ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 103, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ें८२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ प्रकरणसे यही सिद्ध होता है कि श्रुतिमे परमात्माको ही जाननेके योग्य कहा गया है तथा उसीको जाननेका फल मृत्युके मुखसे छूटना बताया गया है । यहाँ प्रकृतिका वर्णन नहीं है । सम्बन्ध—कठोपनिषद्मे अग्नि, जीवात्मा तथा परमात्मा—इन तीनका प्रकरण तो है ही; इसी प्रकार चौथे 'प्रधान' तत्त्वका भी प्रकरण मान लिया जाय तो क्या हानि है ? इसपर कहते है — त्रयाणामेव चैवमुपन्यासः प्रश्नश्च ॥ १ । ४ । ६ ॥ त्रयाणाम्=( इस उपनिषद्मे ) तीनका; एव=ही; एवम्=इस प्रकार ज्ञेयरूपसे; उपन्यासः=उल्लेख हुआ है; च=तथा ( इन्हीं तीनोके सम्बन्धमे ); प्रश्नः=प्रश्न भी ( किया गया ) है । व्याख्या—कठोपनिषद्के प्रकरणमे नचिकेताने अग्नि, जीवात्मा और परमात्मा—इन्हीं तीनोंको जाननेके लिये प्रश्न किया है । अग्निविषयक प्रश्न इस प्रकार है—'स त्वमग्निग्ँ स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्रब्रूहि त्वग्ँ श्रद्दधानाय मह्यम् ।' ( क० उ० १ । १ । १३ ) अर्थात् 'हे यमराज ! आप स्वर्गकी प्राप्तिके साधनरूप अग्निको जानते हैं, अतः मुझ श्रद्धालुके लिये वह अग्नि-विद्या भली- भाँति समझाकर कहिये ।' तदनन्तर जीव-विषयक प्रश्न इस प्रकार किया गया है—'येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके । एतद्विद्या- मनुशिष्टस्त्वयाहम् ।' ( क० उ० १ । १ । २० ) अर्थात् “मरे हुए मनुष्यके विषयमे कोई तो कहता है, 'यह रहता है' और कोई कहता है 'नहीं रहता ।' इस प्रकारकी यह शङ्का है, इसका निर्णय मैं आपके द्वारा उपदेश पाकर जानना चाहता हूँ ।” तत्पश्चात् आगे चलकर परमात्माके विषयमे इस प्रकार प्रश्न उपस्थित किया गया है— अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात् कृताकृतात् । अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत् पश्यसि तद् वद ॥ (क०उ० १ । २ । १४) 'जो धर्म और अधर्म दोनोंसे, कार्य-कारणरूप समस्त जगत्से एवं भूत, वर्तमान और भविष्यत्—इन तीन भेदोंवाले कालसे तथा तत्सम्बन्धी समस्त पदार्थोंसे अलग है, ऐसे जिस तत्त्वको आप जानते हैं, उसीका मुझे उपदेश कीजिये ।'