भारतकोश
ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त (ब्रह्मगुप्त - शून्य, कुट्टक, बीजगणित एवं सम्पूर्ण २१ अध्याय सान्वय सटीक)

ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त (ब्रह्मगुप्त - शून्य, कुट्टक, बीजगणित एवं सम्पूर्ण २१ अध्याय सान्वय सटीक)

Brahmasphuta Siddhanta of Brahmagupta with Commentary

आचार्य ब्रह्मगुप्त द्वारा

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( १४३ ) विषमसमोयोर्यदि द्वौ परिधि¹ किं सूर्य चन्द्रयोर्नोक्तौ² । घटते न कथंचिदियं स्फुटक्रियोदयिकतन्त्रोक्ता ॥ २१ ॥ उत्तरगोले² ग्राह्यं विषुवद्यातो³ यदुक्तमुनायाम्¹ । सममंडलदस्तदसत् क्रान्तिज्यायां यतो भवति ॥ २२ ॥ व्यासाद्धे³न भविभक्ता दृग्गतिजीवा चतुर्गुणा⁴ लब्धम् । लंबननाड्यः¹ पंचदशगुणिंतया त्रिज्यया भक्ताः⁵ ॥ २३ ॥ दृक्क्षेपज्या भुक्तितराहता² ¹ लब्धमवनतिर्भवति । स्फुटयोजनकर्णाभ्यां भूव्यासाद्धे³न च विना स्पष्टे ॥ २४ ॥ आर्यभटेनास्मि¹ मतिलघुनि⁴ किमर्थं महत्कृतं कर्म² । गणिताज्ञानाजाड्यं⁵ ³ विजानयंता⁶ यदि ततः सुतराम् ॥ २५ ॥

२१. (घ) १. परिधी (ग) (च) for (परिधि)