ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 101, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ें८० वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि जब प्रकृतिके अंशको 'अव्यक्त' नामसे स्वीकार कर लिया, तब सांख्यशास्त्रमें कहे हुए प्रधानको स्वीकार करनेमें क्या आपत्ति है ? सांख्यशास्त्र भी तो भूतोंके कारणरूप सूक्ष्म तत्त्वको ही 'प्रधान' या 'प्रकृति' कहता है, इसपर कहते हैं— तदधीनत्वादर्थवत् ॥ १ । ४ । ३ ॥ तदधीनत्वात्=उस परमात्माके अधीन होनेके कारण; अर्थवत्=वह ( शक्तिरूपा प्रकृति ) सार्थक है । व्याख्या—सांख्यमतावलम्बी प्रकृतिको स्वतन्त्र और जगत्का कारण मानते हैं । परन्तु वेदका ऐसा मत नहीं है । वेदमे उस प्रकृतिको परब्रह्म परमेश्वरके ही अधीन रहनेवाली उसीकी एक शक्ति बताया गया है । शक्ति शक्तिमान्से भिन्न नहीं होती, अतः उसका स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं माना जाता । इस प्रकार परमात्माके अधीन उसीकी एक शक्ति होनेके कारण उसकी सार्थकता है । क्योकि शक्ति होनेसे ही शक्तिमान् परमेश्वरके द्वारा जगत्की सृष्टि आदि कार्य होने सम्भव है । यदि परब्रह्म परमेश्वरको शक्तिहीन मान लिया जाय, तब वह इस जडचेतनात्मक सम्पूर्ण जगत्का कर्ता-धर्ता और संहर्ता कैसे हो सकता है ? फिर तो उसे सर्वशक्तिमान् भी कैसे माना जा सकता है ? श्वेताश्वतरोपनिषद्मे स्पष्ट कहा गया है कि 'महर्षियोंने ध्यानयोगमे स्थित होकर परमात्मदेवकी स्वरूप- भूता अचिन्त्य शक्तिका साक्षात्कार किया जो अपने गुणोंसे आवृत है ।'* वहीं यह भी कहा गया है कि उस परमेश्वरकी स्वाभाविक ज्ञान, बल और क्रियारूप शक्तियाँ नाना प्रकारकी सुनी जाती हैं ।† सम्बन्ध—वेदमे बतायी हुई प्रकृति सांख्योक्त प्रधान नहीं है, इस बातको दृढ़ करनेके लिये दूसरा कारण बताते हैं । ज्ञेयत्वावचनाच्च ॥ १ । ४ । ४ ॥ ज्ञेयत्वावचनात्=वेदमे प्रकृतिको ज्ञेय नहीं बताया गया है । इसलिये; च= भी ( यह सांख्योक्त प्रधान नहीं है ) ।
- ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन् देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम् ।' ( श्वेता० १ । ३ ) † यह मन्त्र पृष्ठ दोमे आ गया है ।