संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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स्वभाव पाद शेष प्रतिष्ठित होते हैं। इसी प्रकार से युगान्तिक काल के सम्प्राप्त होने पर सन्ध्या के अंश में होता है ।७५। उन असाधु भृगुओं का शासन करने वाला निधनतोत्थित है । वह चन्द्रमा के गोत्र से है और नाम से प्रमति कहा जाया करता है ।७६। वह पूर्व स्वायम्भुव अन्तर में माधव के अंश से पूर्ण बीस पर्यन्त इस वसुन्धरा पर पर्यटन करता था ।७७।
अनुकर्षन्स वै सेनां सवाजिरथकुंजराम् ।
प्रगृहीतायुधैर्विप्रैः शतशोऽथ सहस्रशः ॥७८
स तदा तै परिवृतो म्लेच्छांन्हंति स्म सर्वशः ।
सह वा सर्वशश्चैव राज्ञस्ताञ्छूद्रयोनिजान् ॥७९
पाखण्डांस्तु ततः सर्वान् निःशेषं कृतवान्विभुः ।
तात्यर्थं धार्मिका ये च तान्सर्वांन्हंति सर्वशः ॥८०
वर्णव्यत्यासजातांश्च ये च ताननुजीविनः ।
उदीच्यान्मध्यदेश्यांश्च पर्वतीयांस्तथैव च ॥८१
प्राच्यान्प्रतीच्यांश्च तथा विन्ध्यपृष्ठचरानपि ।
तथैव दाक्षिणायांश्च द्रविहान्सिहलैः सह ॥८२
गांधारान्पारदांश्चैव प्रह्लवान्यवनाञ्शकान् ।
तुषारान्बर्बरांचीनाञ्छूलिकान्दरदान् खशान् ॥८३
लंपाकारान्सकलकान्किरातानां च जातयः ।
प्रवृत्तचक्रो बलवाम्म्लेच्छानामंतकृत्प्रभुः ॥८४
वह घोड़े-रथ और हाथियों के सहित सेना का अनुकर्षण करके सैकड़ों सहस्रों की संख्या में हथियार ग्रहण करने वाले विप्रों से समन्वित था ।७८। उस समय में इन सबसे परिवृत होते हुए उसने सभी ओर से म्लेच्छों का हनन किया था । उनके साथ ही अथवा सभी ओर से उन शूद्र योनि में समुत्पन्न राजाओं का भी हनन कर दिया था ।७९। पाखण्ड से जो परिपूर्ण थे फिर उन सबका उस विभु ने कर दिया था । जो अत्यधिक कर्म के मानने वाले नहीं थे उन सबको सभी ओर में पूर्णतया हनन करता है ।८०। जो लोग वर्णों के व्यत्यास से समुत्पन्न हुए थे अर्थात् वर्णसङ्कर थे और जो उनके अनुजीवी थे । चाहे वे उत्तर दिशा में रहने वाले होवें या