भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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सूत्र ६-७ ] अध्याय १ ८३ —इस प्रकार इन तीनोके विषयमे नचिकेताका प्रश्न है, और प्रश्नके अनुसार ही यमराजका क्रमशः उत्तर भी है। अग्निविषयक प्रश्नका उत्तर क्रमशः १ । १ । १४ से १९ तकके मन्त्रोमे दिया गया है। जीवविषयक प्रश्नका उत्तर पहले तो १ । २ । १८, १९ मे, फिर २ । २ । ७ मे दिया गया है। परमात्म- विषयक प्रश्नका उत्तर १ । २ । २० से लेकर ग्रन्थकी समाप्तितक दिया गया है। बीच-बीचमे कहीं जीवके स्वरूपका भी वर्णन हुआ है। परन्तु 'प्रधान'के विषयमे न तो कोई प्रश्न है और न उत्तर ही। इससे यह निश्चित होता है कि यहाँ उक्त तीनोके सिवा चौथेका प्रसङ्ग ही नहीं है। सम्बन्ध—जब प्रधानका वाचक 'अव्यक्त' शब्द उस प्रकरणमे पडा है तो उसे दूसरे अर्थमे कैसे लगाया जा सकता है ? इसपर कहते हैं— महद्वच्च ॥ १ । ४ । ७ ॥ महद्वत्='महत्' शब्दकी भाँति; च=इसको भी दूसरे अर्थमे लेना अयुक्त नहीं है। व्याख्या—जिस प्रकार 'महत्' शब्द सांख्य-शास्त्रमे महत्तत्त्वके लिये प्रयुक्त हुआ है, किन्तु कठोपनिषद्मे वही शब्द आत्माके अर्थमे प्रयुक्त है, उसी प्रकार 'अव्यक्त' शब्द भी दूसरे अर्थमे माना जाय तो कोई विरोध नहीं है। महत् शब्दका प्रयोग जीवात्माके अर्थमे इस प्रकार आया है—'बुद्धेरात्मा महान् पर ।' (क० उ० १ । ३ । १०) 'बुद्धिसे महान् आत्मा पर है।' यहाँ इसको बुद्धिसे परे बताया गया है, किन्तु सांख्यमतमे बुद्धि- का ही नाम महत्तत्त्व है। इसलिये यहाँ महत् शब्द जीवात्माका वाचक है। इस प्रकार वेदोमे जगह-जगह 'महत्' शब्दका प्रयोग सांख्यमतके विपरीत देखा जाता है, उसी प्रकार 'अव्यक्त' शब्दका अर्थ भी सांख्यमतसे भिन्न मानना अनुचित नहीं है, प्रत्युत उचित ही है। सम्बन्ध—"इस प्रकरणमे आया हुआ 'अव्यक्त' शब्द यदि दूसरे अर्थमें मान लिया जाय तो भी श्वेताश्वतरोपनिषद्मे 'अजा' शब्दसे अनादि प्रकृतिका वर्णन उपलब्ध होता है। वहाँ उसे श्वेत, लाल और काला—इन तीन वर्णोंवाली कहा गया है। इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि सांख्यशास्त्रोक्त त्रिगुणात्मिका प्रकृतिको ही वेदमे जगत्का कारण माना गया है।' ऐसा संदेह उपस्थित होनेपर कहते हैं—