकर गुणीकृत है ।११४। यह ब्रह्मा का दिन कहा गया है । जितना बड़ा दिन होता है उतनी ब्रह्माजी की रात्रि हुआ करती है । यहाँ पर युग क्षय से लेकर भूतों का जो सोधापन है वह जड़ी मान होता है ।११५। यही ही समस्त युगों का लक्षण कहा गया है । यह चारों युगों की चौकड़ी अब इकहत्तर हो जाया करती ।११६। जब क्रम से यह चौकड़ियां इकहत्तर समाप्त होकर दूसरी बदलती हैं तभी दूसरे मनु का अन्तर हुआ करता है । चारों युगों की चौकड़ी में किस प्रकार से यहाँ होती है उसी प्रकार से यह होता है ।११७। उसी भाँति अन्यों में होता है और फिर उसी के समान यथा क्रम से हुआ करता है । उसी प्रकार से प्रत्येक सर्ग में भेद उत्पन्न हुआ करते हैं ।११८। ये पैंतीस परिमित ही हैं और न इनसे कम हैं और न अधिक होते हैं ऐसा ही बताया गया है । उसी रीति से कल्प युगों के साथ लक्षणों के होते हैं । समस्त मन्वन्तर का यह ही लक्षण होता है ।११९।

यथा युगानां परिवर्त्तनानि चिरप्रवृत्तानि युगस्वभावात् । तथा न संतिष्ठति जीवलोकः क्षयोदयाभ्यां परिवर्त्तमानः ।।१२० इत्येतल्लक्षणं प्रोक्तं युगानां वै समासतः ।।१२१ अतीतानागतानां हि सर्वमन्वंतरेष्विह । मन्वंतरेण चैकेन सर्वाण्येवांतराणि वै ।।१२२ ख्यातानीह विजानीध्वं कल्प कल्पेन चैव ह । अनागतेषु तद्वच्च तर्कः कार्यो विजानता ।।१२३

परशुराम का संवाद ] [ १२३

मन्वंतरेषु सर्वेषु अतीतानागतेष्विह । तुल्याभिमानिनः सर्वे नामरूपैर्भवंत्युत ॥१२४॥ देवा ह्यष्टविधा ये वा इह मन्वंतरेश्वराः । ऋषयो मनवश्चैव सर्वे तुल्याः प्रयोजनैः ॥१२५॥ एवं वर्णाश्रमाणां तु प्रविभागं पुरा युगे । युगस्वभावांश्च तथा विधत्ते वै सदा प्रभुः ॥१२६॥ वर्णाश्रमविभागाश्च युगानि युगसिद्धयः । अनुषंगात्समाख्याताः सृष्टिसर्गं निबोधत । विस्तरेणानुपूर्व्या च स्थितिं वक्ष्ये युगेष्विह ॥१२७॥

जिस तरह से युगों के परिवर्त्तन युगों के स्वभाव से चिरप्रवृत्त होते हैं उस प्रकार से क्षय और उदय से परिवर्त्तमान जीव लोक भली भांति स्थित नहीं रहता है ।१२०। बहुत ही संक्षेप के साथ यह इतना ही युगों का लक्षण बताया गया है ।१२१। यहाँ पर मन्वन्तरों में जो बीत चुके हैं तथा जो अनागत हैं उनका सब यही है और एक मन्वन्तर के द्वारा ही समस्त अन्तर होते हैं ।१२२। कल्प से कल्प जो होता है वे सब विख्यात हैं उनको जान लो । जो अभी तक नहीं आये हैं उनमें ज्ञान पुरुष के द्वारा उसी प्रकार से तर्क कर लेना चाहिए ।१२३। समस्त मन्वन्तरों में व्यतीत हो गये हैं और जो अनागत हैं उनमें यहाँ पर नाम और रूपों से सब तुल्य अभिमान वाले हैं ।१२४। जो आठ प्रकार के देवगण हैं अथवा यहाँ पर मन्वन्तरेश्वर हैं । ऋषिगण और मनुगण सब प्रयोजनों से तुल्य हैं ।१२५। इस तरह से पहिले युग में वर्णों और आश्रमों के प्रकृष्ट विभाग को और युगों के स्वभावों को सदा प्रभु किया करते हैं ।१२६। वर्णाश्रमों के विभाग युग और युगों की सिद्धियां अनुषंग से यह कह दिये गये हैं । अब सृष्टि के सर्ग को समझ लो । यहाँ पर युगों में विस्तार के साथ और आनुपूर्वी से अर्थात् आरम्भ से अन्त तक क्रम में से स्थिति का वर्णन करूँगा ।१२७।

—X—

॥ परशुराम का संवाद ॥

वसिष्ठ उवाच—इत्थं प्रवर्त्तमानस्य जमदग्नेर्महात्मनः । वर्षाणि कतिचिद्राजन्यतीयुरमितौजसः ॥१॥

१२४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

रामोऽपि नृपशार्दूल सर्वधर्मभृतां वरः । वेदवेदांगतत्त्वज्ञः सर्वशास्त्रविशारदः ॥२॥ पित्रोश्चकार शुश्रूषां विनीतात्मा महामतिः । प्रीतिं च निजचेष्टाभिरन्वहं पर्यवर्त्तयत् ॥३॥ इत्थं प्रवर्त्तमानस्य वर्षाणि कतिचिन्नृप । पित्रोः शुश्रूषयानैषीद्रामो मतिमतां वरः ॥४॥ स कदाचिन्महातेजाः पितामहगृहं प्रति । गन्तुं व्यवसितो राजन्दैवेन च नियोजितः ॥५॥ निपीड्य शिरसा पित्रोश्चरणौ भृगुपुंगवः । उवाच प्रांजलिर्भूत्वा सप्रश्रयमिदं वचः ॥६॥ कंचिदर्थमहं तात मातरं त्वां च साम्प्रतम् । विज्ञापयितुमिच्छामि मम तच्छ्रोतुमर्हथः ॥७॥

श्री वसिष्ठजी ने कहा—हे राजन् ! अमित ओज से समन्वित महान् आत्मा वाले जमदग्नि के इस प्रकार से प्रवृत्तमान होते हुए कुछ वर्ष व्यतीत हो गये थे ।१। हे नृपशार्दूल । समस्त धर्मों के धारण करने वालों में परम-श्रेष्ठ राम भी वेदांग के तत्वों के ज्ञाता और सब शास्त्रों के विशारद थे ।२। महान् मति से समन्वित और विनीत आत्मा वाले उनने अपने माता-पिता की शुश्रूषा की थी और निज की चेष्टाओं से प्रतिदिन प्रीति को बढ़ा दिया था ।३। बुद्धिमानों में परम श्रेष्ठ राम ने हे नृप ! माता-पिता की शुश्रूषा के द्वारा इस तरहसे प्रवृत्त जान होते हुए कुछ वर्ष बिता दिये थे ।४। हे राजन् ! किसी समय में महान् तेज वाले पितामह ने उस परम गृह की ओर गमन करने का निश्चय देव के द्वारा नियोजित होते हुए किया था ।५। भृगु पुंगव ने माता-पिता के चरणों में अपना शिर रखकर अपने दोनों हाथ जोड़ते हुए नम्रता पूर्वक यह वचन बोले थे ।६। हे तात ! इस समय में आपके और माता के समक्ष में कुछ अर्थ विज्ञापित करने की अभिलाषा रखता हूँ । आप मेरी उस अभिलाषित को श्रवण करने के योग्य होते हैं ।७।

पितामहमहं द्रष्टुमुत्कंठितमनाश्चिरम् । तस्मात्तत्पार्श्वमधुना गमिष्ये वामनुज्ञया ॥८॥ आहूतश्चासकृत्तात सोत्कंठं प्रीयमाणया ।

परशुराम का संवाद ] [ १२५

पितामह्या बहुमुखैरिच्छन्त्या मम दर्शनम् ॥६॥ पितॄन्पितामहस्यापि प्रियमेव प्रदर्शनम् । मदीयं तेन तत्पार्श्वं गन्तुं मामनुजानत ॥१०॥ वसिष्ठ उवाच-इति तस्य वचः श्रुत्वा संभ्रांतं समुदीरितम् । हर्षेण महता युक्तौ साश्रुनेत्रौ बभूवतुः ॥११॥ तमालिङ्ग्य महाभागं मूर्ध्न्युपाघ्राय सादरम् । अभिनन्द्याशिषा तात ह्युभौ ताविदमाहतुः ॥१२॥ पितामहगृहं तात प्रयाहि त्वं यथासुखम् । पितामहपितामह्योः प्रीतये दर्शनाय च ॥१३॥ तत्र गत्वा यथान्यायं तं शुश्रूषापरायणः । कंचित्कालं तयोर्वत्स प्रीतये वस तद्गृहे ॥१४॥

मैं अधिक समय से पितामह के दर्शन करने के लिए उत्कण्ठित मन वाला हो रहा हूँ। इस कारण से आप दोनों की आज्ञा से इस समय में उनके समीप में गमन करूंगा ।८। हे तात ! बड़े प्रसन्न मन वाली पितामही के द्वारा मैं कितनी ही बार बुलाया गया हूँ और उनके हृदय में मुझमें मिलने की अधिक उत्कण्ठा है । बहुत लोगों के द्वारा उन्होंने यह कहलाया है कि वे मुझे देखने की अधिक इच्छा करती है ।६। मेरा मिलना पितृगण और पितामह जो भी प्रिय है। इस कारण से उनके समीप में जाने की आप मुझे आज्ञा प्रदान कीजिए ।१०। श्री वसिष्ठजी ने कहा—इस प्रकार से उनके इस परम सम्भ्रान्त कहे हुए वचन का श्रवण करके वे दोनों माता-पिता बहुत ही प्रहर्षित हुए थे और उनके नेत्रों में अश्रुओं के कण झलक उठे थे ।११। उन दोनों ने उस महान् भाग वाले पुत्र का आलिंगन किया था और बड़े आदर के साथ उसके मस्तक का उपाघ्राण किया था । आशीर्वाद से उसका अभिनन्दन करके उन दोनों ने उससे कहा था ।१२। हे तात ! पितामह के गृह को तुम सुख पूर्वक जाओ जिससे पितामह और पितामही के दर्शन प्राप्त करोगे ओर उनकी प्रीति भी होगी ।१३। वहाँ पहुँच कर न्यायपूर्वक उनकी शुश्रूषा में तत्पर रहना । कुछ समय तक हे वत्स ! उनकी प्रीति को प्राप्त करने के लिए उनके घर में निवास करो ।१४।

१२६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

स्थित्वा नातिचिरं कालं तयोर्भूयोऽप्यनुज्ञया । अत्रागच्छ महाभाग क्षेमेणास्मद्दिदृक्षया ॥१५ क्षणार्द्धमपि शक्ताः स्थो न विना पुत्रदर्शनम् । तस्मात्पितामहगृहे न चिरात्स्थातुमर्हसि ॥१६ तदाज्ञयाथ वा पुत्र प्रपितामहसन्निधिम् । गतोऽपि शीघ्रमागच्छ क्रमेण तदनुज्ञया ॥१७ वसिष्ठ उवाच-इत्युक्तस्तौ परिक्रम्य प्रणम्य च महामतिः । पितरावप्यनुज्ञाप्य पितामहगृहं ततः ॥१८ स गत्वा भृगुवर्यस्य ऋचीकस्य महात्मनः । प्रविवेशाश्रमं रामो मुनिशिष्योपशोभितम् ॥१६ स्वाध्यायघोषैर्विपुलैः सर्वतः प्रतिनादितम् । प्रशांतवैरसत्त्वाढ्यं सर्वसत्वमनोहरम् ॥२० स प्रविश्याश्रमं रम्यमृचीकं स्थितमासने । ददर्श रामो राजेंद्र स पितामहमग्रतः ॥२१

बहुत समय तक वहाँ स्थित न रहकर फिर उन दोनों की अनुज्ञा से हे महाभाग ! हम लोगों के देखने की इच्छा से कुशलता के साथ यहीं पर आ जाना ।१५। अपने पुत्र के देखने के बिना हम लोग आधे क्षण भी नहीं रह सकते हैं। इसी कारण से आप पितामह के घर में अधिक लम्बे समय तक ठहरने के योग्य नहीं होते हैं ।१६। पितामह के समीप में गये हुए भी हे पुत्र ! उनकी ही आज्ञा प्राप्त कर उनकी अनुज्ञा से क्रम से शीघ्र ही यहाँ पर आ जाओ ।१७। वसिष्ठजी ने कहा—इस प्रकार से जब उससे कहा गया तो वह महान् बुद्धिमान् था । उसने उनको प्रणाम करके परिक्रमा की थी और माता-पिता की आज्ञा पाकर वहाँ से वह पितामह के घर को चल दिया था ।१८। वहाँ पर जाकर उस राम ने महात्मा भृगुवर्य ऋचीक के आश्रम में प्रवेश किया था जो कि अनेक मुनिगण और शिष्यों से उपशोभित था ।१६। वह आश्रम सभी ओर वेदाध्ययन के बहुत बड़े उद्घोष से प्रति-ध्वनित हो रहा था और वहाँ के सभी प्राणियों में सर्वथा वैर भाव नहीं था तथा सभी जीवोंके द्वारा वह अतीव मनोहर था ।२०। उस परशुराम ने परम

परशुराम का संवाद ] [ १२७

सुन्दर आश्रम में प्रवेश करके हे राजेन्द्र ! आसन पर विराजमान ऋचीक का दर्शन किया था और आगे स्थित पितामह को देखा था ।२१।

जाज्वल्यमानं तपसा धिष्ण्यस्थमिव पावकम् ।
उपासितं सत्यवत्या यथा दक्षिणयाऽध्वरम् ॥२२
स्वसमीपमुपायातं राममालोक्य तौ नृप ।
सुचिरं तं विमर्शेतां समाज्ञापूर्वकदर्शनौ ॥२३
कोऽयमेष तपोराशिः सर्वलक्षणपूजितः ।
बालोऽयं बलवान्भाति गांभीर्यात्प्रश्रयेण च ॥२४
एवं तयोश्चिन्तयतोः सहर्षं हृदि कौतुकात् ।
आससाद शनै रामः समीपे विनयान्वितः ॥२५
स्वनामगोत्रे मतिमानुक्त्वा पित्रोर्मुदान्वितः ।
संस्पृशंश्चरणौ मूर्ध्ना हस्ताभ्यां चाभ्यवादयत् ॥२६
ततस्तौ प्रीतमनसौ समुत्थाप्य च सत्तमम् ।
आशीर्भिरभिनन्देतां पृथक् पृथगुभावपि ॥२७
तमाश्लिष्यांकमारोप्य हर्षाश्रुप्लुतलोचनौ ।
वीक्षंतौ तन्मुखांभोजं परं हर्षमवापतुः ॥२८

उनका स्वरूप धिष्ण्यमें स्थित पावकके ही समान तपसे जाज्वल्यमान था। दक्षिणा के द्वारा अध्वर की ही भाँति सत्यवती के द्वारा वे उपासित थे ।२२। हे नृप ! उन दोनों ने अपने समीप में समागत हुए राम को देखा था और समाज्ञा पूर्वक देखने वाले उन दोनों ने उसके विषय में बहुत समय तक मनमें विमर्श किया था।२३। यह तपश्चर्या के राशि के ही सदृश कौन है जो कि सभी लक्षणों से पूजित हैं। है तो यह बालक परन्तु गम्भीरता और विनय से युक्त बहुत बलवान् प्रतीत होता है।२४। उन दोनों के हृदय में बड़ा कुतूहल हो रहा था और वे हर्ष के साथ यही मन में चिन्तन कर रहे थे कि राम परम विनीत भाव से समन्वित होते हुए धीरे से उनके समीप में पहुँच गया था।२५। उस बुद्धिमान् रामने अपने नाम और गोत्र का उच्चारण करके परमानन्दित होते हुए उन दोनों के चरणों का स्पर्श मस्तक के द्वारा किया और दोनों हाथों से उनका अभिवादन किया था।२६। इसके अनन्तर परम प्रीतियुक्त मन वाले उनने उस श्रेष्ठतम को उठा लिया था

१२८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

और दोनों ने अलग-अलग आशीर्वाद के द्वारा उसका अभिनन्दन किया था ।२७। उसको अपने वक्षःस्थल से लगाकर आलिंगन किया था और अपनी गोद में बिठाकर उन दोनों के हृदय में इतना हर्ष हुआ था कि उनके नेत्र अश्रुओं से समाप्लुत हो गये थे । उस राम के मुख कमल को देखते हुए उन दोनों ने बहुत अधिक हर्ष प्राप्त किया था ।२८।

ततः सुखोपविष्टं तमात्मवंशसमुद्वहम् ।
अनामयपृच्छेतां तावुभौ दंपती तदा ॥२९
पितरौ ते कुशलिनौ वत्स किंवातरस्तथा ।
अनायासेन ते वृत्तिर्वर्तते चाथ कर्हिचित् ॥३०
समस्ताभ्यां ततो राजन्नाचचक्षे यथोदितः ।
तथा स्वानुगतं पित्रोर्भ्रातृ णां चैव चेष्टितम् ॥३१
एवं तयोर्महाराज सत्प्रीतिजनितैर्गुणैः ।
प्रीयमाणोऽवसद्रामः पितुः पित्रोर्निवेशने ॥३२
स तस्मिन्सर्वभूतानां मनोनयननन्दनः ।
उवास कतिचिन्मासांस्तच्छुश्रूषापरायणः ॥३३
अथानुज्ञाप्य तौ राजन्भृगुवर्यो महामनाः ।
पितामहगुरोर्गंतुमियेषाश्रयमाश्रमम् ॥३४
स ताभ्यां प्रीतियुक्ताभ्यामाशीर्भिरभिनंदितः ।
यथा चाभ्यां प्रदिष्टेन ययावौर्वाश्रमं प्रति ॥३५

इसके उपरान्त जब वह सुख पूर्वक बैठ गये तो उस आत्मवंश के समुद्वहन करने वाले से उस समय में उन दोनों दम्पति ने क्षेम कुशल पूछा था ।२६। उन्होंने पूछा था कि हे वत्स ! तुम्हारे माता-पिता सकुशल हैं और तुम्हारे सब भाई सानन्द तो हैं । तुम्हारी वृत्ति अनायास से ही कम हो गई हैं ।३०। इसके अनन्तर हे राजन् ! जैसा कहा गया था वह सम्पूर्ण उसने कह दिया था । अपने माता-पिता की अनुगामिता और भाइयों का जो चेष्टित था वह भी कह दिया था ।३१। हे महाराज ! इस तरह से उन दोनों की सम्प्रीति से समुत्पन्न गुणगणों से बहुत ही प्रसन्न राम पिता के, पिता के घर में रहा था ।३२। वह घर में सभी प्राणियों के मन और नेत्रों को आनन्द

परशुराम का संवाद ] [ १२६

देने वाला होगया था । उनकी सुश्रूषा में तत्पर होकर उसने वहाँ पर कुछ मास तक निवास किया था ।३३। हे राजन् ! इसके पश्चात् महान् मन वाले भृगु वर्य ने उन दोनों की आज्ञा प्राप्त करके पितामह के गुरु के निवास स्थल आश्रम में गमन करने की इच्छा की थी ।३४। परम प्रीति से संयुत उन दोनों के द्वारा उसका आशीर्वचनों से अभिनन्दन किया गया था और उन दोनों ने जिस प्रकार में और्याश्रम के प्रति प्रदर्शन कर दिया था ।३५।

तं नमस्कृत्य विधिवच्च्यवनं च महातपाः ।
सप्रहर्षं तदाज्ञातः प्रययावाश्रमं भृगोः ॥३६
स गत्वा मुनिमुख्यस्य भृगोराश्रममंडलम् ।
ददर्श शांतचेतोभिर्मुनिभिः सर्वतो वृतम् ॥३७
सुस्निग्धशीतलच्छायैः सर्वर्तुकगुणान्वितैः ।
तरुभिः संवृतं प्रीतः फलपुष्पोत्तरान्वितैः ॥३८
नानाखगकुलारावैर्मनः श्रोत्रसुखावहः ।
ब्रह्मघोषैश्च विविधैः सर्वतः प्रतिनादितम् ॥३९
समंत्राहुतिहोमोत्थधूमगंधेन सर्वतः ।
निरस्तनिखिलाघौघं वनांतरविसर्पिणा ॥४०
समित्कुशाहरैर्दण्डमेखलाजिनमंडितैः ।
अभितः शोभितं राजन्म्यैर्मु निकुमारकैः ॥४१
प्रसूनजलसंपूर्णपात्रहस्ताभिरंतरा ।
शोभितं मुनिकन्याभिश्चरंतीभिरितस्ततः ॥४२

उस महान् तपस्वी ने विधिपूर्वक च्यवन की सेवा में प्रणाम किया था और बड़े हर्षपूर्वक उनसे आज्ञा प्राप्त कर वह राम भृगु के आश्रम की ओर रवाना हो गया था ।३५। वह समस्त मुनिगणों में मुख्य भृगु के आश्रम मण्डल में जाकर देखा था कि वह आश्रम परम शान्त चित्त वाले मुनियों से सभी ओर घिरा हुआ है ।३७। अतीव घनी और शीतल छाया वाले और सभी ऋतुओं के गुणों से समन्वित तथा प्रीतिदायक फलों और पुष्पों से युक्त तरुवरों से वह आश्रम संयुत था ।३८। विविध अकार के पक्षियों की ध्वनियां पर हो रही थी जो मन और कानों को परम सुख प्रदान करने वाली थीं।

१३० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

वेद मन्त्रों के समुच्चारण के घोष से वह आश्रम सभी ओर से प्रतिध्वनित हो रहा था ।३६। मन्त्रोच्चारण पूर्वक दी हुई आहुतियों के द्वारा जो होम किया जाता है उसका अन्य वनों में फैलने वाले गन्ध से जो सभी ओर है उससे समस्त पापों का समूह जिससे निरस्त हो गया है ऐसा वह आश्रम है ।४०। हे राजन् ! समिधाओं और कुशाओं के आहरण करने वाले तथा दण्ड, मेखला और मृगछालाओं से विभूषित, परम सुन्दर मुनियों के कुमारों से सायने वह आश्रम शोभा युक्त है ।४१। बीच में इधर-उधर हाथों में पुष्प और जल लिए हुए सञ्चरण करने वाली कन्याओं से वह आश्रम उपशोभित है ।४२।

सपोतहरिणीयूथैर्विस्त्रंभादविशंकिभिः ।
उटजांगणपर्यन्ततरुच्छायास्नधिष्ठितम् ।।४३
रोमंकतः परामृष्टियूथसाक्षिकमुत्प्रदैः ।
प्रारब्धतांडवं केकीमयूरैर्मधुरस्वरैः ।।४४
प्रविकीर्णकणोद्देशं मृगशब्दैः समीपगैः समीपर्गैः ।
अनालीढातपच्छायाशुष्यन्नीवारराशिभिः ।।४५
हूयमानानलं काले पूज्यमानातिथिप्रजम् ।
अभ्यस्यमानच्छंदौघं चित्यमानागमोदितम् ।।४६
पठ्यमानाखिलस्मार्त्त श्रौतार्थप्रविचारणम् ।
प्रारब्धपितृदेवेज्यं सर्वभूतमनोहरम् ।।४७
तपस्विजनभूयिष्ठमकापुरुषसेवितम् ।
तपोवृद्धिकरं पुण्यं सर्वसत्त्वसुखास्पदम् ।।४८
तपोधनानन्दकरं ब्रह्मलोकमिवापरम् ।
प्रसूनसौरभभ्राम्यन्मधुव्रतावनादितम् ।।४९

अहिंसा के पूर्ण विश्वास से शङ्का से रहित अपने छोटे-छोटे बच्चों के सहित हरिणियों के झुण्ड जिससे मुनियों कुटियों के आँगन में लगे हुए वृक्षों की छाया में बैठे हुए हैं ।४३। रोमन्थ से परामृष्टि यूथ के साक्षिक आनन्द के प्रदान करने वाले तथा मधुर स्वर से समन्वित वाणी बोलने वाले मयूरों का नृत्य जिस आश्रम में प्रारम्भ होगया है ।४४। समीप में गमन

परशुराम का संवाद ] [ १३१

करने वाले मृगों के शब्दों से जहाँ पर कण फैले हुए हैं तथा अनालीढ आतप की छाया में नीवारों की राशि जहाँ पर सूख रही है ऐसा वह सुरम्य आश्रम आश्रय है ॥४५॥ जिस आश्रम में समय पर अग्नि में आहुतियाँ दी जाती हैं और जहाँ पर अतिथियों के समुदाय का अर्चन एवं सत्कार किया जाया करता है । जिस आश्रम में भेदों के छन्दों का अभ्यास किया जाता है तथा जो कुछ भी शास्त्रों में कहा गया है उसका चिन्तन किया जाता है ॥४६॥ पढ़े जाने वाले सम्पूर्ण स्मृति प्रतिपादित तथा वैदिक अर्थ का विचार किया जाता है । जिसमें देवों और पितृगणों का यजन प्रारम्भ कर दिया गया है तथा जो आश्रम सभी प्राणियों के लिए परम सुन्दर है ॥४७॥ जिस परम सुरम्य आश्रम में बहुत से तपस्वी गण विद्यमान हैं और जो कापुरुष नहीं हैं उन्हीं के द्वारा सेवित है यह तपश्चर्या की वृद्धि करने वाला—परम पुण्यमय और सभी जीवों के सुखों का स्थल है ॥४८॥ जिनका एकमात्र तप ही धन है उन तापसों के आनन्द का यह आश्रय देने वाला है और यह ऐसा दिखलाई देता है मानो यह दूसरा ब्रह्मलोक ही हो । पुष्पों की सुगन्ध से भ्रमण करते हुए भ्रमरों की गुञ्जार से यह आश्रम गुञ्जित है ॥४६॥

सर्वंतो वीज्यमानेन विविधेन नभस्वता । एवंविधगुणोपेतं पश्यन्नाश्रममुत्तमम् ॥५० प्रविवेश विनीतात्मा सुकृतीवामरालयम् । संप्रविश्याश्रमोपांतं रामः स्वप्रपितामहम् ॥५१ ददर्श परितो राजन्मुनिशिष्यशतावृत्तम् । व्याख्यानवेदिकामध्ये निर्विष्टं कुशविष्टरे । सितश्मश्रु जटाकूर्चब्रह्मसूत्रोपशोभितम् ॥५२ वामेतरोरुमध्यास्त वामजंघेन जानुना ॥५३ योगपट्टेन संवीतास्वदेहम् विपुंगवम् । व्याख्यानमुद्राविलसत्सव्यपाणितलांबुजम् ॥५४ योगपट्टोपरिन्यस्तविभ्राजद्वामपाणिकम् । सम्यगारण्यवाक्यानां सूक्ष्मतत्त्वार्थसंहतिम् ॥५५ विवृत्य मुनिमुख्येभ्यः श्रावयंतं तपोनिधिम् । पितुः पितामहं दृष्ट्वा रामस्तस्य महात्मनः ॥५६

१३२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

सभी ओर विविध प्रकार की वायु से यह वीज्यमान है अर्थात् जहां पर नाना भाँति की वायु सर्वत्र वहन किया करती है । इस रीति से अनेक प्रकार के गुणों से यह आश्रम समन्वित है । ऐसे आश्रम को जो बहुत ही उत्तम है उस राम ने देखा था ॥५०॥ जिस तरह कोई सुकृत करने वाला पुरुष स्वर्ग में प्रवेश किया करता है उसी तरह से परम विनीत उस राम ने वहाँ पर आश्रम में प्रवेश किया था । उस आश्रम के उपान्त में प्रवेश करके राम ने अपने प्रपितामह का दर्शन प्राप्त किया था ॥५१॥ हे राजन् ! वे प्रपितामह सैकड़ों ही मुनियों और शिष्यों से चारों ओर घिरे हुए थे । वे व्याख्यान करने की जो वेदिका थी उसके मध्य में एक कुशा के आसन पर विराजमान थे । उनके श्मश्रु-जटा और कूर्च (दाढ़ी) एकदम सफेद थे तथा ब्रह्मसूत्र से उपशोभित थे ॥५२॥ वामजंघा और जानु से दक्षिण ऊरु से वे अध्यस्त थे ॥५३॥ योग पट्ट से संवीत अपने देह वाले वे ऋषियों में परम श्रेष्ठ थे तथा व्याख्यान करने की मुद्रा से शोभित सव्य करकमल वाले थे ॥५४॥ योग पट्ट के ऊपर रक्खे हुए परम शोभित वाम कर वाले और भली भाँति आरण्यक उपनिषद् के वाक्यों के सूक्ष्म तत्व के अर्थ की संहृति का विशेष विवरण कर रहे थे ॥५५॥ और उनका विवरण करके वे तपोनिधि मुख्य मुनियों को श्रवण करा रहे थे । राम ने पितामह का दर्शन किया था ॥५६॥

शनैरिव महाराजसमीपं समुपागमत् ।
तमागतमुपालक्ष्य तत्प्रभावप्रधर्षिताः ॥५७
शंकामवापुर्मुनयो दूहादेवाखिलं नृप ।
तावद्भृगुरमेयात्मा तदागमनतोषितः ॥५८
निवृत्तान्यकथालापस्तं पश्यन्नास पार्थिव ।
रामोऽपि तमुपागम्य विनयावनताननः ॥५९
अवंदत यथान्यायमुपेन्द्र इव वेधसम् ।
अभिवाद्य यथान्यायं ख्यातिं च विनयान्वितः ॥६०
तांश्च संभावयामास मुनीन्द्रामो यथावयः ।
तैश्च सर्वैर्मुदोपेतैराशीर्भिरभिवर्द्धितः ॥६१
उपाविवेश मेधावी भूमौ तेषामनुज्ञया ।
उपविष्टं ततो राममाशीर्भिरभिनंदितम् ॥६२

परशुराम का संवाद ] [ १३३

पप्रच्छ कुशलं प्रश्नं तमालोक्य भृगुस्तदा ।
कुशलं खलु ते वत्स पित्रोश्च किमनामयम् ॥६३

हे महाराज ! फिर वह राम उन महान् आत्मा वाले के समीप में धीरे से प्राप्त हुआ था। उसको समागत हुआ देखकर वहाँ पर जो भी स्थित थे वे सभी राम के प्रबल प्रभाव से धर्षित हो गये थे ।५७। हे नृप ! समस्त मुनिगण दूर से ही शङ्का को प्राप्त हो गये थे तब तक अमेय आत्मा वाले भृगु उसके आगमन से तोषित हुए थे ।५८। हे पार्थिव ! उसको देखते हुए ही अन्य कथा की बात चीत को उन्होंने बन्द कर दिया था। राम भी उनके समीप में पहुँचकर विनय से विनम्र मुख कमल वाला हो गया था ।५६। जिस प्रकार से उपेन्द्र ब्रह्माजी की वन्दना किया करते हैं ठीक उसी तरह से न्याय पूर्वक राम ने उनकी वन्दना की थी। विनम्रता समन्वित राम ने न्याय पूर्वक सबका अभिवादन किया था ।६०। राम ने समस्त मुनियों को अवस्था के अनुसार क्रम से सम्भावित किया था। और उन सब मुनियों ने भी आनन्द से समन्वित होकर आशीर्वादों के द्वारा उस रामको परिवर्धित किया था ।६१। वह परम मेधा से सुसम्पन्न राम भी उन सबकी अनुज्ञा से भूमि पर समीप में बैठ गया था। फिर जब बैठ गया तो सबने राम को आशीर्वचनों से अभिनन्दित किया था ।६२। उस समय में भृगु ने उस राम का अवलोकन करके उससे कुशल प्रश्न पूछा था कि हे वत्स ! तुम्हारा कुशल तो है और तुम्हारे माता-पिता-पिता का स्वास्थ्य सुखमय है ।६३।

भ्रातॄणां चैव भवतः पितुः पित्रोस्तथैव च ।
किमर्थमागतोऽत्र त्वमधुना मम सन्निधिम् ॥६४
केनापि वा त्वमादिष्टः स्वयमेवाथवागतः ।
ततो रामो यथान्यायं तस्मै सर्वमशेषतः ॥६५
कथयामास यत्पृष्टं तदा तेन महात्मना ।
पितुर्मातुश्च वृत्तांतं भ्रातॄणां च महात्मनाम् ॥६६
पितुः पित्रोश्च कौशल्यं दर्शनं च तयोर्नृप ।
एतदन्यच्च सकलं भृगोः सप्रश्रयं मुदा ॥६७
न्यवेदयद्यथान्यायमात्मनश्च समीहितम् ।
श्रुत्वैतदखिलं राजन्‌रामेण समुदीरितम् ॥६८

१३४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

तं च दृष्ट्वा विशेषेण भृगुः प्रीतोऽभ्यनन्दत । एवं तस्य प्रियं कुर्वन्नुत्कृष्टैरात्मकर्मभिः ॥६९॥ तत्राश्रमेऽवसद्रामो दिनानि कतिचिन्नृप । ततः कदाचिदेकांते रामं मुनिवरोत्तमः ॥७०॥

तुम्हारे भाइयों का आपके पिता के माता-पिता का कुशल-मङ्गल तो है ? इस समय में तुम किस प्रयोजन के लिए यहाँ पर मेरे समीप में समागत हुए हो ? ।६४। क्या किसी ने तुम को यहाँ आने की आज्ञा दी है अथवा तुम स्वयं अपनी ही इच्छा से यहाँ पर आये ? इसके पश्चात् राम ने उनकी सेवा में न्यायपूर्वक सभी कुछ पूर्णतया निवेदित कर दिया था। उन महात्मा ने उस वक्त जो भी पूछा था वह सब कह दिया था जो भी कुछ पिता-माता का और महान् आत्मा वाले भाइयों का वृत्तान्त था ।६५-६६। हे नृप ! उन दोनों पिता के माता-पिता की कुशलता से दर्शन का होना-यह और आय भृगु का नम्रता के साथ आनन्द से सब बता दिया था। और अपना जो भी कुछ अभीष्ट था उसका निवेदन कर दिया था। हे राजन् ! राम के द्वारा वर्णित यह सब श्रवण करके और विशेष रूप से उसको देखकर भृगु बहुत ही प्रसन्न हुए थे और उसका अभिनन्दन किया था। इस तरह से अतीव उत्कृष्ट अपने कर्मों के द्वारा उसका प्रिय करते हुए राम ने वहाँ निवास किया था। हे नृप ! राम उस आश्रम में कुछ दिन तक रहा था। इसके उपरान्त मुनिवर ने राम को किसी समय में एकान्त में बुलाया था। ।६७-७०।

वत्सागच्छेति तं राजन्नुपाह्वयदुपह्वरे । सोऽभिगम्य तमासीनमभिवाद्य कृतांजलिः ॥७१॥ तस्थौ तत्पुरतो रामः सुप्रीतेनांतरात्मना । आशीर्भिरभिनंद्याथ भृगुस्तं प्रीतमानसः ॥७२॥ प्राह नाधिगताशंकं राममालोक्य सादरम् । शृणु वत्स वचो मह्यं यत्त्वां वक्ष्यामि सांप्रतम् ॥७३॥ हितार्थं सर्वलोकानां तव चास्माकमेव च । गच्छ पुत्र ममादेशाद्धिमवंतं महागिरिम् ॥७४॥

परशुराम का संवाद ] [ १३५

अधुनैवाश्रमादस्मात्तपसे धृतमानसः । तत्र गत्वा महाभाग कृत्वाऽश्रमपदं शुभम् ॥७५ आराध्य महादेवं तपसा नियमेन च । प्रीतिमुत्पाद्य तस्य त्वं भक्त्यानन्यगयाचिरात् ॥७६ श्रेयो महदवाप्नोषि नात्र कार्या विचारणा । तरसा तव भक्त्या च प्रीतो भवति शङ्करः ॥७७

मुनि ने कहा था—हे वत्स ! उपह्वर में आओ । वह रामभी उन मुनि के समीप में जाकर अपने हाथ जोड़कर उनका उसने अभिवादन किया था ।७१। राम परम प्रसन्न आत्मा से उनके आगे स्थित हो गया था और प्रसन्न मन वाले भृगु ने आशीर्वादों के द्वारा अभिनन्दन किया था ।७२। उसने न अधिगत अंश वाले राम को आदर के साथ देखकर कहा था। हे वत्स ! आप मेरा वचन श्रवण करो जो इस समय में मैं आपको कहूँगा ।७३। यह वचन समस्त लोकों के तुम्हारे और हमारे हित के लिये है। हे पुत्र ! मेरे आदेश से अब महान् पर्वत हिमवान् को चले जाओ ।७४। तपश्चर्या करने के लिये अपने मन में निश्चय करके इसी समय इस आश्रम से चले जाओ । हे महाभाग, वहाँ जाकर उस आश्रम के स्थान को शुभ बना दो ।७५। यहाँ पर तपस्या और नियम से महादेवजी की समाराधना करो । चिरकाल तक अनन्य भक्ति से आप उनकी प्रीति का समुत्पादन करो ।७६। इसके करने से आप महान् श्रेय की प्राप्ति करेंगे—इस विषय में लेशमात्र भी सन्देह नहीं करना चाहिए। शीघ्र ही आपकी भक्ति से भगवान् शङ्कर परम प्रसन्न हो जायेंगे ।७७।

करिष्यति च ते सर्वं मनसा यद्यदिच्छसि । तुष्टे तस्मिञ्जगन्नाथे शङ्करे भक्तवत्सले ॥७८ अस्त्रग्राममशेषं त्वं वृणु पुत्र यथेप्सितम् । त्वया हितार्थं देवानां करणीयं सुदुष्करम् ॥७९ विद्यतेऽभ्यधिकं कर्म शस्त्रसाध्यमनेकंशः । तस्मात्त्वं देवदेवेशं समाराधय शङ्करम् ॥८० भक्त्या परमया युक्तस्ततोऽभीष्टमवाप्स्यसि ॥८१

१३६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

वे भगवान् शङ्कर तुम्हारा सभी कुछ कार्य पूर्ण कर देंगे जो-जो भी आप अपने मन में चाहेंगे। उन भक्तों पर प्यार करने वाले जगत् के स्वामी भगवान् शङ्कर के सन्तुष्ट हो जाने पर तुम को यह करना चाहिए ।७८। हे पुत्र ! जो भी तुम्हारा अभीप्सित हो वह समस्त अस्त्रों के समुदाय को आप उनसे वरदान में माँग लेना। तुमको समस्त देवों की भलाई के लिए इस परम दुष्कर कार्य को कर ही लेना चाहिए ।७९। शस्त्रों के द्वारा साधन करने के योग्य अनेक कर्म होते हैं और विशेष अधिक होते हैं। इस कारण से तुम देवों के भी आराध्य देव भगवान् शङ्कर की आराधना करो। परमाधिक भक्ति से जब तुम संयुत हो जाओगे तो तुम सम्पूर्ण अपना प्राप्त कर लोगे ।८०-८१।


परशुराम की तपश्चर्या

वसिष्ठ उवाच-इत्येवमुक्तो भृगुणा तथेत्युक्त वा प्रणम्य तम् ।
रामस्तेनाभ्यनुज्ञातश्चकार गमने मनः ॥१
भृगुं ख्यातिं च विधिवत्परिक्रम्य प्रणम्य च ।
परिष्वक्तस्तथा ताभ्यामाशीर्भिरभिनंदितः ॥२
मुनींश्च तान्नमसकृत्य तैः सर्वैरनुमोदितः ।
निश्चयक्रमाश्चमात्तस्मात्तपसे कृतनिश्चयः ॥३
ततो गुरुनियोगेन तदुक्तेनैव वर्त्मना ।
हिमवंतं गिरिवरं ययौ रामो महामनाः ॥४
सोऽतीत्य विविधान्देशान्पर्वतान्सरितस्तथा ।
वनानि मुनिमुख्यानामावासांश्चात्यगाच्छनैः ॥५
तत्र तत्र विवासेषु मुनीनां निवसन्पथि ।
तीर्थेषु क्षेत्रमुख्येषु निवसन्वा ययौ शनैः ॥६
अतीत्य सुवहून्देशान्पश्यन्नपि मनोरमान् ।
आससादाचलश्रेष्ठं हिमवंतमनुत्तमम् ॥७

श्री वसिष्ठ जी ने कहा—भृगु मुनि के द्वारा इस प्रकार से कहे जाने पर मैं ऐसा ही करूँगा—यह कहकर राम ने उनको प्रणाम किया था और

परशुराम की तपश्चर्या ] [ १३७

राम उनके द्वारा आज्ञा प्राप्त करके वहाँ पर गमन करने का मन वाला हो गया था ।१। भृगु के सुयश का गान कर तथा विधि पूर्वक उनकी परिक्रमा करते हुए प्रणाम करके राम ने प्रस्थान करने की तैयारी की थी । उन दोनों ने उसका परिष्वजन किया था और आशीर्वचनों से राम का अभिनन्दन किया था ।२। वहाँ पर जो भी मुनिगण थे उन सबके लिए राम ने प्रणाम किया था तथा वह उन सब के द्वारा वहाँ गमन करने के लिए अनुमोदन प्राप्त करने वाला हुआ था । फिर राम उस आश्रम के स्थल से तपश्चर्या करने के लिए मन में पूर्ण निश्चय वाला होकर निकल दिया था ।३। इसके अनन्तर गुरु देव के नियोग से और उनके द्वारा बताये हुए बताये हुए मार्ग से महान् मन वाले राम ने गिरियों में परम श्रेष्ठ हिमवान् को गमन किया था ।४। मार्ग में उसको अनेक देश—पर्व्वत—नदियाँ—वन और प्रमुख मुनियों के आवास-स्थल मिले थे । उन सबका उसने धीरे-धीरे अतिक्रमण किया था ।५। मार्ग में जहाँ-जहाँ पर मुनियों के निवास स्थलों में विश्राम करते हुए और जो मुख्य क्षेत्र थे तथा तीर्थ स्थल मिले थे उनमें निवास करते हुए धीरे-धीरे वह वहाँ पर चलते चला गया था ।५। मार्ग में अनेक देशों का अतिक्रमण करके और परम मनोरथ देशों का अवलोकन करते हुए अन्त में परमोत्तम और पर्वतों में श्रेष्ठ हिमवान् पर वह पहुँच गया था ।७।

स गत्वा पर्व्वतवरं नानाद्रुमलतास्थितम् ।
ददर्श विपुलैः शृङ्गैरुलिखंतमिवांबरम् ॥८
नानाधातुविचित्रैश्च प्रदेशैरुपशोभितम् ।
रत्नौषधीभिरभितः स्फुरद्‌भिरभिशोभितम् ॥९
मरुत्संघट्टनावह्नीरसान्घ्रिपजन्मना ।
सानिलेनानलेनोच्चैर्दह्यमानं नवं क्वचित् ॥१०
क्वचिद्रविकरामर्शज्वलदकौपलाग्निभिः ।
द्रवद्धिमशिलाजातुजलशांतदवानलम् ॥११
स्फटिकांजनदुर्वर्णस्वर्णराशिप्रभाकरैः ।
स्फुरत्परस्परच्छायाशरैर्दीप्तवनं क्वचित् ॥१२
उपत्यकशिलापृष्ठबालातपनिषेविभिः ।
तुषारक्लिन्नसिद्धौघैरुद्भासितवनं क्वचित् ॥१३

१३८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

क्वचिदकॊ शुसंभिन्नश्चामीकरशिलाश्रितैः । यक्षौघैर्भासितोपांतं विशद्भिरिव पावकम् ॥१४

वह उस श्रेष्ठ पर्वत पर पहुँच गया था जहां पर अनेक प्रकार के वृक्ष और लताएं थीं । उसने वहाँ पर देखा था कि बहुत से ऐसे ऊँचे शिखर विद्यमान हैं जो मानों अम्बर का स्पर्श करके उस पर कुछ लिख रहे हों ।८। वहाँ पर अनेक ऐसे प्रदेश हैं जिनमें विचित्र प्रकार की बहुत सी धातुएं विद्यमान हैं और उनसे वह परम शोभा शाली हो रहा है । वहाँ अनेक प्रकार के रत्न तथा दिव्य ओषधियां हैं जो निरन्तर स्फुरण किया करते हैं और उनसे उसकी अद्भुत शोभा हो रही है ।९। कहीं पर वायु के संघटन से रगड़ खाये हुए शुष्क वृक्षों से समुत्पन्न और वायु के संयोग वाले अग्नि से कहीं पर वह दाह भी करने वाला दिखाई दे रहा था ।१०। कहीं पर सूर्य की किरणों के प्रखर स्पर्श से जलती हुई अर्कोप्लाग्नि से पिघले हुए हिम की शिलाओं के जल से वह दवानल एकदम शान्त हो गया है ।११। कहीं पर स्फटिक अञ्जन से बुरे वर्ण वाले स्वर्ण के समूह की प्रभा की किरणों के द्वारा स्फुरण करते हुए परस्पर में छाया शरों से प्रसिद्ध था ।१२। उपत्यकाओं की शिलाओं के पृष्ठ भाग पर बालातप का सेवन करने वाले तुषार से क्लिन्न सिद्धों के समुदाय से वह वह वन कहीं पर उद्भासित हो रहा था । किसी-किसी जगह पर सूर्य की किरणों से संभिन्न सुवर्ण की शिलाओं पर समाश्रय ग्रहण करने वाले यक्षों के समुदायों से पावक में प्रवेश करने वालों की तरह उसका उपान्त भासित हो रहा था ।१४।

दरीमुखविनिष्क्रांततरक्षूत्पतनाकुलः । मृगयूथार्त्तसन्नादैरापूरितगुहं क्वचित् ॥१५ युद्धद्यद्वराहशार्दूलयूथपेरितरेतरम् । प्रसभोन्मृष्टकांतोरुशिलातरुतटं क्वचित् ॥१६ कलभोन्मेषणाकृष्टकारिणीभिरनुद्रुतः । गवयैः खुरसंक्षुण्णशिलाप्रस्थतटं क्वचित् ॥१७ वासितार्थेऽभिसंवृद्धमदोन्मत्तमतंगजैः । युद्धद्यद्भिश्चूर्णितानेकगंडशैलवनं क्वचित् ॥१८ बृंहितश्रवणामर्षान्मातंगानभिधावताम् ।

परशुराम की तपश्चर्या } [ १३६

सिंहानां चरणक्षुण्णनखभिन्नोपलं क्वचित् ॥१६
सहसा निपतत्सिंहनखनिर्भिन्नमस्तकः ।
गजैराक्रन्दनादेन पूर्यमाणं वनं क्वचित् ॥२०
अष्टपादबलाकृष्टकेसरा दारुणाप्रवैः ।
भेद्यमानाखिलशिलागंभीरकुहरं क्वचित् ॥२१

कहीं पर दरियों के मुख से निकले हुए तरक्षुओं के उत्पतन ऊपर की ओर (उछाल) से समाकुल मृगों के आत्त नादों से जिसकी गुहा समापूरित हो रही थी ।१५। किसी स्थल पर एक दूसरे से परस्पर में युद्ध करते हुए वराह और शार्दूलों के यूथपतियों के द्वारा बलात् उन्मृष्ट सुन्दर एवं विशाल शिला एवं तटके तरुवर जिसमें विद्यमान थे ।१६। कहीं पर कलभों के उन्मेषण से आकृष्ट हुई करिणियों के द्वारा भागे हुए गवयों के खुर से वहाँ के तट प्रस्थ संक्षुण्ण थे ।१७। किसी स्थान पर वासित अर्थ में विशेष बढ़े हुए मद से उन्मत्त गजों से जो कि परस्पर में युद्ध कर रहे थे गण्ड स्थलों के द्वारा अनेक शैल के वनों को वहाँ पर चूर्णित कर दिया था ।१८। कहीं पर हाथियों की ध्वनि के श्रवण से जो क्रोध हुआ उसके कारण गजों को खदेड़ते हुए सिंहों के चरणों के क्षुण्ण नखों से पाषाण भिन्न हो गये थे ।१६। कहीं पर वहाँ ऐसा स्थल था कि अचानक आक्रमण करने वाले सिंहों के नाखूनों से युक्त हाथियों के क्रन्दन की ध्वनि से सम्पूर्ण वन पूरित होरहा था ।२०। अष्टपादों के द्वारा बलपूर्वक जिनके केसर खींच लिए गये हैं उनके परम दारुण शब्द से कहीं कहीं पर पर्वत की गम्भीर गुफाएँ भी सब भेद्यमान थी ।२१।

संरब्धानेक शबरप्रसक्त ऋक्षयूथपैः ।
इतरेतरसंमर्द विप्रभग्नदृषत्क्वचित् ॥२२
गिरिकुंजेषु संक्रीडत्करिणीमद्विपं क्वचित् ।
करेणुमद्रबन्मत्तगजाकलितकाननम् ॥२३
स्वपत्सिंहमुखश्वासमरूत्पूर्णदरीशतम् ।
गहनेषु गुरुत्राससाशंकविहरन्मृगम् ॥२४
कंटकशिलष्टलांगूललोमत्रुटनकातरैः ।
क्रीडितं चमरीयूथैर्मदमंदविचारिभिः ॥२५

१४० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

गिरिकंदरसंसक्तकिन्नरीसमुदीरितैः । सतालनादैरुदितैर्भूताशेषदिशामुखम् ।।२६ अरण्यदेवतानां च चरंतीनामितस्ततः । अलक्तकरसक्लिन्नचरणांकितभूतलम् ।।२७ मयूरकेकिनीवृन्दैः संगीतमधुरस्वरैः । प्रवृत्तनृत्तं परितो विततोदग्रबर्हिभिः ।।२८ किसी स्थल पर संरब्ध बहुत से शबरों के द्वारा प्रसक्त रीछों के यूथ पतियों के आनस में एक दूसरे के साथ संमर्द में शिलाएं भग्न हो गयीं थीं ।२२। कहीं पर पर्वत की कुञ्जों में करिणियां क्रीड़ाएं कर रही थीं और वहाँ पर कोई करी नहीं था तब करेणु पर मत्तगज दौड़कर चले जा रहे थे इस प्रकार से वहाँ कानन समाकलित था ।२३। कहीं पर वहाँ ऐसा भी बल था जहाँ पर सोते हुए सिंहों के मुखों के श्वासों की वायु से सैकड़ों गुहाएं पूरित हो रहीं थीं और वनों में बड़े भारी भय के कारण मृगगण शङ्कित होकर ही विहार कर रहे थे ।२४। किसी जगह पर यह वन चमरी गौओं के द्वारा क्रीड़ा का स्थल बना हुआ था जिनके पूँछों में कांटे लगे हुए थे और उनसे लोम टूट गये थे । जिसके कारण वे भयभीत होकर मन्दगति से विच-रण कर रही थीं ।२५। कहीं पर गिरि की कन्दराओं में से सक्त किन्नरियों के समुदाय थे और उनके द्वारा कहे हुए ताल के नादों तथा गीतों से सभी दिशाएँ पूरित थीं ।२६। उस महान् गिरि पर का वन इधर-उधर विचरण करती हुईं अरण्य देवताओं के चरणों में लगे हुए महावर के रस से वह भूतल चरणों के चिह्नों से अङ्कित हो रहा था ।२७। सङ्गीत के मधुर स्वरों से समन्वित-मयूर-मयूरियों के झुण्ड अपनी पंखों को फैलाकर कहीं पर आनन्द पूर्वक नृत्य कर रहे थे ।२८।

रामो मतिमतां श्रेष्ठस्तपसे च मनो दधे । शाकमूलफलाहारो नियतं नियतेंद्रियः ।।२६ तपश्चचार देवेशं विनिवेश्यात्ममानसे । भृगूपदिष्टमार्गेण भक्त्या परमया युतः ।।३० पूजयामास देवेशमेकाग्रमनसा नृप । अनिकेतः स वर्षासु शिशिरे जलसंश्रयः ।।३१