ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त (ब्रह्मगुप्त - शून्य, कुट्टक, बीजगणित एवं सम्पूर्ण २१ अध्याय सान्वय सटीक)

ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त (ब्रह्मगुप्त - शून्य, कुट्टक, बीजगणित एवं सम्पूर्ण २१ अध्याय सान्वय सटीक)
Brahmasphuta Siddhanta of Brahmagupta with Commentary
आचार्य ब्रह्मगुप्त द्वारा
DevanagariHindipublished737 पृष्ठ
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( १३४ ) . रविशशितमस्त्रिवरितं<sup>१</sup> ब्रह्मोक्तं पुण्यमद्भु<sup>३</sup>तं ज्ञात्वा<sup>४</sup> । रविचन्द्रराहु लोकात्<sup>२</sup> प्राप्नोति पुमानीह यशश्च ॥ ६३ ॥ अन्यैरप्यूक्तमिदं<sup>४</sup> योयं सम्यक्<sup>५</sup> ग्रहं विजानाति<sup>१</sup> । याति सद्दरलोकं<sup>२</sup> ग्रहाष्टकज्ञं<sup>३</sup> परं ब्रह्म<sup>४</sup> ॥ ६४ ॥ मध्यमगतिः<sup>४</sup> स्फुटगति<sup>५</sup> स्त्रिप्रश्नश्चन्द्र<sup>६</sup>भास्कर<sup>१</sup> ग्रहणे । उदयास्तमय<sup>२</sup>प्रतिघटिकांमिदोः<sup>३</sup> शृङ्गोन्नतिश्छाये ॥ ६५ ॥
६३. (घ) १. त्वरितं (ग) तमस्त्रिचरितं for (तमस्त्रिवरितं)
३. पुमानिह (च) for (पुमानीह)
(ग) ४. श्रुत्वा for (ज्ञात्वा)
२. लोकान् for (लोकात्)
(च) १. तमसूचरितं for