भारतकोश
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संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

११६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

स्वभाव पाद शेष प्रतिष्ठित होते हैं। इसी प्रकार से युगान्तिक काल के सम्प्राप्त होने पर सन्ध्या के अंश में होता है ।७५। उन असाधु भृगुओं का शासन करने वाला निधनतोत्थित है । वह चन्द्रमा के गोत्र से है और नाम से प्रमति कहा जाया करता है ।७६। वह पूर्व स्वायम्भुव अन्तर में माधव के अंश से पूर्ण बीस पर्यन्त इस वसुन्धरा पर पर्यटन करता था ।७७।

अनुकर्षन्स वै सेनां सवाजिरथकुंजराम् ।
प्रगृहीतायुधैर्विप्रैः शतशोऽथ सहस्रशः ॥७८
स तदा तै परिवृतो म्लेच्छांन्हंति स्म सर्वशः ।
सह वा सर्वशश्चैव राज्ञस्ताञ्छूद्रयोनिजान् ॥७९
पाखण्डांस्तु ततः सर्वान् निःशेषं कृतवान्विभुः ।
तात्यर्थं धार्मिका ये च तान्सर्वांन्हंति सर्वशः ॥८०
वर्णव्यत्यासजातांश्च ये च ताननुजीविनः ।
उदीच्यान्मध्यदेश्यांश्च पर्वतीयांस्तथैव च ॥८१
प्राच्यान्प्रतीच्यांश्च तथा विन्ध्यपृष्ठचरानपि ।
तथैव दाक्षिणायांश्च द्रविहान्सिहलैः सह ॥८२
गांधारान्पारदांश्चैव प्रह्लवान्यवनाञ्शकान् ।
तुषारान्बर्बरांचीनाञ्छूलिकान्दरदान् खशान् ॥८३
लंपाकारान्सकलकान्किरातानां च जातयः ।
प्रवृत्तचक्रो बलवाम्म्लेच्छानामंतकृत्प्रभुः ॥८४

वह घोड़े-रथ और हाथियों के सहित सेना का अनुकर्षण करके सैकड़ों सहस्रों की संख्या में हथियार ग्रहण करने वाले विप्रों से समन्वित था ।७८। उस समय में इन सबसे परिवृत होते हुए उसने सभी ओर से म्लेच्छों का हनन किया था । उनके साथ ही अथवा सभी ओर से उन शूद्र योनि में समुत्पन्न राजाओं का भी हनन कर दिया था ।७९। पाखण्ड से जो परिपूर्ण थे फिर उन सबका उस विभु ने कर दिया था । जो अत्यधिक कर्म के मानने वाले नहीं थे उन सबको सभी ओर में पूर्णतया हनन करता है ।८०। जो लोग वर्णों के व्यत्यास से समुत्पन्न हुए थे अर्थात् वर्णसङ्कर थे और जो उनके अनुजीवी थे । चाहे वे उत्तर दिशा में रहने वाले होवें या

चतुर्युगसंख्यावर्णनम् ] [ ११७

अन्य देश के होवें तथा पर्वतों में निवास करने वाले होवें ।८१। दिशा में रहने वाले हों या पश्चिम में रहते हों अथवा विन्ध्याचल के पृष्ठ पर सञ्चरण करने वाले भी होवें। उसी भाँति जो दाक्षिणात्य थे, द्रविड़ थे और सिंहल थे ।८२। गान्धार-पारद-पह्लव-यवन-शक-तुषार-बर्बर-चीन- शूलिक-दरद-खश । लम्पाकार-सकतक और जो भी किरातों की जातियाँ थीं । इन सभी का म्लेच्छों का वह बलशाली प्रभु चक्र ग्रहण करके अन्त कर देने वाला था ।८३-८४।

अदृष्टः सर्वभूतानां चचाराथ वसुन्धराम् । माधवस्य तु सोऽंशेन देवस्येह विजज्ञिवान् ॥८५ पूर्वजन्मनि विख्यातः प्रमतिर्नाम वीर्यवान् । गोत्रतो वै चंद्रमसः पूर्वे कलियुगे प्रभुः ॥८६ द्वात्रिंशेऽभ्युदिते वर्षे प्रक्रांतो विंशतीः समाः । विनिघ्नन्सर्वभूतानि मानवानेव सर्वशः ॥८७ कृत्वा बीजावशेषं तु पृथ्व्यां क्रूरेण कर्मणा । परस्परं निमित्तेन कोपेनाकस्मिकेन तु ॥८८ सुसाधयित्वा वृषलान्प्रायशस्तानधार्मिकान् । गंगायमुनयोर्मध्ये निष्ठां प्राप्तः सहानुगः ॥८९ ततो व्यतीते कल्पे तु सामान्ये सहसैनिकः । उत्साद्य पार्थिवान्सर्वानम्लेच्छांश्चैव सहस्रशः ॥६० तत्र संध्यांशके काले संप्राप्ते तु युगांतके । स्थितस्वल्पावशिष्टासु प्रजास्विह क्वचित्क्वचित् ॥६१

समस्त प्राणियों के दर्शन में न आने वाला वह सम्पूर्ण वसुन्धरा पर विचरण किया करता था। वह वहाँ पर देव माधव के अंश से जाना गया था ।८५। वह पूर्व जन्म में महान् वीर्य वाला प्रमति के नाम से प्रसिद्ध था। वह प्रभु पूर्व कलियुग में चन्द्रमा के गोत्र से था ।८६। बत्तीसवें वर्ष के अभ्युदित हो जाने पर वह बीस वर्ष तक प्रक्रान्त हुआ था। सभी प्राणियों का और सभी ओर में मानवों का विहनन करते हुए उसने परिभ्रमण किया था ।८७। अकस्मात् परस्पर में समुत्पन्न कोप से उसने क्रूर कर्म से पृथ्वी में बीजावशेष कर दिया था। उसमें जो वृषल थे उनको और प्रायः अधार्मिक

११८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

माषवों का सुसाधित किया था उसने अपने अनुचरों के साथ गंगा और यमुना के मध्य में बड़ी निष्ठा प्राप्त करली थी ।८८-८६। इसके अनन्तर सामान्य कल्प के व्यतीत हो जाने पर अपने सैनिकों के साथ रहकर सभी सहस्रों म्लेच्छों को और राजाओं का उत्पादन कर दिया था ।६०। यहाँ पर युग के अन्त कर लेने वाले सन्ध्या के अंश के सम्प्राप्त होने पर यहाँ पर कहीं-कहीं पर बहुत ही थोड़ी प्रजा अवशिष्ट रह गयी थी ।६१।

अपग्रहास्ततस्ता वै लोभाविष्टास्तु वृंदशः । उपहिंसंति चान्योन्यं पोथयंतः परस्परम् ॥६२ अराजके युगवशात्संसंक्षये समुपस्थिते । प्रजास्ता वै ततः सर्वाः परस्परभयाद्दिताः ॥६३ व्याकुलाश्च परिभ्रांतास्त्यक्त्वा दारान्गृहाणि च । स्वान्प्राणाननपेक्षंतो निष्कारणसुदुःखिताः ॥६४ नष्टे श्रौते स्मृतौ धर्मे परस्परहतास्तदा । निर्मर्यादा निराक्रन्दा निःस्नेहा निरपत्रपाः ॥६५ नष्टे धर्म प्रतिहता ह्रस्वकाः पंचविंशतिम् । हित्वा पुत्रांश्च दारांश्च विषाद्व्याकुलेंद्रियाः ॥६६ अनावृष्टिहताश्चैव वार्त्तामुत्सृज्य दुःखिताः । प्रत्यंतांस्ता निषेवंते हित्वा जनपदान्स्वकान् ॥६७ सरितः सागरानूपान्सेवंते पर्वतांस्तथा । मांसेर्मूलफलैश्चैव वर्तयंतः सुदुःखिताः ॥६८

वे अप ग्रहण करने वाले तथा झुण्ड के झुण्ड लोभ में आविष्ट हुए परस्पर में एक दूसरे का पोथन करते हुए उपहनन किया करते हैं ।६२। जब कोई भी समुचित शासन करने वाला नहीं था और सर्वत्र अराजकता फैली हुई थी तथा युग के प्रभाव के कारण सर्वत्र संशय प्राप्त हो गया था । फिर वह सभी प्रजा आपस में भय से उत्पीड़ित हो गये थे ।६३। वे सब बहुत व्याकुल हो गये थे और अपनी पत्नियों तथा गृहों को भी छोड़कर इधर-उधर परिभ्रमण कर रहे थे । बिना ही किसी कारण के बहुत अधिक दुःखित होकर अपने प्राणों की अपेक्षा नहीं करने वाले हो गये थे ।६४। श्रौत

चतुर्युगाख्यानवर्णनम् ] [ ११६

और स्मार्त्त धर्म के विनष्ट हो जाने पर वे उस समय में हत हो रहे थे । उन्होंने अपनी मर्यादा का त्याग कर दिया था और वे निराक्रन्द हो गये थे उनमें किसी के प्रति भी स्नेह नहीं था तथा वे लज्जाहीन हो गये थे ।६५। धर्म के विनष्ट हो जाने पर वे छोटे पच्चीस वर्ष में ही प्रतिहत हो जाते हैं । वे अपने पुत्रों को-पत्नियों को छोड़कर विवाद से व्याकुलित इन्द्रियों वाले हो जाते हैं ।६६। वर्षा न होने के कारण बहुत हत हो जाया करते हैं और वार्त्ता को त्याग कर परम दुःखित होते हैं । वे सब प्रजानन अपने जनपदों को त्याग कर प्रत्यन्तों का सेवन किया करते हैं ।६७। कुछ लोग नदियों का—सागरों का—अनूपों का और पर्वतों का सेवन किया करते हैं और परम दुःखित होते हुए अपनी उदरपूर्ति मांस और मूलों के द्वारा किया करते हैं ।६८।

चीरपत्राजिनधरा निष्क्रिया निष्परिग्रहाः ।
वर्णाश्रमपरिभ्रष्टाः संकरं घोरमास्थिताः ।
एतां काष्ठामनुप्राप्ता अल्पशेषाः प्रजास्ततः ॥६६
जराव्याधिक्षुधाविष्टा दुःखान्निर्वेदमागमन् ।
विचारणा तु निर्वेदात्साम्यावस्था विचारणात् ॥१००
साम्यावस्थात्मको बोधः संबोधाद्धर्मशीलता ।
तासूपशमयुक्तासु कलिंशिष्टासु वै स्वयम् ॥१०१
अहोरात्रं तदा तासां युगान्ते परिवर्त्तनि ।
चित्तसंमोहनं कृत्वा तासां वै सुप्तमत्तवत् ॥१०१
भाविनोऽर्थस्य च बलात्ततः कृतमवर्त्तत ।
प्रवृत्ते तु ततस्तस्मिन्पूते कृतयुगे तु वै ॥१०३
उत्पन्नाः कलिंशिष्टासु प्रजाः कार्त्तयुगास्तदा ।
तिष्ठंति चेह ये सिद्धा अदृष्टा विचरंति च ।४१०४
सह सप्तर्षिभिश्चैव तत्र ते च व्यवस्थिताः ।
ब्रह्मक्षत्रविशः शूद्रा बीजार्थं ये स्मृता इह ॥१०५

वस्त्रों के अभाव में सब लोग चीर, पत्र और चर्म को धारण करने वाले हैं । उनके पास कोई भी काम नहीं है अर्थात् एकदम कर्म शून्य है

१२० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

और न उनके पास कुछ समान है। वर्णों और आश्रमों से परिभ्रष्ट हैं अर्थात् न उनका कोई वर्ण है और न कोई आश्रम ही रहा गया है। वे सब परम घोर सङ्कर में समास्थित है। बहुत ही थोड़े से बचे ने प्रजाजन फिर इस दिशा में आकर प्राप्त हुए हैं ।९९। वे बुढ़ापे और व्याधियों तथा भूख से समाविष्ट हैं और परमाधिक दुःख से निर्वेद को प्राप्त हो गये हैं। निर्वेद से उनको विचारणा उत्पन्न हुई और विचारणा से वे साम्य की अवस्था को प्राप्त हो गये हैं ।१००। साम्यावस्था के स्वरूप वाला उनको बोध हो गया था और उस भले ज्ञान से धर्म का स्वभाव हो गया था। कलि में शिष्ट वे स्वयं उपशम से अवस्था में प्राप्त हो गये थे ।१०१। उस समय मैं उनके अहो- रात्र (रात दिन) युगान्त के परिवत्तित होने पर उनके चित्त का संमोहन हो गया था और वे सब एक सोये हुए तथा प्रमत्त व्यक्ति के समान ही हो गये थे ।१०२। यह सब आगे होने वाले अर्थ के ही कारण से बलात् हुआ था। इसके अनन्तर कृतयुग हुआ था। फिर उस परम पूत कृतयुग के प्रवृत्त हो जाने पर उस समय में जो कलियुग में अवशिष्ट प्रजाएँ थीं उनमें सत्युग में होने वाली प्रजा ने जन्म ग्रहण किया था। जहाँ पर जो भी सिद्ध स्थित रहते हैं वे बिना किसी के द्वारा देखे गुप्त स्वरूप से विचरण किया करते हैं। वहाँ पर वे सप्तर्षियों के साथ व्यवस्थित हैं। यहाँ पर जो बीज के लिये ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य और शूद्र कहे गये हैं ।१०३-१०४-१०५।

कलिजैः सह ते संति निर्विशेषास्तदाभवन् ।
तेषां सप्तर्षयो धर्मं कथयंतीतरेषु च ॥१०६
वर्णाश्रमाचारयुक्तः श्रौतः स्मार्त्तो द्विधा तु सः ।
ततस्तेषु क्रियावत्सु वर्तंते वै प्रजाः कृते ॥१०७
श्रौतस्मार्त्ते कृतानां च धर्मे सप्तर्षिदर्शिते ।
केचिद्धर्मव्यवस्थार्थं तिष्ठंतीहायुगक्षयात् ॥१०८
मन्वंतराधिकारेषु तिष्ठंति मुनयस्तु वै ।
यथा दावप्रदग्धेषु तृणेष्विह तपेन तु ॥१०६
वनानां प्रथमं वृष्ट्या तेषां मूलेषु संभवः ।
तथा कार्तयुगानां तु कलिजेष्विह संभवः ॥११०
एवं युगो युगस्येह संतानस्तु परस्परम् ।

चतुर्युगाख्यानवर्णनम् ] [ १२१

वर्त्तंते ह्यव्यवच्छेदाद्यावन्मन्वंतरक्षयः ॥१११ सुखमायुर्बलं रूपं धर्मोऽर्थः काम एव च । युगेष्वेतानि हीयंते त्रित्रिपादाः क्रमेण च ॥११२

वे सब कलियुग में समुत्पन्न हुओं के साथ ही हैं और उस समय में विशेषता से रहित ही हैं। उनके इतरों में यहाँ पर सप्तर्षिगण धर्म को कहते हैं ।१०६। वह धर्म वर्णों और आश्रमों से आचार से युक्त वैदिक तथा स्मृतियों के द्वारा प्रतिपादित दो प्रकार का है । इसके अनन्तर कृतयुग में उन क्रियाशीलों में निश्चय ही प्रजा होती है ।१०७। कृतयुग के मनुष्यों का सप्तर्षियों के द्वारा प्रदर्शित श्रौत और स्मार्त्त धर्म हैं। यहाँ पर कुछ लोग धर्म की व्यवस्था के लिए युगक्षय से स्थित रहते हैं ।१०८। मन्वन्तर के अधिकारों मुनिगण स्थित रहा करते हैं जिस प्रकार से ताप दावाग्नि के द्वारा प्रदग्ध तृणों में रहते हैं ।१०६। प्रथम वृष्टि से उन वनों के भूतों में समुत्पत्ति होती है । ठीक उसी भाँति कलियुग में समुत्पन्न व्यक्तियों से कृतयुग के व्यक्तियों की उत्पत्ति होती है ।११०। इसी रीति से यहाँ पर युग की ही सन्तान परस्पर में युग हुआ करता है । जब तक वर्तमान मन्वन्तर का क्षय होता है तब तक बिना किसी व्यवच्छेद के इसी प्रकार से युग से दूसरे युग की समुत्पत्ति हुआ करती है ।१११। निम्न सब बातें सुख-आयु-बल रूप-धर्म-अर्थ और काम ये सभी क्रम से युगों में तीन-तीन पाद क्षीण हुआ करते हैं ।११२।

ससंध्यांशेषु हीयंते युगानां धर्मसिद्धयः । इत्येष प्रतिसंधिर्यः कीर्त्तितस्तु मया द्विजाः ॥११३ चतुर्युगानां सर्वेषामेतेनैव प्रसाधनम् । एषा चतुर्युगावृत्तिरासहस्राद्गुणीकृता ॥११४ ब्रह्मणस्तदहः प्रोक्तं रात्रिश्चैतावती स्मृता । अत्रार्जवं जडीभावो भूतानामायुगक्षयात् ॥११५ एतदेव तु सर्वेषां युगानां लक्षणं स्मृतम् । एषा चतुर्युगानां च गुणिता ह्येकसप्ततिः ॥११६ क्रमेण परिवृत्ता तु मनोरंतरमुच्यते ।

१२२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

चतुर्युगे यथैकस्मिन्भवन्तीह यथा तु यत् ।।११७ तथा चान्येषु भवति पुनस्तद्वद्यथाक्रमम् । सर्गे सर्गे तथा भेदा उत्पद्यंते तथैव तु ।।११८ पंचत्रिंशत्परिमिता न न्यूना नाधिकाः स्मृताः । कथा कल्पा युगैः सार्द्धं भवंति सह लक्षणैः । मन्वंतराणां सर्वेषामेतदेव तु लक्षणम् ।।११९

सन्ध्यांशों में युगों की धर्म सिद्धियों का ह्रास हुआ करता है । इस प्रकार से यह जो प्रति सन्धि है । हे द्विजो ! मैंने कीर्त्तित कर दी हैं ।११३। इसी से चारों युगों का सबका प्रसाधन है। यह चारों युगोंकी आवृत्ति सहस्र से लेकर गुणीकृत है ।११४। यह ब्रह्मा का दिन कहा गया है । जितना बड़ा दिन होता है उतनी ब्रह्माजी की रात्रि हुआ करती है । यहाँ पर युग क्षय से लेकर भूतों का जो सोधापन है वह जड़ी मान होता है ।११५। यही ही समस्त युगों का लक्षण कहा गया है । यह चारों युगों की चौकड़ी अब इकहत्तर हो जाया करती ।११६। जब क्रम से यह चौकड़ियां इकहत्तर समाप्त होकर दूसरी बदलती हैं तभी दूसरे मनु का अन्तर हुआ करता है । चारों युगों की चौकड़ी में किस प्रकार से यहाँ होती है उसी प्रकार से यह होता है ।११७। उसी भाँति अन्यों में होता है और फिर उसी के समान यथा क्रम से हुआ करता है । उसी प्रकार से प्रत्येक सर्ग में भेद उत्पन्न हुआ करते हैं ।११८। ये पैंतीस परिमित ही हैं और न इनसे कम हैं और न अधिक होते हैं ऐसा ही बताया गया है । उसी रीति से कल्प युगों के साथ लक्षणों के होते हैं । समस्त मन्वन्तर का यह ही लक्षण होता है ।११९।

यथा युगानां परिवर्त्तनानि चिरप्रवृत्तानि युगस्वभावात् । तथा न संतिष्ठति जीवलोकः क्षयोदयाभ्यां परिवर्त्तमानः ।।१२० इत्येतल्लक्षणं प्रोक्तं युगानां वै समासतः ।।१२१ अतीतानागतानां हि सर्वमन्वंतरेष्विह । मन्वंतरेण चैकेन सर्वाण्येवांतराणि वै ।।१२२ ख्यातानीह विजानीध्वं कल्प कल्पेन चैव ह । अनागतेषु तद्वच्च तर्कः कार्यो विजानता ।।१२३

परशुराम का संवाद ] [ १२३

मन्वंतरेषु सर्वेषु अतीतानागतेष्विह । तुल्याभिमानिनः सर्वे नामरूपैर्भवंत्युत ॥१२४॥ देवा ह्यष्टविधा ये वा इह मन्वंतरेश्वराः । ऋषयो मनवश्चैव सर्वे तुल्याः प्रयोजनैः ॥१२५॥ एवं वर्णाश्रमाणां तु प्रविभागं पुरा युगे । युगस्वभावांश्च तथा विधत्ते वै सदा प्रभुः ॥१२६॥ वर्णाश्रमविभागाश्च युगानि युगसिद्धयः । अनुषंगात्समाख्याताः सृष्टिसर्गं निबोधत । विस्तरेणानुपूर्व्या च स्थितिं वक्ष्ये युगेष्विह ॥१२७॥

जिस तरह से युगों के परिवर्त्तन युगों के स्वभाव से चिरप्रवृत्त होते हैं उस प्रकार से क्षय और उदय से परिवर्त्तमान जीव लोक भली भांति स्थित नहीं रहता है ।१२०। बहुत ही संक्षेप के साथ यह इतना ही युगों का लक्षण बताया गया है ।१२१। यहाँ पर मन्वन्तरों में जो बीत चुके हैं तथा जो अनागत हैं उनका सब यही है और एक मन्वन्तर के द्वारा ही समस्त अन्तर होते हैं ।१२२। कल्प से कल्प जो होता है वे सब विख्यात हैं उनको जान लो । जो अभी तक नहीं आये हैं उनमें ज्ञान पुरुष के द्वारा उसी प्रकार से तर्क कर लेना चाहिए ।१२३। समस्त मन्वन्तरों में व्यतीत हो गये हैं और जो अनागत हैं उनमें यहाँ पर नाम और रूपों से सब तुल्य अभिमान वाले हैं ।१२४। जो आठ प्रकार के देवगण हैं अथवा यहाँ पर मन्वन्तरेश्वर हैं । ऋषिगण और मनुगण सब प्रयोजनों से तुल्य हैं ।१२५। इस तरह से पहिले युग में वर्णों और आश्रमों के प्रकृष्ट विभाग को और युगों के स्वभावों को सदा प्रभु किया करते हैं ।१२६। वर्णाश्रमों के विभाग युग और युगों की सिद्धियां अनुषंग से यह कह दिये गये हैं । अब सृष्टि के सर्ग को समझ लो । यहाँ पर युगों में विस्तार के साथ और आनुपूर्वी से अर्थात् आरम्भ से अन्त तक क्रम में से स्थिति का वर्णन करूँगा ।१२७।

—X—

॥ परशुराम का संवाद ॥

वसिष्ठ उवाच—इत्थं प्रवर्त्तमानस्य जमदग्नेर्महात्मनः । वर्षाणि कतिचिद्राजन्यतीयुरमितौजसः ॥१॥

१२४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

रामोऽपि नृपशार्दूल सर्वधर्मभृतां वरः । वेदवेदांगतत्त्वज्ञः सर्वशास्त्रविशारदः ॥२॥ पित्रोश्चकार शुश्रूषां विनीतात्मा महामतिः । प्रीतिं च निजचेष्टाभिरन्वहं पर्यवर्त्तयत् ॥३॥ इत्थं प्रवर्त्तमानस्य वर्षाणि कतिचिन्नृप । पित्रोः शुश्रूषयानैषीद्रामो मतिमतां वरः ॥४॥ स कदाचिन्महातेजाः पितामहगृहं प्रति । गन्तुं व्यवसितो राजन्दैवेन च नियोजितः ॥५॥ निपीड्य शिरसा पित्रोश्चरणौ भृगुपुंगवः । उवाच प्रांजलिर्भूत्वा सप्रश्रयमिदं वचः ॥६॥ कंचिदर्थमहं तात मातरं त्वां च साम्प्रतम् । विज्ञापयितुमिच्छामि मम तच्छ्रोतुमर्हथः ॥७॥

श्री वसिष्ठजी ने कहा—हे राजन् ! अमित ओज से समन्वित महान् आत्मा वाले जमदग्नि के इस प्रकार से प्रवृत्तमान होते हुए कुछ वर्ष व्यतीत हो गये थे ।१। हे नृपशार्दूल । समस्त धर्मों के धारण करने वालों में परम-श्रेष्ठ राम भी वेदांग के तत्वों के ज्ञाता और सब शास्त्रों के विशारद थे ।२। महान् मति से समन्वित और विनीत आत्मा वाले उनने अपने माता-पिता की शुश्रूषा की थी और निज की चेष्टाओं से प्रतिदिन प्रीति को बढ़ा दिया था ।३। बुद्धिमानों में परम श्रेष्ठ राम ने हे नृप ! माता-पिता की शुश्रूषा के द्वारा इस तरहसे प्रवृत्त जान होते हुए कुछ वर्ष बिता दिये थे ।४। हे राजन् ! किसी समय में महान् तेज वाले पितामह ने उस परम गृह की ओर गमन करने का निश्चय देव के द्वारा नियोजित होते हुए किया था ।५। भृगु पुंगव ने माता-पिता के चरणों में अपना शिर रखकर अपने दोनों हाथ जोड़ते हुए नम्रता पूर्वक यह वचन बोले थे ।६। हे तात ! इस समय में आपके और माता के समक्ष में कुछ अर्थ विज्ञापित करने की अभिलाषा रखता हूँ । आप मेरी उस अभिलाषित को श्रवण करने के योग्य होते हैं ।७।

पितामहमहं द्रष्टुमुत्कंठितमनाश्चिरम् । तस्मात्तत्पार्श्वमधुना गमिष्ये वामनुज्ञया ॥८॥ आहूतश्चासकृत्तात सोत्कंठं प्रीयमाणया ।

परशुराम का संवाद ] [ १२५

पितामह्या बहुमुखैरिच्छन्त्या मम दर्शनम् ॥६॥ पितॄन्पितामहस्यापि प्रियमेव प्रदर्शनम् । मदीयं तेन तत्पार्श्वं गन्तुं मामनुजानत ॥१०॥ वसिष्ठ उवाच-इति तस्य वचः श्रुत्वा संभ्रांतं समुदीरितम् । हर्षेण महता युक्तौ साश्रुनेत्रौ बभूवतुः ॥११॥ तमालिङ्ग्य महाभागं मूर्ध्न्युपाघ्राय सादरम् । अभिनन्द्याशिषा तात ह्युभौ ताविदमाहतुः ॥१२॥ पितामहगृहं तात प्रयाहि त्वं यथासुखम् । पितामहपितामह्योः प्रीतये दर्शनाय च ॥१३॥ तत्र गत्वा यथान्यायं तं शुश्रूषापरायणः । कंचित्कालं तयोर्वत्स प्रीतये वस तद्गृहे ॥१४॥

मैं अधिक समय से पितामह के दर्शन करने के लिए उत्कण्ठित मन वाला हो रहा हूँ। इस कारण से आप दोनों की आज्ञा से इस समय में उनके समीप में गमन करूंगा ।८। हे तात ! बड़े प्रसन्न मन वाली पितामही के द्वारा मैं कितनी ही बार बुलाया गया हूँ और उनके हृदय में मुझमें मिलने की अधिक उत्कण्ठा है । बहुत लोगों के द्वारा उन्होंने यह कहलाया है कि वे मुझे देखने की अधिक इच्छा करती है ।६। मेरा मिलना पितृगण और पितामह जो भी प्रिय है। इस कारण से उनके समीप में जाने की आप मुझे आज्ञा प्रदान कीजिए ।१०। श्री वसिष्ठजी ने कहा—इस प्रकार से उनके इस परम सम्भ्रान्त कहे हुए वचन का श्रवण करके वे दोनों माता-पिता बहुत ही प्रहर्षित हुए थे और उनके नेत्रों में अश्रुओं के कण झलक उठे थे ।११। उन दोनों ने उस महान् भाग वाले पुत्र का आलिंगन किया था और बड़े आदर के साथ उसके मस्तक का उपाघ्राण किया था । आशीर्वाद से उसका अभिनन्दन करके उन दोनों ने उससे कहा था ।१२। हे तात ! पितामह के गृह को तुम सुख पूर्वक जाओ जिससे पितामह और पितामही के दर्शन प्राप्त करोगे ओर उनकी प्रीति भी होगी ।१३। वहाँ पहुँच कर न्यायपूर्वक उनकी शुश्रूषा में तत्पर रहना । कुछ समय तक हे वत्स ! उनकी प्रीति को प्राप्त करने के लिए उनके घर में निवास करो ।१४।

१२६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

स्थित्वा नातिचिरं कालं तयोर्भूयोऽप्यनुज्ञया । अत्रागच्छ महाभाग क्षेमेणास्मद्दिदृक्षया ॥१५ क्षणार्द्धमपि शक्ताः स्थो न विना पुत्रदर्शनम् । तस्मात्पितामहगृहे न चिरात्स्थातुमर्हसि ॥१६ तदाज्ञयाथ वा पुत्र प्रपितामहसन्निधिम् । गतोऽपि शीघ्रमागच्छ क्रमेण तदनुज्ञया ॥१७ वसिष्ठ उवाच-इत्युक्तस्तौ परिक्रम्य प्रणम्य च महामतिः । पितरावप्यनुज्ञाप्य पितामहगृहं ततः ॥१८ स गत्वा भृगुवर्यस्य ऋचीकस्य महात्मनः । प्रविवेशाश्रमं रामो मुनिशिष्योपशोभितम् ॥१६ स्वाध्यायघोषैर्विपुलैः सर्वतः प्रतिनादितम् । प्रशांतवैरसत्त्वाढ्यं सर्वसत्वमनोहरम् ॥२० स प्रविश्याश्रमं रम्यमृचीकं स्थितमासने । ददर्श रामो राजेंद्र स पितामहमग्रतः ॥२१

बहुत समय तक वहाँ स्थित न रहकर फिर उन दोनों की अनुज्ञा से हे महाभाग ! हम लोगों के देखने की इच्छा से कुशलता के साथ यहीं पर आ जाना ।१५। अपने पुत्र के देखने के बिना हम लोग आधे क्षण भी नहीं रह सकते हैं। इसी कारण से आप पितामह के घर में अधिक लम्बे समय तक ठहरने के योग्य नहीं होते हैं ।१६। पितामह के समीप में गये हुए भी हे पुत्र ! उनकी ही आज्ञा प्राप्त कर उनकी अनुज्ञा से क्रम से शीघ्र ही यहाँ पर आ जाओ ।१७। वसिष्ठजी ने कहा—इस प्रकार से जब उससे कहा गया तो वह महान् बुद्धिमान् था । उसने उनको प्रणाम करके परिक्रमा की थी और माता-पिता की आज्ञा पाकर वहाँ से वह पितामह के घर को चल दिया था ।१८। वहाँ पर जाकर उस राम ने महात्मा भृगुवर्य ऋचीक के आश्रम में प्रवेश किया था जो कि अनेक मुनिगण और शिष्यों से उपशोभित था ।१६। वह आश्रम सभी ओर वेदाध्ययन के बहुत बड़े उद्घोष से प्रति-ध्वनित हो रहा था और वहाँ के सभी प्राणियों में सर्वथा वैर भाव नहीं था तथा सभी जीवोंके द्वारा वह अतीव मनोहर था ।२०। उस परशुराम ने परम

परशुराम का संवाद ] [ १२७

सुन्दर आश्रम में प्रवेश करके हे राजेन्द्र ! आसन पर विराजमान ऋचीक का दर्शन किया था और आगे स्थित पितामह को देखा था ।२१।

जाज्वल्यमानं तपसा धिष्ण्यस्थमिव पावकम् ।
उपासितं सत्यवत्या यथा दक्षिणयाऽध्वरम् ॥२२
स्वसमीपमुपायातं राममालोक्य तौ नृप ।
सुचिरं तं विमर्शेतां समाज्ञापूर्वकदर्शनौ ॥२३
कोऽयमेष तपोराशिः सर्वलक्षणपूजितः ।
बालोऽयं बलवान्भाति गांभीर्यात्प्रश्रयेण च ॥२४
एवं तयोश्चिन्तयतोः सहर्षं हृदि कौतुकात् ।
आससाद शनै रामः समीपे विनयान्वितः ॥२५
स्वनामगोत्रे मतिमानुक्त्वा पित्रोर्मुदान्वितः ।
संस्पृशंश्चरणौ मूर्ध्ना हस्ताभ्यां चाभ्यवादयत् ॥२६
ततस्तौ प्रीतमनसौ समुत्थाप्य च सत्तमम् ।
आशीर्भिरभिनन्देतां पृथक् पृथगुभावपि ॥२७
तमाश्लिष्यांकमारोप्य हर्षाश्रुप्लुतलोचनौ ।
वीक्षंतौ तन्मुखांभोजं परं हर्षमवापतुः ॥२८

उनका स्वरूप धिष्ण्यमें स्थित पावकके ही समान तपसे जाज्वल्यमान था। दक्षिणा के द्वारा अध्वर की ही भाँति सत्यवती के द्वारा वे उपासित थे ।२२। हे नृप ! उन दोनों ने अपने समीप में समागत हुए राम को देखा था और समाज्ञा पूर्वक देखने वाले उन दोनों ने उसके विषय में बहुत समय तक मनमें विमर्श किया था।२३। यह तपश्चर्या के राशि के ही सदृश कौन है जो कि सभी लक्षणों से पूजित हैं। है तो यह बालक परन्तु गम्भीरता और विनय से युक्त बहुत बलवान् प्रतीत होता है।२४। उन दोनों के हृदय में बड़ा कुतूहल हो रहा था और वे हर्ष के साथ यही मन में चिन्तन कर रहे थे कि राम परम विनीत भाव से समन्वित होते हुए धीरे से उनके समीप में पहुँच गया था।२५। उस बुद्धिमान् रामने अपने नाम और गोत्र का उच्चारण करके परमानन्दित होते हुए उन दोनों के चरणों का स्पर्श मस्तक के द्वारा किया और दोनों हाथों से उनका अभिवादन किया था।२६। इसके अनन्तर परम प्रीतियुक्त मन वाले उनने उस श्रेष्ठतम को उठा लिया था

१२८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

और दोनों ने अलग-अलग आशीर्वाद के द्वारा उसका अभिनन्दन किया था ।२७। उसको अपने वक्षःस्थल से लगाकर आलिंगन किया था और अपनी गोद में बिठाकर उन दोनों के हृदय में इतना हर्ष हुआ था कि उनके नेत्र अश्रुओं से समाप्लुत हो गये थे । उस राम के मुख कमल को देखते हुए उन दोनों ने बहुत अधिक हर्ष प्राप्त किया था ।२८।

ततः सुखोपविष्टं तमात्मवंशसमुद्वहम् ।
अनामयपृच्छेतां तावुभौ दंपती तदा ॥२९
पितरौ ते कुशलिनौ वत्स किंवातरस्तथा ।
अनायासेन ते वृत्तिर्वर्तते चाथ कर्हिचित् ॥३०
समस्ताभ्यां ततो राजन्नाचचक्षे यथोदितः ।
तथा स्वानुगतं पित्रोर्भ्रातृ णां चैव चेष्टितम् ॥३१
एवं तयोर्महाराज सत्प्रीतिजनितैर्गुणैः ।
प्रीयमाणोऽवसद्रामः पितुः पित्रोर्निवेशने ॥३२
स तस्मिन्सर्वभूतानां मनोनयननन्दनः ।
उवास कतिचिन्मासांस्तच्छुश्रूषापरायणः ॥३३
अथानुज्ञाप्य तौ राजन्भृगुवर्यो महामनाः ।
पितामहगुरोर्गंतुमियेषाश्रयमाश्रमम् ॥३४
स ताभ्यां प्रीतियुक्ताभ्यामाशीर्भिरभिनंदितः ।
यथा चाभ्यां प्रदिष्टेन ययावौर्वाश्रमं प्रति ॥३५

इसके उपरान्त जब वह सुख पूर्वक बैठ गये तो उस आत्मवंश के समुद्वहन करने वाले से उस समय में उन दोनों दम्पति ने क्षेम कुशल पूछा था ।२६। उन्होंने पूछा था कि हे वत्स ! तुम्हारे माता-पिता सकुशल हैं और तुम्हारे सब भाई सानन्द तो हैं । तुम्हारी वृत्ति अनायास से ही कम हो गई हैं ।३०। इसके अनन्तर हे राजन् ! जैसा कहा गया था वह सम्पूर्ण उसने कह दिया था । अपने माता-पिता की अनुगामिता और भाइयों का जो चेष्टित था वह भी कह दिया था ।३१। हे महाराज ! इस तरह से उन दोनों की सम्प्रीति से समुत्पन्न गुणगणों से बहुत ही प्रसन्न राम पिता के, पिता के घर में रहा था ।३२। वह घर में सभी प्राणियों के मन और नेत्रों को आनन्द

परशुराम का संवाद ] [ १२६

देने वाला होगया था । उनकी सुश्रूषा में तत्पर होकर उसने वहाँ पर कुछ मास तक निवास किया था ।३३। हे राजन् ! इसके पश्चात् महान् मन वाले भृगु वर्य ने उन दोनों की आज्ञा प्राप्त करके पितामह के गुरु के निवास स्थल आश्रम में गमन करने की इच्छा की थी ।३४। परम प्रीति से संयुत उन दोनों के द्वारा उसका आशीर्वचनों से अभिनन्दन किया गया था और उन दोनों ने जिस प्रकार में और्याश्रम के प्रति प्रदर्शन कर दिया था ।३५।

तं नमस्कृत्य विधिवच्च्यवनं च महातपाः ।
सप्रहर्षं तदाज्ञातः प्रययावाश्रमं भृगोः ॥३६
स गत्वा मुनिमुख्यस्य भृगोराश्रममंडलम् ।
ददर्श शांतचेतोभिर्मुनिभिः सर्वतो वृतम् ॥३७
सुस्निग्धशीतलच्छायैः सर्वर्तुकगुणान्वितैः ।
तरुभिः संवृतं प्रीतः फलपुष्पोत्तरान्वितैः ॥३८
नानाखगकुलारावैर्मनः श्रोत्रसुखावहः ।
ब्रह्मघोषैश्च विविधैः सर्वतः प्रतिनादितम् ॥३९
समंत्राहुतिहोमोत्थधूमगंधेन सर्वतः ।
निरस्तनिखिलाघौघं वनांतरविसर्पिणा ॥४०
समित्कुशाहरैर्दण्डमेखलाजिनमंडितैः ।
अभितः शोभितं राजन्म्यैर्मु निकुमारकैः ॥४१
प्रसूनजलसंपूर्णपात्रहस्ताभिरंतरा ।
शोभितं मुनिकन्याभिश्चरंतीभिरितस्ततः ॥४२

उस महान् तपस्वी ने विधिपूर्वक च्यवन की सेवा में प्रणाम किया था और बड़े हर्षपूर्वक उनसे आज्ञा प्राप्त कर वह राम भृगु के आश्रम की ओर रवाना हो गया था ।३५। वह समस्त मुनिगणों में मुख्य भृगु के आश्रम मण्डल में जाकर देखा था कि वह आश्रम परम शान्त चित्त वाले मुनियों से सभी ओर घिरा हुआ है ।३७। अतीव घनी और शीतल छाया वाले और सभी ऋतुओं के गुणों से समन्वित तथा प्रीतिदायक फलों और पुष्पों से युक्त तरुवरों से वह आश्रम संयुत था ।३८। विविध अकार के पक्षियों की ध्वनियां पर हो रही थी जो मन और कानों को परम सुख प्रदान करने वाली थीं।

१३० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

वेद मन्त्रों के समुच्चारण के घोष से वह आश्रम सभी ओर से प्रतिध्वनित हो रहा था ।३६। मन्त्रोच्चारण पूर्वक दी हुई आहुतियों के द्वारा जो होम किया जाता है उसका अन्य वनों में फैलने वाले गन्ध से जो सभी ओर है उससे समस्त पापों का समूह जिससे निरस्त हो गया है ऐसा वह आश्रम है ।४०। हे राजन् ! समिधाओं और कुशाओं के आहरण करने वाले तथा दण्ड, मेखला और मृगछालाओं से विभूषित, परम सुन्दर मुनियों के कुमारों से सायने वह आश्रम शोभा युक्त है ।४१। बीच में इधर-उधर हाथों में पुष्प और जल लिए हुए सञ्चरण करने वाली कन्याओं से वह आश्रम उपशोभित है ।४२।

सपोतहरिणीयूथैर्विस्त्रंभादविशंकिभिः ।
उटजांगणपर्यन्ततरुच्छायास्नधिष्ठितम् ।।४३
रोमंकतः परामृष्टियूथसाक्षिकमुत्प्रदैः ।
प्रारब्धतांडवं केकीमयूरैर्मधुरस्वरैः ।।४४
प्रविकीर्णकणोद्देशं मृगशब्दैः समीपगैः समीपर्गैः ।
अनालीढातपच्छायाशुष्यन्नीवारराशिभिः ।।४५
हूयमानानलं काले पूज्यमानातिथिप्रजम् ।
अभ्यस्यमानच्छंदौघं चित्यमानागमोदितम् ।।४६
पठ्यमानाखिलस्मार्त्त श्रौतार्थप्रविचारणम् ।
प्रारब्धपितृदेवेज्यं सर्वभूतमनोहरम् ।।४७
तपस्विजनभूयिष्ठमकापुरुषसेवितम् ।
तपोवृद्धिकरं पुण्यं सर्वसत्त्वसुखास्पदम् ।।४८
तपोधनानन्दकरं ब्रह्मलोकमिवापरम् ।
प्रसूनसौरभभ्राम्यन्मधुव्रतावनादितम् ।।४९

अहिंसा के पूर्ण विश्वास से शङ्का से रहित अपने छोटे-छोटे बच्चों के सहित हरिणियों के झुण्ड जिससे मुनियों कुटियों के आँगन में लगे हुए वृक्षों की छाया में बैठे हुए हैं ।४३। रोमन्थ से परामृष्टि यूथ के साक्षिक आनन्द के प्रदान करने वाले तथा मधुर स्वर से समन्वित वाणी बोलने वाले मयूरों का नृत्य जिस आश्रम में प्रारम्भ होगया है ।४४। समीप में गमन

परशुराम का संवाद ] [ १३१

करने वाले मृगों के शब्दों से जहाँ पर कण फैले हुए हैं तथा अनालीढ आतप की छाया में नीवारों की राशि जहाँ पर सूख रही है ऐसा वह सुरम्य आश्रम आश्रय है ॥४५॥ जिस आश्रम में समय पर अग्नि में आहुतियाँ दी जाती हैं और जहाँ पर अतिथियों के समुदाय का अर्चन एवं सत्कार किया जाया करता है । जिस आश्रम में भेदों के छन्दों का अभ्यास किया जाता है तथा जो कुछ भी शास्त्रों में कहा गया है उसका चिन्तन किया जाता है ॥४६॥ पढ़े जाने वाले सम्पूर्ण स्मृति प्रतिपादित तथा वैदिक अर्थ का विचार किया जाता है । जिसमें देवों और पितृगणों का यजन प्रारम्भ कर दिया गया है तथा जो आश्रम सभी प्राणियों के लिए परम सुन्दर है ॥४७॥ जिस परम सुरम्य आश्रम में बहुत से तपस्वी गण विद्यमान हैं और जो कापुरुष नहीं हैं उन्हीं के द्वारा सेवित है यह तपश्चर्या की वृद्धि करने वाला—परम पुण्यमय और सभी जीवों के सुखों का स्थल है ॥४८॥ जिनका एकमात्र तप ही धन है उन तापसों के आनन्द का यह आश्रय देने वाला है और यह ऐसा दिखलाई देता है मानो यह दूसरा ब्रह्मलोक ही हो । पुष्पों की सुगन्ध से भ्रमण करते हुए भ्रमरों की गुञ्जार से यह आश्रम गुञ्जित है ॥४६॥

सर्वंतो वीज्यमानेन विविधेन नभस्वता । एवंविधगुणोपेतं पश्यन्नाश्रममुत्तमम् ॥५० प्रविवेश विनीतात्मा सुकृतीवामरालयम् । संप्रविश्याश्रमोपांतं रामः स्वप्रपितामहम् ॥५१ ददर्श परितो राजन्मुनिशिष्यशतावृत्तम् । व्याख्यानवेदिकामध्ये निर्विष्टं कुशविष्टरे । सितश्मश्रु जटाकूर्चब्रह्मसूत्रोपशोभितम् ॥५२ वामेतरोरुमध्यास्त वामजंघेन जानुना ॥५३ योगपट्टेन संवीतास्वदेहम् विपुंगवम् । व्याख्यानमुद्राविलसत्सव्यपाणितलांबुजम् ॥५४ योगपट्टोपरिन्यस्तविभ्राजद्वामपाणिकम् । सम्यगारण्यवाक्यानां सूक्ष्मतत्त्वार्थसंहतिम् ॥५५ विवृत्य मुनिमुख्येभ्यः श्रावयंतं तपोनिधिम् । पितुः पितामहं दृष्ट्वा रामस्तस्य महात्मनः ॥५६

१३२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

सभी ओर विविध प्रकार की वायु से यह वीज्यमान है अर्थात् जहां पर नाना भाँति की वायु सर्वत्र वहन किया करती है । इस रीति से अनेक प्रकार के गुणों से यह आश्रम समन्वित है । ऐसे आश्रम को जो बहुत ही उत्तम है उस राम ने देखा था ॥५०॥ जिस तरह कोई सुकृत करने वाला पुरुष स्वर्ग में प्रवेश किया करता है उसी तरह से परम विनीत उस राम ने वहाँ पर आश्रम में प्रवेश किया था । उस आश्रम के उपान्त में प्रवेश करके राम ने अपने प्रपितामह का दर्शन प्राप्त किया था ॥५१॥ हे राजन् ! वे प्रपितामह सैकड़ों ही मुनियों और शिष्यों से चारों ओर घिरे हुए थे । वे व्याख्यान करने की जो वेदिका थी उसके मध्य में एक कुशा के आसन पर विराजमान थे । उनके श्मश्रु-जटा और कूर्च (दाढ़ी) एकदम सफेद थे तथा ब्रह्मसूत्र से उपशोभित थे ॥५२॥ वामजंघा और जानु से दक्षिण ऊरु से वे अध्यस्त थे ॥५३॥ योग पट्ट से संवीत अपने देह वाले वे ऋषियों में परम श्रेष्ठ थे तथा व्याख्यान करने की मुद्रा से शोभित सव्य करकमल वाले थे ॥५४॥ योग पट्ट के ऊपर रक्खे हुए परम शोभित वाम कर वाले और भली भाँति आरण्यक उपनिषद् के वाक्यों के सूक्ष्म तत्व के अर्थ की संहृति का विशेष विवरण कर रहे थे ॥५५॥ और उनका विवरण करके वे तपोनिधि मुख्य मुनियों को श्रवण करा रहे थे । राम ने पितामह का दर्शन किया था ॥५६॥

शनैरिव महाराजसमीपं समुपागमत् ।
तमागतमुपालक्ष्य तत्प्रभावप्रधर्षिताः ॥५७
शंकामवापुर्मुनयो दूहादेवाखिलं नृप ।
तावद्भृगुरमेयात्मा तदागमनतोषितः ॥५८
निवृत्तान्यकथालापस्तं पश्यन्नास पार्थिव ।
रामोऽपि तमुपागम्य विनयावनताननः ॥५९
अवंदत यथान्यायमुपेन्द्र इव वेधसम् ।
अभिवाद्य यथान्यायं ख्यातिं च विनयान्वितः ॥६०
तांश्च संभावयामास मुनीन्द्रामो यथावयः ।
तैश्च सर्वैर्मुदोपेतैराशीर्भिरभिवर्द्धितः ॥६१
उपाविवेश मेधावी भूमौ तेषामनुज्ञया ।
उपविष्टं ततो राममाशीर्भिरभिनंदितम् ॥६२

परशुराम का संवाद ] [ १३३

पप्रच्छ कुशलं प्रश्नं तमालोक्य भृगुस्तदा ।
कुशलं खलु ते वत्स पित्रोश्च किमनामयम् ॥६३

हे महाराज ! फिर वह राम उन महान् आत्मा वाले के समीप में धीरे से प्राप्त हुआ था। उसको समागत हुआ देखकर वहाँ पर जो भी स्थित थे वे सभी राम के प्रबल प्रभाव से धर्षित हो गये थे ।५७। हे नृप ! समस्त मुनिगण दूर से ही शङ्का को प्राप्त हो गये थे तब तक अमेय आत्मा वाले भृगु उसके आगमन से तोषित हुए थे ।५८। हे पार्थिव ! उसको देखते हुए ही अन्य कथा की बात चीत को उन्होंने बन्द कर दिया था। राम भी उनके समीप में पहुँचकर विनय से विनम्र मुख कमल वाला हो गया था ।५६। जिस प्रकार से उपेन्द्र ब्रह्माजी की वन्दना किया करते हैं ठीक उसी तरह से न्याय पूर्वक राम ने उनकी वन्दना की थी। विनम्रता समन्वित राम ने न्याय पूर्वक सबका अभिवादन किया था ।६०। राम ने समस्त मुनियों को अवस्था के अनुसार क्रम से सम्भावित किया था। और उन सब मुनियों ने भी आनन्द से समन्वित होकर आशीर्वादों के द्वारा उस रामको परिवर्धित किया था ।६१। वह परम मेधा से सुसम्पन्न राम भी उन सबकी अनुज्ञा से भूमि पर समीप में बैठ गया था। फिर जब बैठ गया तो सबने राम को आशीर्वचनों से अभिनन्दित किया था ।६२। उस समय में भृगु ने उस राम का अवलोकन करके उससे कुशल प्रश्न पूछा था कि हे वत्स ! तुम्हारा कुशल तो है और तुम्हारे माता-पिता-पिता का स्वास्थ्य सुखमय है ।६३।

भ्रातॄणां चैव भवतः पितुः पित्रोस्तथैव च ।
किमर्थमागतोऽत्र त्वमधुना मम सन्निधिम् ॥६४
केनापि वा त्वमादिष्टः स्वयमेवाथवागतः ।
ततो रामो यथान्यायं तस्मै सर्वमशेषतः ॥६५
कथयामास यत्पृष्टं तदा तेन महात्मना ।
पितुर्मातुश्च वृत्तांतं भ्रातॄणां च महात्मनाम् ॥६६
पितुः पित्रोश्च कौशल्यं दर्शनं च तयोर्नृप ।
एतदन्यच्च सकलं भृगोः सप्रश्रयं मुदा ॥६७
न्यवेदयद्यथान्यायमात्मनश्च समीहितम् ।
श्रुत्वैतदखिलं राजन्‌रामेण समुदीरितम् ॥६८

१३४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

तं च दृष्ट्वा विशेषेण भृगुः प्रीतोऽभ्यनन्दत । एवं तस्य प्रियं कुर्वन्नुत्कृष्टैरात्मकर्मभिः ॥६९॥ तत्राश्रमेऽवसद्रामो दिनानि कतिचिन्नृप । ततः कदाचिदेकांते रामं मुनिवरोत्तमः ॥७०॥

तुम्हारे भाइयों का आपके पिता के माता-पिता का कुशल-मङ्गल तो है ? इस समय में तुम किस प्रयोजन के लिए यहाँ पर मेरे समीप में समागत हुए हो ? ।६४। क्या किसी ने तुम को यहाँ आने की आज्ञा दी है अथवा तुम स्वयं अपनी ही इच्छा से यहाँ पर आये ? इसके पश्चात् राम ने उनकी सेवा में न्यायपूर्वक सभी कुछ पूर्णतया निवेदित कर दिया था। उन महात्मा ने उस वक्त जो भी पूछा था वह सब कह दिया था जो भी कुछ पिता-माता का और महान् आत्मा वाले भाइयों का वृत्तान्त था ।६५-६६। हे नृप ! उन दोनों पिता के माता-पिता की कुशलता से दर्शन का होना-यह और आय भृगु का नम्रता के साथ आनन्द से सब बता दिया था। और अपना जो भी कुछ अभीष्ट था उसका निवेदन कर दिया था। हे राजन् ! राम के द्वारा वर्णित यह सब श्रवण करके और विशेष रूप से उसको देखकर भृगु बहुत ही प्रसन्न हुए थे और उसका अभिनन्दन किया था। इस तरह से अतीव उत्कृष्ट अपने कर्मों के द्वारा उसका प्रिय करते हुए राम ने वहाँ निवास किया था। हे नृप ! राम उस आश्रम में कुछ दिन तक रहा था। इसके उपरान्त मुनिवर ने राम को किसी समय में एकान्त में बुलाया था। ।६७-७०।

वत्सागच्छेति तं राजन्नुपाह्वयदुपह्वरे । सोऽभिगम्य तमासीनमभिवाद्य कृतांजलिः ॥७१॥ तस्थौ तत्पुरतो रामः सुप्रीतेनांतरात्मना । आशीर्भिरभिनंद्याथ भृगुस्तं प्रीतमानसः ॥७२॥ प्राह नाधिगताशंकं राममालोक्य सादरम् । शृणु वत्स वचो मह्यं यत्त्वां वक्ष्यामि सांप्रतम् ॥७३॥ हितार्थं सर्वलोकानां तव चास्माकमेव च । गच्छ पुत्र ममादेशाद्धिमवंतं महागिरिम् ॥७४॥

परशुराम का संवाद ] [ १३५

अधुनैवाश्रमादस्मात्तपसे धृतमानसः । तत्र गत्वा महाभाग कृत्वाऽश्रमपदं शुभम् ॥७५ आराध्य महादेवं तपसा नियमेन च । प्रीतिमुत्पाद्य तस्य त्वं भक्त्यानन्यगयाचिरात् ॥७६ श्रेयो महदवाप्नोषि नात्र कार्या विचारणा । तरसा तव भक्त्या च प्रीतो भवति शङ्करः ॥७७

मुनि ने कहा था—हे वत्स ! उपह्वर में आओ । वह रामभी उन मुनि के समीप में जाकर अपने हाथ जोड़कर उनका उसने अभिवादन किया था ।७१। राम परम प्रसन्न आत्मा से उनके आगे स्थित हो गया था और प्रसन्न मन वाले भृगु ने आशीर्वादों के द्वारा अभिनन्दन किया था ।७२। उसने न अधिगत अंश वाले राम को आदर के साथ देखकर कहा था। हे वत्स ! आप मेरा वचन श्रवण करो जो इस समय में मैं आपको कहूँगा ।७३। यह वचन समस्त लोकों के तुम्हारे और हमारे हित के लिये है। हे पुत्र ! मेरे आदेश से अब महान् पर्वत हिमवान् को चले जाओ ।७४। तपश्चर्या करने के लिये अपने मन में निश्चय करके इसी समय इस आश्रम से चले जाओ । हे महाभाग, वहाँ जाकर उस आश्रम के स्थान को शुभ बना दो ।७५। यहाँ पर तपस्या और नियम से महादेवजी की समाराधना करो । चिरकाल तक अनन्य भक्ति से आप उनकी प्रीति का समुत्पादन करो ।७६। इसके करने से आप महान् श्रेय की प्राप्ति करेंगे—इस विषय में लेशमात्र भी सन्देह नहीं करना चाहिए। शीघ्र ही आपकी भक्ति से भगवान् शङ्कर परम प्रसन्न हो जायेंगे ।७७।

करिष्यति च ते सर्वं मनसा यद्यदिच्छसि । तुष्टे तस्मिञ्जगन्नाथे शङ्करे भक्तवत्सले ॥७८ अस्त्रग्राममशेषं त्वं वृणु पुत्र यथेप्सितम् । त्वया हितार्थं देवानां करणीयं सुदुष्करम् ॥७९ विद्यतेऽभ्यधिकं कर्म शस्त्रसाध्यमनेकंशः । तस्मात्त्वं देवदेवेशं समाराधय शङ्करम् ॥८० भक्त्या परमया युक्तस्ततोऽभीष्टमवाप्स्यसि ॥८१