भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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पृष्ठ 105

८४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ चमसवदविशेषात् ॥ १ । ४ । ८ ॥ ( 'अजा' शब्द वहाँ सांख्यशास्त्रोक्त प्रकृतिका ही वाचक है, यह सिद्ध नहीं होता; क्योकि ) अविशेषात्=किसी प्रकारकी विशेषताका उल्लेख न होनेसे; चमसवत्='चमस'की भाँति ( उसे दूसरे अर्थमे भी लिया जा सकता है ) । व्याख्या—श्वेताश्वतरोपनिषद् ( १ । ९ तथा ४ । ५ ) मे जिस 'अजा' का वर्णन है, उसका नाम चाहे जो रख लिया जाय, परन्तु वास्तवमे वह परब्रह्म- की शक्ति है, और उस ब्रह्मसे भिन्न नहीं है । उक्त उपनिषद्मे यह स्पष्ट लिखा है कि 'जगत्का कारण कौन है ?' इसपर विचार करनेवाले महर्षियोंने ध्यानयोगमें स्थित होकर उस परमदेव परमेश्वरकी स्वरूपभूता अचिन्त्य शक्तिको ही कारण- रूपमे देखा और यह निश्चय किया कि जो परमदेव अकेला ही काल, स्वभाव आदिसे लेकर आत्मातक समस्त तत्त्वोका अधिष्ठान है, जिसके आश्रयसे ही वे सब अपने-अपने स्थानमे कारण बनते है, वही परमात्मा इस जगत्का कारण है ( १ । ३ ) । अतः यह सिद्ध होता है कि वेदमे 'अजा' नामसे जिस प्रकृतिका वर्णन हुआ है, वह भगवान्के अधीन रहनेवाली उन्हींकी अभिन्न-स्वरूपा अचिन्त्य शक्ति है, सांख्यकथित स्वतन्त्र तत्त्वरूप प्रधान या प्रकृति नहीं । इसी बातको स्पष्ट करनेके लिये सूत्रमे कहा गया है कि जिस प्रकार 'चमस' शब्द रूढिसे सोमपानके लिये निर्मित पात्रविशेषका वाचक होनेपर भी बृहदारण्यकोपनिषद् ( २ । २ । ३ ) मे आये हुए 'अर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नः' इत्यादि मन्त्रमे वह 'शिर' के अर्थमे प्रयुक्त हुआ है; उसी प्रकार यहाँ 'अजा' शब्द भगवान्की स्वरूपभूता अनादि अचिन्त्य शक्तिके अर्थमे है, ऐसा माननेमे कोई बाधा नहीं है; क्योंकि यहाँ ऐसा कोई विशेष कारण नहीं दीखता, जिससे 'अजा' शब्दके द्वारा सांख्य- कथित स्वतन्त्र प्रकृतिको ही ग्रहण किया जाय । सम्बन्ध—'अजा' शब्द जिस अर्थमें रूढ़ है, उसको न लेकर यहाँ दूसरा कौन-सा अर्थ लिया गया है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— ज्योतिरुपक्रमा तु तथा ह्यधीयत एके ॥ १ । ४ । ९ ॥ तु=निश्चय ही; ज्योतिरुपक्रमा=यहाँ 'अजा' शब्द तेज आदि त्रिविध तत्त्वोंकी