भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

पृष्ठ 102, कुल 417 में से

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[ सूत्र ३-५ ] अध्याय १ ८१ व्याख्या—सांख्यमतावलम्बी प्रकृतिको ज्ञेय मानते हैं। उनका कहना है कि 'गुणपुरुषान्तरज्ञानात् कैवल्यम्' अर्थात् 'गुणमयी प्रकृति और पुरुषका पार्थक्य जान लेनेसे कैवल्य ( मोक्ष ) प्राप्त होता है।' प्रकृतिके स्वरूपको अच्छी तरह जाने बिना उससे पुरुषका पार्थक्य ( भेद ) कैसे ज्ञात होगा, अतः उनके मतमे प्रकृति भी ज्ञेय है। परन्तु वेदमे प्रकृतिको ज्ञेय अथवा उपास्य कहीं नहीं कहा गया है। वहाँ तो एकमात्र परब्रह्म परमेश्वरको ही जाननेयोग्य तथा उपास्य बताया गया है। इससे यही सिद्ध होता है कि वेदोक्त प्रकृति सांख्य- वादियोके माने हुए 'प्रधान' तत्त्वसे भिन्न है। सम्बन्ध—अपने मतकी पुष्टिके लिये सूत्रकार स्वयं ही शङ्का उठाकर उसका समाधान करते हैं— वदतीति चेन्न प्राज्ञो हि प्रकरणात् ॥ १ । ४ । ५ ॥ चेत्=यदि कहो; वदति=( वेद प्रकृतिको भी ज्ञेय ) बताता है; इति न= तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; हि=क्योकि ( वहाँ ज्ञेय तत्त्व ); प्राज्ञः=परमात्मा ही है; प्रकरणात्=प्रकरणसे ( यही बात सिद्ध होती है )। व्याख्या—कठोपनिषद्में जहाँ 'अव्यक्त' की चर्चा आयी है, उस प्रकरणके अन्तमें ( १ । ३ । १५ ) कहा गया है कि— अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथारसं नित्यमगन्धवच्च यत्। अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तन्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते ॥ 'जो शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्धसे रहित, अविनाशी, नित्य, अनादि, अनन्त, महत्‌से परे तथा ध्रुव ( निश्चल ) है, उस तत्त्वको जानकर मनुष्य मृत्युके मुखसे छूट जाता है।' 'इस मन्त्रमे ज्ञेय तत्त्वके जो लक्षण बताये गये हैं, वे सब सांख्योक्त प्रधानमे भी सङ्गत होते हैं; अतः यहाँ प्रधानको ही 'ज्ञेय' बताना सिद्ध होता है।' ऐसी बात यदि कोई कहे तो उसका यह कथन ठीक नहीं है; क्योकि यहाँ परब्रह्म परमेश्वरके स्वरूपका वर्णन है; आगे-पीछे सब जगह उसीको जानने और प्राप्त करने- योग्य बताया गया है। ऊपर जो मन्त्र उद्धृत किया गया है, उसमे बताये हुए सभी लक्षण परमात्मामे ही यथार्थरूपसे सङ्गत होते हैं; अतः उसमे भी परमात्मा- के ही स्वरूपका वर्णन तथा उसे जाननेके फलका प्रतिपादन है। इसलिये इस वे० द० ६—

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