ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त (ब्रह्मगुप्त - शून्य, कुट्टक, बीजगणित एवं सम्पूर्ण २१ अध्याय सान्वय सटीक)

ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त (ब्रह्मगुप्त - शून्य, कुट्टक, बीजगणित एवं सम्पूर्ण २१ अध्याय सान्वय सटीक)
Brahmasphuta Siddhanta of Brahmagupta with Commentary
आचार्य ब्रह्मगुप्त द्वारा
DevanagariHindipublished737 पृष्ठ
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( २४४ ) शून्यविहीनमृणमृणं धनं धनं भवति शून्यमाकाशम् । शोध्ये यदा धनमृणादणं धद्धात्तदश्रेय्यम् ॥ ३३ ॥ प्रत्युत्पन्नः ऋणमृणधनयोर्घाति धनमृणयोर्धनं वधोधनं भवति । शून्यण्योः स्वधनयोः खशून्ययोर्वा वध शून्यम् ॥ ३४ ॥ ३३. (घ) १. दृणं (ग) (च) (ङ) for (दणं) २. धनाद्धा (ग) (ङ) for (धद्धा) ३. क्षेप्यम् (ग) तदा क्षेप्यम् for (तदश्रेय्यम्) (वि०— इसकी क्रमसंख्या ३४ लिखी है) (ग) ४. विहिन for विहीन ५. शोध्यं (च) (ङ) for (शोध्ये) (वि०— इसकी संख्या ३२ है) (च) २. ध्ट्वा for (धद्धा) ३. तदक्षेप्यं for (तदश्रेय्यम्) (वि०— यहां क्रमसंख्या ३४ अंकित है) [L