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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

८० वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि जब प्रकृतिके अंशको 'अव्यक्त' नामसे स्वीकार कर लिया, तब सांख्यशास्त्रमें कहे हुए प्रधानको स्वीकार करनेमें क्या आपत्ति है ? सांख्यशास्त्र भी तो भूतोंके कारणरूप सूक्ष्म तत्त्वको ही 'प्रधान' या 'प्रकृति' कहता है, इसपर कहते हैं— तदधीनत्वादर्थवत् ॥ १ । ४ । ३ ॥ तदधीनत्वात्=उस परमात्माके अधीन होनेके कारण; अर्थवत्=वह ( शक्तिरूपा प्रकृति ) सार्थक है । व्याख्या—सांख्यमतावलम्बी प्रकृतिको स्वतन्त्र और जगत्‌का कारण मानते हैं । परन्तु वेदका ऐसा मत नहीं है । वेदमे उस प्रकृतिको परब्रह्म परमेश्वरके ही अधीन रहनेवाली उसीकी एक शक्ति बताया गया है । शक्ति शक्तिमान्‌से भिन्न नहीं होती, अतः उसका स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं माना जाता । इस प्रकार परमात्माके अधीन उसीकी एक शक्ति होनेके कारण उसकी सार्थकता है । क्योकि शक्ति होनेसे ही शक्तिमान् परमेश्वरके द्वारा जगत्‌की सृष्टि आदि कार्य होने सम्भव है । यदि परब्रह्म परमेश्वरको शक्तिहीन मान लिया जाय, तब वह इस जडचेतनात्मक सम्पूर्ण जगत्‌का कर्ता-धर्ता और संहर्ता कैसे हो सकता है ? फिर तो उसे सर्वशक्तिमान् भी कैसे माना जा सकता है ? श्वेताश्वतरोपनिषद्मे स्पष्ट कहा गया है कि 'महर्षियोंने ध्यानयोगमे स्थित होकर परमात्मदेवकी स्वरूप- भूता अचिन्त्य शक्तिका साक्षात्कार किया जो अपने गुणोंसे आवृत है ।'* वहीं यह भी कहा गया है कि उस परमेश्वरकी स्वाभाविक ज्ञान, बल और क्रियारूप शक्तियाँ नाना प्रकारकी सुनी जाती हैं ।† सम्बन्ध—वेदमे बतायी हुई प्रकृति सांख्योक्त प्रधान नहीं है, इस बातको दृढ़ करनेके लिये दूसरा कारण बताते हैं । ज्ञेयत्वावचनाच्च ॥ १ । ४ । ४ ॥ ज्ञेयत्वावचनात्=वेदमे प्रकृतिको ज्ञेय नहीं बताया गया है । इसलिये; च= भी ( यह सांख्योक्त प्रधान नहीं है ) ।

  • ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन् देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम् ।' ( श्वेता० १ । ३ ) † यह मन्त्र पृष्ठ दोमे आ गया है ।

[ सूत्र ३-५ ] अध्याय १ ८१ व्याख्या—सांख्यमतावलम्बी प्रकृतिको ज्ञेय मानते हैं। उनका कहना है कि 'गुणपुरुषान्तरज्ञानात् कैवल्यम्' अर्थात् 'गुणमयी प्रकृति और पुरुषका पार्थक्य जान लेनेसे कैवल्य ( मोक्ष ) प्राप्त होता है।' प्रकृतिके स्वरूपको अच्छी तरह जाने बिना उससे पुरुषका पार्थक्य ( भेद ) कैसे ज्ञात होगा, अतः उनके मतमे प्रकृति भी ज्ञेय है। परन्तु वेदमे प्रकृतिको ज्ञेय अथवा उपास्य कहीं नहीं कहा गया है। वहाँ तो एकमात्र परब्रह्म परमेश्वरको ही जाननेयोग्य तथा उपास्य बताया गया है। इससे यही सिद्ध होता है कि वेदोक्त प्रकृति सांख्य- वादियोके माने हुए 'प्रधान' तत्त्वसे भिन्न है। सम्बन्ध—अपने मतकी पुष्टिके लिये सूत्रकार स्वयं ही शङ्का उठाकर उसका समाधान करते हैं— वदतीति चेन्न प्राज्ञो हि प्रकरणात् ॥ १ । ४ । ५ ॥ चेत्=यदि कहो; वदति=( वेद प्रकृतिको भी ज्ञेय ) बताता है; इति न= तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; हि=क्योकि ( वहाँ ज्ञेय तत्त्व ); प्राज्ञः=परमात्मा ही है; प्रकरणात्=प्रकरणसे ( यही बात सिद्ध होती है )। व्याख्या—कठोपनिषद्में जहाँ 'अव्यक्त' की चर्चा आयी है, उस प्रकरणके अन्तमें ( १ । ३ । १५ ) कहा गया है कि— अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथारसं नित्यमगन्धवच्च यत्। अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तन्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते ॥ 'जो शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्धसे रहित, अविनाशी, नित्य, अनादि, अनन्त, महत्‌से परे तथा ध्रुव ( निश्चल ) है, उस तत्त्वको जानकर मनुष्य मृत्युके मुखसे छूट जाता है।' 'इस मन्त्रमे ज्ञेय तत्त्वके जो लक्षण बताये गये हैं, वे सब सांख्योक्त प्रधानमे भी सङ्गत होते हैं; अतः यहाँ प्रधानको ही 'ज्ञेय' बताना सिद्ध होता है।' ऐसी बात यदि कोई कहे तो उसका यह कथन ठीक नहीं है; क्योकि यहाँ परब्रह्म परमेश्वरके स्वरूपका वर्णन है; आगे-पीछे सब जगह उसीको जानने और प्राप्त करने- योग्य बताया गया है। ऊपर जो मन्त्र उद्धृत किया गया है, उसमे बताये हुए सभी लक्षण परमात्मामे ही यथार्थरूपसे सङ्गत होते हैं; अतः उसमे भी परमात्मा- के ही स्वरूपका वर्णन तथा उसे जाननेके फलका प्रतिपादन है। इसलिये इस वे० द० ६—

प्रकरणसे यही सिद्ध होता है कि श्रुतिमे परमात्माको ही जाननेके योग्य कहा

८२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ प्रकरणसे यही सिद्ध होता है कि श्रुतिमे परमात्माको ही जाननेके योग्य कहा गया है तथा उसीको जाननेका फल मृत्युके मुखसे छूटना बताया गया है । यहाँ प्रकृतिका वर्णन नहीं है । सम्बन्ध—कठोपनिषद्मे अग्नि, जीवात्मा तथा परमात्मा—इन तीनका प्रकरण तो है ही; इसी प्रकार चौथे 'प्रधान' तत्त्वका भी प्रकरण मान लिया जाय तो क्या हानि है ? इसपर कहते है — त्रयाणामेव चैवमुपन्यासः प्रश्नश्च ॥ १ । ४ । ६ ॥ त्रयाणाम्=( इस उपनिषद्मे ) तीनका; एव=ही; एवम्=इस प्रकार ज्ञेयरूपसे; उपन्यासः=उल्लेख हुआ है; च=तथा ( इन्हीं तीनोके सम्बन्धमे ); प्रश्नः=प्रश्न भी ( किया गया ) है । व्याख्या—कठोपनिषद्के प्रकरणमे नचिकेताने अग्नि, जीवात्मा और परमात्मा—इन्हीं तीनोंको जाननेके लिये प्रश्न किया है । अग्निविषयक प्रश्न इस प्रकार है—'स त्वमग्निग्ँ स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्रब्रूहि त्वग्ँ श्रद्दधानाय मह्यम् ।' ( क० उ० १ । १ । १३ ) अर्थात् 'हे यमराज ! आप स्वर्गकी प्राप्तिके साधनरूप अग्निको जानते हैं, अतः मुझ श्रद्धालुके लिये वह अग्नि-विद्या भली- भाँति समझाकर कहिये ।' तदनन्तर जीव-विषयक प्रश्न इस प्रकार किया गया है—'येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके । एतद्विद्या- मनुशिष्टस्त्वयाहम् ।' ( क० उ० १ । १ । २० ) अर्थात् “मरे हुए मनुष्यके विषयमे कोई तो कहता है, 'यह रहता है' और कोई कहता है 'नहीं रहता ।' इस प्रकारकी यह शङ्का है, इसका निर्णय मैं आपके द्वारा उपदेश पाकर जानना चाहता हूँ ।” तत्पश्चात् आगे चलकर परमात्माके विषयमे इस प्रकार प्रश्न उपस्थित किया गया है— अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात् कृताकृतात् । अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत् पश्यसि तद् वद ॥ (क०उ० १ । २ । १४) 'जो धर्म और अधर्म दोनोंसे, कार्य-कारणरूप समस्त जगत्से एवं भूत, वर्तमान और भविष्यत्—इन तीन भेदोंवाले कालसे तथा तत्सम्बन्धी समस्त पदार्थोंसे अलग है, ऐसे जिस तत्त्वको आप जानते हैं, उसीका मुझे उपदेश कीजिये ।'

सूत्र ६-७ ] अध्याय १ ८३

सूत्र ६-७ ] अध्याय १ ८३ —इस प्रकार इन तीनोके विषयमे नचिकेताका प्रश्न है, और प्रश्नके अनुसार ही यमराजका क्रमशः उत्तर भी है। अग्निविषयक प्रश्नका उत्तर क्रमशः १ । १ । १४ से १९ तकके मन्त्रोमे दिया गया है। जीवविषयक प्रश्नका उत्तर पहले तो १ । २ । १८, १९ मे, फिर २ । २ । ७ मे दिया गया है। परमात्म- विषयक प्रश्नका उत्तर १ । २ । २० से लेकर ग्रन्थकी समाप्तितक दिया गया है। बीच-बीचमे कहीं जीवके स्वरूपका भी वर्णन हुआ है। परन्तु 'प्रधान'के विषयमे न तो कोई प्रश्न है और न उत्तर ही। इससे यह निश्चित होता है कि यहाँ उक्त तीनोके सिवा चौथेका प्रसङ्ग ही नहीं है। सम्बन्ध—जब प्रधानका वाचक 'अव्यक्त' शब्द उस प्रकरणमे पडा है तो उसे दूसरे अर्थमे कैसे लगाया जा सकता है ? इसपर कहते हैं— महद्वच्च ॥ १ । ४ । ७ ॥ महद्वत्='महत्' शब्दकी भाँति; च=इसको भी दूसरे अर्थमे लेना अयुक्त नहीं है। व्याख्या—जिस प्रकार 'महत्' शब्द सांख्य-शास्त्रमे महत्तत्त्वके लिये प्रयुक्त हुआ है, किन्तु कठोपनिषद्मे वही शब्द आत्माके अर्थमे प्रयुक्त है, उसी प्रकार 'अव्यक्त' शब्द भी दूसरे अर्थमे माना जाय तो कोई विरोध नहीं है। महत् शब्दका प्रयोग जीवात्माके अर्थमे इस प्रकार आया है—'बुद्धेरात्मा महान् पर ।' (क० उ० १ । ३ । १०) 'बुद्धिसे महान् आत्मा पर है।' यहाँ इसको बुद्धिसे परे बताया गया है, किन्तु सांख्यमतमे बुद्धि- का ही नाम महत्तत्त्व है। इसलिये यहाँ महत् शब्द जीवात्माका वाचक है। इस प्रकार वेदोमे जगह-जगह 'महत्' शब्दका प्रयोग सांख्यमतके विपरीत देखा जाता है, उसी प्रकार 'अव्यक्त' शब्दका अर्थ भी सांख्यमतसे भिन्न मानना अनुचित नहीं है, प्रत्युत उचित ही है। सम्बन्ध—"इस प्रकरणमे आया हुआ 'अव्यक्त' शब्द यदि दूसरे अर्थमें मान लिया जाय तो भी श्वेताश्वतरोपनिषद्मे 'अजा' शब्दसे अनादि प्रकृतिका वर्णन उपलब्ध होता है। वहाँ उसे श्वेत, लाल और काला—इन तीन वर्णोंवाली कहा गया है। इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि सांख्यशास्त्रोक्त त्रिगुणात्मिका प्रकृतिको ही वेदमे जगत्का कारण माना गया है।' ऐसा संदेह उपस्थित होनेपर कहते हैं—

८४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ चमसवदविशेषात् ॥ १ । ४ । ८ ॥ ( 'अजा' शब्द वहाँ सांख्यशास्त्रोक्त प्रकृतिका ही वाचक है, यह सिद्ध नहीं होता; क्योकि ) अविशेषात्=किसी प्रकारकी विशेषताका उल्लेख न होनेसे; चमसवत्='चमस'की भाँति ( उसे दूसरे अर्थमे भी लिया जा सकता है ) । व्याख्या—श्वेताश्वतरोपनिषद् ( १ । ९ तथा ४ । ५ ) मे जिस 'अजा' का वर्णन है, उसका नाम चाहे जो रख लिया जाय, परन्तु वास्तवमे वह परब्रह्म- की शक्ति है, और उस ब्रह्मसे भिन्न नहीं है । उक्त उपनिषद्मे यह स्पष्ट लिखा है कि 'जगत्का कारण कौन है ?' इसपर विचार करनेवाले महर्षियोंने ध्यानयोगमें स्थित होकर उस परमदेव परमेश्वरकी स्वरूपभूता अचिन्त्य शक्तिको ही कारण- रूपमे देखा और यह निश्चय किया कि जो परमदेव अकेला ही काल, स्वभाव आदिसे लेकर आत्मातक समस्त तत्त्वोका अधिष्ठान है, जिसके आश्रयसे ही वे सब अपने-अपने स्थानमे कारण बनते है, वही परमात्मा इस जगत्का कारण है ( १ । ३ ) । अतः यह सिद्ध होता है कि वेदमे 'अजा' नामसे जिस प्रकृतिका वर्णन हुआ है, वह भगवान्के अधीन रहनेवाली उन्हींकी अभिन्न-स्वरूपा अचिन्त्य शक्ति है, सांख्यकथित स्वतन्त्र तत्त्वरूप प्रधान या प्रकृति नहीं । इसी बातको स्पष्ट करनेके लिये सूत्रमे कहा गया है कि जिस प्रकार 'चमस' शब्द रूढिसे सोमपानके लिये निर्मित पात्रविशेषका वाचक होनेपर भी बृहदारण्यकोपनिषद् ( २ । २ । ३ ) मे आये हुए 'अर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नः' इत्यादि मन्त्रमे वह 'शिर' के अर्थमे प्रयुक्त हुआ है; उसी प्रकार यहाँ 'अजा' शब्द भगवान्की स्वरूपभूता अनादि अचिन्त्य शक्तिके अर्थमे है, ऐसा माननेमे कोई बाधा नहीं है; क्योंकि यहाँ ऐसा कोई विशेष कारण नहीं दीखता, जिससे 'अजा' शब्दके द्वारा सांख्य- कथित स्वतन्त्र प्रकृतिको ही ग्रहण किया जाय । सम्बन्ध—'अजा' शब्द जिस अर्थमें रूढ़ है, उसको न लेकर यहाँ दूसरा कौन-सा अर्थ लिया गया है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— ज्योतिरुपक्रमा तु तथा ह्यधीयत एके ॥ १ । ४ । ९ ॥ तु=निश्चय ही; ज्योतिरुपक्रमा=यहाँ 'अजा' शब्द तेज आदि त्रिविध तत्त्वोंकी

सूत्र ८-९ ] अध्याय १ ८५

सूत्र ८-९ ] अध्याय १ ८५ कारणभूता परमेश्वरकी शक्तिका वाचक है; हि=क्योकि; एके=एक शाखावाले- तथा=ऐसा ही; अधीयते=अध्ययन (वर्णन) करते हैं। व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद् (६। २। ३, ४) मे परमेश्वरसे उत्पन्न तेज आदि तत्त्वोंसे जगत्‌के विस्तारका वर्णन है। अतः यहाँ यही मानना ठीक है कि उनकी कारणभूता परमेश्वर-शक्तिको ही 'अजा' कहा गया है। छान्दोग्यमे बताया गया है कि 'उस परमेश्वरने विचार किया; 'मै बहुत हो जाऊँ।' फिर उसने तेजको रचा; तत्पश्चात् तेजसे जल और जलसे अन्नकी उत्पत्ति कही गयी है, इसके बाद इनके तीन रूपोंका वर्णन है। अग्निमे जो लाल रंग है, वह तेज- का है, जो सफेद रंग है, वह जलका है तथा जो काला रंग है, वह अन्न (पृथिवी) का है।' इस प्रकार प्रत्येक वस्तुमे उक्त तेज आदि तीनो तत्त्वोकी व्यापकताका वर्णन है (छा० उ० ६। ४। १ से ७ तक)। इसी तरह श्वेताश्वतरोपनिषद्मे जो 'अजा' के तीन रंग बताये गये है, वे भी तेज आदिमें उपलब्ध होते हैं। अतः निश्चित रूपसे यह नहीं कहा जा सकता कि यहाँ अजाके नामसे प्रधानका ही वर्णन है। यदि प्रकृति या प्रधानका वर्णन मान लिया जाय तो भी यही मानना होगा कि वह उस परब्रह्मके अधीन रहनेवाली उसीकी अभिन्न शक्ति है, जो उक्त तेज आदि तीनो तत्त्वोकी भी कारण है। सांख्यशास्त्रोक्त प्रधानका वहाँ वर्णन नहीं है; क्योकि श्वेताश्वतरोपनिषद् (१। १०) मे जहाँ उसका 'प्रधान' के नामसे वर्णन हुआ है, वहाँ भी उसको स्वतन्त्र नहीं माना है। अपितु क्षर-प्रधान अर्थात् भगवान्‌की शक्तिरूप अपरा प्रकृति, अक्षर-जीवात्मा अर्थात् भगवान्‌की परा प्रकृति-इन दोनोंको शासन करनेवाला उस परम पुरुष परमेश्वरको बताया है। * फिर आगे चलकर स्पष्ट कर दिया है कि भोक्ता (अक्षरतत्त्व), भोग्य (क्षरतत्त्व) और उन दोनोंका प्रेरक ईश्वर-इन तीनो रूपोंमें ब्रह्म ही बताया गया है।† अतः 'अजा' शब्द- का पर्याय 'प्रधान' होनेपर भी वह सांख्यशास्त्रोक्त 'प्रधान' नहीं है। अपितु परमेश्वरके अधीन रहनेवाली उसीकी एक शक्ति है। सम्बन्ध—"अनादि ईश्वर-शक्तिको यहाँ 'अजा' कहा गया है; यह बात कैसे मानी जा सकती है; क्योंकि वह तो रूप आदिसे रहित है और यहाँ अजाके ✡ क्षरं प्रधानममृताक्षरं हरः क्षरात्मानावीशते देव एक.। (श्वेता० १।१०) † भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा सर्वं प्रोक्तं त्रिविधं ब्रह्ममेतत्। (श्वेता० १।१२)

८६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ लाल, सफेद और काला-ये तीन रंगके रूप बताये गये हैं ?'' ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं- कल्पनोपदेशाच्च मध्वादिवदविरोधः ॥ १ । ४ । १० ॥ कल्पनोपदेशात् =यहाँ 'अजा'का रूपक मानकर उसके त्रिविध रूपोंकी कल्पनापूर्वक उपदेश किया गया है, इसलिये; च=भी; मध्वादिवत्=मधु आदि- की भाँति; अविरोधः=कोई विरोध नहीं है। व्याख्या-जैसे छान्दोग्य ( ३ । १ ) मे रूपककी कल्पना करते हुए, जो वास्तवमे मधु नहीं, उस सूर्यको मधु कहा गया है। बृहदारण्यकमे वाणीको, धेनु न होनेपर भी, धेनु कहा गया है ( बृह० उ० ५ । ८ । १ ), तथा द्युलोक आदिको अग्नि बताया गया है (बृह० उ० ६ । २ । ९ )। इसी प्रकार यहाँ भी रूपककी कल्पनामे भगवान्‌की शक्तिभूता प्रकृतिको 'अजा' नाम देकर उसके लाल, सफेद और काले तीन रंग बताये गये हैं; इसलिये कोई विरोध नहीं है। जिज्ञासुको समझानेके लिये रूपककी कल्पना करके वर्णन करना उचित ही है। सम्बन्ध-“पूर्व प्रकरणमे यह बात सिद्ध की गयी कि श्रुतिमें आया हुआ 'अजा' शब्द सांख्यशास्त्रोक्त त्रिगुणात्मिका प्रकृतिका नहीं, परब्रह्म परमात्माकी स्वरूपभूता अनादि शक्तिका वाचक है। किन्तु दूसरी श्रुतिमें 'पञ्चपञ्च' यह संख्यावाचक शब्द पाया जाता है। इससे यह धारणा होती है कि यहाँ सांख्योक्त पचीस तत्त्वोंका ही समर्थन किया गया है। ऐसी दशामें 'अजा' शब्द भी सांख्य- सम्मत मूल प्रकृतिका ही वाचक क्यों न माना जाय ?'' इस शङ्काका निराकरण करनेके लिये कहते हैं- न संख्योपसंग्रहादपि नानाभावादतिरेकाच्च ॥ १ । ४ । ११ ॥ संख्योपसंग्रहात् =( श्रुतिमे ) संख्याका ग्रहण होनेसे; अपि=भी; न=वह ( सांख्यमतोक्त तत्त्वोकी ) गणना नहीं है; नानाभावात् =क्योकि वह संख्या दूसरे-दूसरे अनेक भाव व्यक्त करनेवाली है; च=तथा; अतिरेकात्=( वहाँ ) उससे अधिकका भी वर्णन है। व्याख्या-बृहदारण्यकोपनिषद्‌में कहा गया है कि- यस्मिन् पञ्च पञ्चजना आकाशश्च प्रतिष्ठितः । तमेव मन्य आत्मानं विद्वान् ब्रह्मामृतोऽमृतम् ॥ (४ । ४ । १७)

सूत्र १०—१२ ] अध्याय १ ८९

सूत्र १०—१२ ] अध्याय १ ८९ 'जिसमें पाँच पञ्चजन और आकाश भी प्रतिष्ठित है, उसी आत्माको मृत्युसे रहित मैं विद्वान् अमृतस्वरूप ब्रह्म मानता हूँ।'—इस मन्त्रमे जो संख्यावाचक 'पञ्च-पञ्च' शब्द आये है, इनको लेकर पचीस तत्त्वोंकी कल्पना करना उचित नहीं है; क्योकि यहाँ ये संख्यावाचक शब्द दूसरे-दूसरे भावको व्यक्त करनेवाले हैं। इसके सिवा, 'पञ्च-पञ्च'से पचीस संख्या माननेपर भी उक्त मन्त्रमे वर्णित आकाश और आत्माको लेकर सत्ताईस तत्त्व होते है; जो सांख्यमतकी निश्चित गणनासे अधिक हो जाते है। अतः यही मानना ठीक है कि वेदमे न तो सांख्यसम्मत स्वतन्त्र 'प्रधान'का वर्णन है और न पचीस तत्त्वोका ही। जिस प्रकार श्वेताश्वतरोपनिषद्मे 'अजा' शब्दसे उस परब्रह्म परमेश्वरकी अनादि शक्तिका वर्णन किया गया है, उसी प्रकार यहाँ 'पञ्च पञ्चजनाः' पदोके द्वारा परमेश्वरकी अनेकविध कार्य-शक्तियोका वर्णन है। सम्बन्ध—तब फिर यहाँ 'पञ्च पञ्चजनाः' पदोंके द्वारा किनका ग्रहण होता है ? ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं— प्राणादयो वाक्यशेषात् ॥ १ । ४ । १२ ॥ वाक्यशेषात् = बादवाले मन्त्रमे कहे हुए वाक्यसे; प्राणादयः = ( यहाँ ) प्राण और इन्द्रियाँ ही ग्रहण करने योग्य है। व्याख्या—उपर्युक्त मन्त्रके बाद आया हुआ मन्त्र इस प्रकार है—'प्राणस्य प्राणमुत चक्षुषश्चक्षुरुत श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो ये मनो विदुः । ते निचिक्युर्ब्रह्म पुराणमग्र्यम्।' ( ४ । ४ । १८ ) अर्थात् 'जो विद्वान् उस प्राणके प्राण, चक्षुके चक्षु, श्रोत्रके श्रोत्र तथा मनके भी मनको जानते है, वे उस आदि पुराण-पुरुष परमेश्वरको जानते है।' इसके वर्णनसे यह सिद्ध होता है कि पूर्वमन्त्रमे 'पञ्च पञ्चजनाः' पदोके द्वारा पञ्च प्राण, पञ्च ज्ञानेन्द्रिय, पञ्च कर्मेन्द्रिय, मन तथा बुद्धि आदि परमेश्वरकी कार्यशक्तियोका ही वर्णन है; क्योकि उस ब्रह्मको ही उक्त मन्त्रमे प्राणका प्राण, चक्षुका चक्षु, श्रोत्रका श्रोत्र तथा मनका भी मन कहा गया है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि उस परब्रह्मके सम्बन्धसे ही प्राण आदि अपना कार्य करनेमे समर्थ होते है, इसलिये यहाँ इनके रूपमे उसीकी शक्तिविशेषका विस्तार बताया गया है।

८८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ सम्बन्ध- "माध्यन्दिनी शाखावालोंके पाठके अनुसार 'प्राणस्य प्राणम्' इत्यादि मन्त्रमें अन्नका भी वर्णन होनेसे प्राण, चक्षु, श्रोत्र, मन और अन्नको लेकर पाँचकी संख्या पूर्ण हो जाती है; परन्तु काण्वशाखाके मन्त्रमें 'अन्न'का वर्णन नहीं है; अतः वहाँ उस परमेश्वरकी पञ्चविध कार्यशक्तियोंकी संख्या कैसे पूरी होगी ?" ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं— ज्योतिषैकेषामसत्यन्ने ॥ १ । ४ । १३ ॥ एकेषाम्=एक शाखावालोंके पाठमे; अन्ने=अन्नका वर्णन; असति= न होनेपर; ज्योतिषा=पूर्ववर्णित 'ज्योति'के द्वारा ( संख्या-पूर्ति की जा सकती है)। व्याख्या—'माध्यन्दिनी' शाखावालोंके पाठके अनुसार इस मन्त्रमें ब्रह्मको 'प्राणका प्राण' आदि बताते हुए 'अन्नका अन्न' भी कहा गया है । अतः उनके पाठानुसार यहाँ पाँचकी संख्या पूर्ण हो जाती है । परन्तु काण्वशाखावालोंके पाठमे 'अन्नस्य अन्नम्' इस अंशका ग्रहण नहीं हुआ है; अतः उनके अनुसार चारका ही वर्णन होनेपर पाँचकी संख्या-पूर्तिमें एककी कमी रह जाती है। अतः सूत्रकार कहते हैं कि काण्वशाखाके पाठमें अन्नका ग्रहण न होनेसे जो एककी कमी रहती है, उसकी पूर्ति ४ । ४ । १६ के मन्त्रमे वर्णित 'ज्योति' के द्वारा कर लेनी चाहिये । वहाँ उस ब्रह्मको 'ज्योतिकी भी ज्योति' बताया गया है । सत्रहवें मन्त्रका वर्णन तो सङ्केतमात्र है, इसलिये उसमे पाँच संख्याकी पूर्ति करना आवश्यक नहीं है, तो भी ग्रन्थकारने किसी प्रकार भी प्रसङ्गवश उठनेवाली शङ्काका निराकरण करनेके लिये यह सूत्र कहा है । सम्बन्ध—यहाँ यह शङ्का होती है कि 'श्रुतियोंमें जगत्‌के कारणका अनेक प्रकारसे वर्णन आया है । कहीं सत्‌से सृष्टि बतायी गयी है, कहीं असत्‌से । तथा जगत्‌की उत्पत्तिके क्रममें भी भेद है । कहीं पहले आकाशकी उत्पत्ति बतायी है, कहीं तेजकी, कहीं प्राणकी और कहीं अन्य किसीकी । इस प्रकार वर्णनमें भेद होनेसे वेदवाक्योंद्वारा यह निश्चित नहीं किया जा सकता कि जगत्‌का कारण केवल परब्रह्म परमेश्वर ही है तथा सृष्टिका क्रम अमुक प्रकारका ही है । इसपर कहते हैं— कारणत्वेन चाकाशादिषु यथाव्यपदिष्टोक्तेः ॥ १ । ४ । १४ ॥

सूत्र १३—१५ ] अध्याय १ ८९

सूत्र १३—१५ ] अध्याय १ ८९ आकाशादिषु=आकाश आदि किसी भी क्रमसे रचे जानेवाले पदार्थोंमें; कारणत्वेन=कारणरूपसे; च=तो; यथाव्यपदिष्टोक्तेः=सर्वत्र एक ही वेदान्त- वर्णित ब्रह्मका प्रतिपादन किया गया है; इसलिये ( परब्रह्म ही जगत्‌का कारण है )। व्याख्या—वेदमे जगत्‌के कारणोका वर्णन नाना प्रकारसे किया गया है तथा जगत्‌की उत्पत्तिका क्रम भी अनेक प्रकारसे बताया गया है, तथापि केवल परब्रह्म- को ही जगत्‌का कारण माननेमें कोई दोष नहीं है; क्योकि जगत्‌के दूसरे कारण जो आकाश आदि कहे गये हैं, उनका भी परम कारण परब्रह्मको ही बताया गया है। इससे ब्रह्मकी ही कारणता सिद्ध होती है, अन्य किसीकी नहीं। जगत्‌की उत्पत्तिके क्रममे जो भेद आता है, वह इस प्रकार है—कहीं तो 'आत्मन आकाशः संभूतः' ( तै०उ० २ । १) इत्यादि श्रुतिके द्वारा आकाश आदिके क्रमसे सृष्टि बतायी गयी है। कहीं 'तत्तेजोऽसृजत' ( छा० उ० ६ । २ । ३ ) इत्यादि मन्त्रोद्वारा तेज आदिके क्रमसे सृष्टिका प्रतिपादन किया गया है। कहीं 'स प्राणमसृजत' ( प्र० उ० ६ । ४ ) इत्यादि वाक्योंद्वारा प्राण आदिके क्रमसे सृष्टिका वर्णन किया गया है। कहीं 'स इमाँल्लोकानसृजत । अम्भो मरीचीर्मर- मापः' ( ऐ० उ० १ । १ । २ ) इत्यादि वचनोंद्वारा बिना किसी सुव्यवस्थित क्रमके ही सृष्टिका वर्णन मिलता है। इस प्रकार सृष्टि-क्रमके वर्णनमे भेद होनेपर भी कोई दोषकी बात नहीं है, बल्कि इस प्रकार विचित्र रचनाका वर्णन तो ब्रह्मके महत्त्वका ही द्योतक है। कल्पभेदसे ऐसा होना सम्भव भी है। इसलिये ब्रह्मको ही जगत्‌का कारण बताना सर्वथा सुसंगत है। सम्बन्ध—"उपनिषदोंमें कहीं तो यह कहा है कि 'पहले एकमात्र असत् ही था' ( तै० उ० २ । ७)। कहीं कहा है 'पहले केवल सत् ही था' ( छा० उ० ६ । २ । १)। कहीं 'पहले अव्याकृत था' ( बृह० उ० १ । ४ । ७ ) ऐसा वर्णन आता है। उपर्युक्त 'असत्' आदि शब्द ब्रह्मके वाचक कैसे हो सकते हैं ?” ऐसी शङ्का होनेपर कहते हैं— समाकर्षात् ॥ १ । ४ । १५ ॥ समाकर्षात्=आगे-पीछे कहे हुए वाक्यका पूर्णरूपसे आकर्षण करके उसके साथ सम्बन्ध जोड़ लेनेसे ( 'असत्' आदि शब्द भी ब्रह्मके ही वाचक सिद्ध होते है ) ।

९० वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ व्याख्या—तैत्तिरीयोपनिषद्मे जो यह कहा है कि 'असद्वा इदमग्र आसीत् । ततो वै सदजायत।' (२ । ७) अर्थात् 'पहले यह असत् ही था। इसीसे सत् उत्पन्न हुआ।' यहाँ 'असत्' शब्द अभाव या मिथ्याका वाचक नहीं है; क्योकि पहले अनुवाकमे ब्रह्मका लक्षण बताते हुए उसे सत्य, ज्ञान और अनन्त कहा गया है। फिर उसीसे आकाश आदिके क्रमसे समस्त जगत्की उत्पत्ति बतायी है। तदनन्तर छठे अनुवाकमे 'सोऽकामयत' के 'सः' पदसे उसी पूर्वानुवाकमे वर्णित ब्रह्मका आकर्षण किया गया है। तत्पश्चात् अन्तमे कहा गया है कि 'यह जो कुछ है, वह सत्य ही है—सत्यस्वरूप ब्रह्म ही है।' उसके बाद इसी विषयमे प्रमाणरूपमें श्लोक कहनेकी प्रतिज्ञा करके सातवे अनुवाकमे, 'असद् वा इदमग्र आसीत्' इत्यादि मन्त्र प्रस्तुत किया गया। इस प्रकार पूर्वापर-प्रसङ्गको देखते हुए इस मन्त्रमे आया हुआ 'असत्' शब्द मिथ्या या अभावका वाचक सिद्ध नहीं होता; अतः वहाँ 'असत्'का अर्थ 'अप्रकट ब्रह्म' और उससे होनेवाले 'सत्' का अर्थ जगत् रूपमे 'प्रकट ब्रह्म' ही होगा। इसलिये यहाँ अर्थान्तरकी कल्पना अनावश्यक है। इसी प्रकार छान्दोग्योपनिषद्मे भी जो यह कहा गया है कि 'आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशस्तस्योपव्याख्यानमसदवेदमग्र आसीत्।' (छा० उ० ३।१९।१) अर्थात् 'आदित्य ब्रह्म है, यह उपदेश है, उसीका यह विस्तार है। पहले यह असत् ही था।' इत्यादि। यहाँ भी तैत्तिरीयोपनिषद्की भाँति 'असत्' शब्द 'अप्रकट ब्रह्म'का ही वाचक है; क्योंकि इसी मन्त्रके अगले वाक्यमे 'तत्सदासीत्' कहकर उसका 'सत्' नामसे भी वर्णन आया है। इसके सिवा, बृहदारण्यको- पनिषद्मे स्पष्ट ही 'असत्'के स्थानमे 'अव्याकृत' शब्दका प्रयोग किया गया है। (बृह० उ० '१ । ४ । ७) जो कि 'अप्रकट'का ही पर्याय है। अतः सब जगह पूर्वापरके प्रसङ्गमे कहे हुए शब्दो या वाक्योंका आकर्षण करके अन्वय करनेपर यही निश्चय होता है कि जगत्के कारणरूपसे भिन्न-भिन्न नामोंद्वारा उस पूर्णब्रह्म परमेश्वरका ही वर्णन है, अन्य किसीका नहीं। प्रकृति या प्रधानकी सार्थकता परमात्माकी एक शक्ति माननेसे ही हो सकती है; उनसे भिन्न स्वतन्त्र पदार्थान्तर माननेसे नहीं। सम्बन्ध—ब्रह्म ही संपूर्ण जगत्का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण है, जड प्रकृति जगत्का कारण नहीं हो सकती। यह दृढ़ करनेके लिये सूत्रकार कौषीतकि- उपनिषद्के प्रसङ्गपर विचार करते हुए कहते हैं—

सूत्र १६-१७ ] अध्याय १ ९१

सूत्र १६-१७ ] अध्याय १ ९१ जगद्वाचित्वात् ॥ १ । ४ । १६ ॥ जगद्वाचित्वात् = सृष्टि या रचनारूप कर्म जडचेतनात्मक संपूर्ण जगत्का वाचक है, इसलिये ( चेतन परमेश्वर ही इसका कर्ता है, जड प्रकृति नहीं ) । व्याख्या-कौषीतकि-ब्राह्मणोपनिषद्मे अजातशत्रु और बालाकिके संवाद- का वर्णन है । वहाँ बालाकिने 'य एष आदित्ये पुरुषस्तमेवाहमुपासे।' (४।२) अर्थात् 'जो सूर्यमे यह पुरुष है, उसकी मै उपासना करता हूँ।' यहाँसे लेकर अन्तमे 'य एष सव्येऽक्षन् पुरुषस्तमेवाहमुपासे।' ( ४ । १७ )—जो यह बायाँ आँखमे पुरुष है, उसको मै उपासना करता हूँ।' यहाँतक क्रमशः सोलह पुरुषोकी उपासना करनेवाला अपनेको बताया; परन्तु उसकी प्रत्येक बातको अजातशत्रुने काट दिया । तब वह चुप हो गया । फिर अजातशत्रुने कहा— 'बालाके ! तू ब्रह्मको नहीं जानता, अतः मै तुझे ब्रह्मका उपदेश करता हूँ । तेरे बताये हुए सोलह पुरुषोका जो कर्ता है, जिसके ये सब कर्म है, 'वही जानने योग्य है ।'* इस प्रकार वहाँ पुरुष-वाच्य जीवात्मा और उनके अधिष्ठानभूत जड शरीर दोनोको ही परब्रह्म परमेश्वरका कर्म बताया गया है; अतः कर्म या कार्य शब्द जड-चेतनात्मक संपूर्ण जगत्का वाचक है । इसलिये जड प्रकृति इसका कारण नहीं हो सकती; परब्रह्म परमेश्वर ही इसका कारण है । सम्बन्ध-उपर्युक्त प्रकरणमें 'ज्ञेय'रूपसे बताया हुआ तत्त्व प्राण या जीव नहीं, ब्रह्म ही है, इसकी पुष्टिके लिये सूत्रकार कहते हैं-- जीवमुख्यप्राणलिङ्गान्नेति चेत्तद् व्याख्यातम् ॥ १ । ४ । १७ ॥ चेत् इति=यदि ऐसा कहो कि; जीवमुख्यप्राणलिङ्गात् = ( उस प्रसङ्गके वाक्यशेषमें ) जीव तथा मुख्यप्राणके बोधक लक्षण पाये जाते है, इसलिये ( प्राण- सहित जीव ही ज्ञेय तत्त्व होना चाहिये ); न=ब्रह्म वहाँ ज्ञेय नहीं है; ( तो ) तद् व्याख्यातम्=इसका निराकरण पहले किया जा चुका है । व्याख्या-यदि यह कहो, कि 'यहाँ वाक्यशेषमे जीव और मुख्यप्राणके सूचक लक्षणोका स्पष्टरूपसे वर्णन है, इसलिये प्राणोके सहित उसका अधिष्ठाता जीव ही जगत्का कर्ता एवं ज्ञेय बताया गया है।' तो यह उचित नहीं है, क्योकि

  • ब्रह्म ते ब्रवाणि स होवाच यो वै बालाक एतेषां पुरुषाणां कर्ता यस्य वैतत्कर्म स वै वेदितव्यः । ( ४ । १८ )

प्रकरणमे ) जीवात्मा तथा मुख्यप्राणका वर्णन दूसरे ही प्रयोजनसे है; प्रश्न-

९२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ इस शङ्काका निवारण पहले ( १ । १ । ३१ सूत्रमें ) कर दिया गया है। वहाँ यह बता दिया गया है कि ब्रह्म सभी धर्मोंका आश्रय है, अतः जीव तथा प्राण- के धर्मोंका उसमें बताया जाना अनुचित नहीं है। यदि जीव आदिको भी ज्ञेय तत्त्व मान लें तो त्रिविध उपासनाका प्रसङ्ग उपस्थित हो सकता है, जो उचित नहीं है। सम्बन्ध-अब सूत्रकार इस विषयमें आचार्य जैमिनिकी सम्मति क्या है, यह बताते हैं— अन्यार्थं तु जैमिनिः प्रश्नव्याख्यानाभ्यामपि चैवमेके ॥ १ । ४ । १८ ॥ जैमिनिः=आचार्य जैमिनि; तु=तो ( कहते हैं कि ); अन्यार्थम्=( इस प्रकरणमे ) जीवात्मा तथा मुख्यप्राणका वर्णन दूसरे ही प्रयोजनसे है; प्रश्न- व्याख्यानाभ्याम्=क्योंकि प्रश्न और उत्तरसे यही सिद्ध होता है; च=तथा; एके= एक ( काण्व ) शाखावाले; एवम् अपि=ऐसा कहते भी हैं। व्याख्या-आचार्य जैमिनि पूर्व कथनका निराकरण करते हुए कहते हैं कि इस प्रकरणमें जो जीवात्मा और मुख्यप्राणका वर्णन आया है, वह मुख्यप्राण या जीवात्माको जगत्का कारण बतानेके लिये नहीं आया है, जिससे कि ब्रह्मको समस्त लक्षणोंका आश्रय बताकर उत्तर देनेकी आवश्यकता पड़े। यहाँ तो उनका वर्णन दूसरे ही प्रयोजनसे आया है। अर्थात् उनका ब्रह्ममे विलीन होना बताकर ब्रह्मको ही जगत्का कारण सिद्ध करनेके लिये उनका वर्णन है। भाव यह है कि जीवात्माकी सुषुप्ति-अवस्थाके वर्णनद्वारा सुषुप्तिके दृष्टान्तसे प्रलयकालमे सबका ब्रह्ममें ही विलय और सृष्टिकालमे पुनः उसीसे प्राकट्य बताकर ब्रह्मको ही जगत्- का कारण सिद्ध किया गया है। यह बात प्रश्न और उसके उत्तरमे कहे हुए वचनोंसे सिद्ध होती है। इसके सिवा, काण्वशाखावालोंने तो अपने ग्रन्थ- में इस विषयको और भी स्पष्ट कर दिया है। वहाँ अजातशत्रुने कहा है कि ‘यत्रैष एतत्सुप्तोऽभूद् य एष विज्ञानमयः पुरुषस्तदेषां प्राणानां विज्ञानेन विज्ञानमादाय य एषोऽन्तर्हृदय आकाशस्तस्मिञ्छेते तानि यदा गृह्णात्यथ हैतत्पुरुषः स्वपिति नाम ।’ ( बृह० उ० २ । १ । १७ ) अर्थात् ‘यह विज्ञानमय पुरुष ( जीवात्मा ) जब सुषुप्ति-अवस्था में स्थित था ( सोता था ), तब यह बुद्धिके सहित समस्त प्राणोंको अर्थात् मुख्यप्राण और समस्त इन्द्रियोंकी वृत्तिको लेकर उस आकाशमें सो रहा

सूत्र १८—२०] अध्याय १ ९३

सूत्र १८—२०] अध्याय १ ९३ था, जो हृदयके भीतर है। उस समय इसका नाम 'स्वपिति' होता है।' इत्यादि। इस वर्णनमें आया हुआ 'आकाश' शब्द परमात्माका वाचक है। अतः यह सिद्ध होता है कि यहाँ सुषुप्तिके दृष्टान्तसे यह बात समझायी गयी है कि जिस प्रकार यह जीवात्मा निद्राके समय समस्त प्राणोंके सहित परमात्मामे विलीन-सा हो जाता है, उसी प्रकार प्रलयकालमे यह जड-चेतनात्मक समस्त जगत् परब्रह्ममे विलीन हो जाता है; तथा सृष्टिकालमे जाग्रत्की भाँति पुनः प्रकट हो जाता है। सम्बन्ध—आचार्य जैमिनि अपने मतकी पुष्टिके लिये दूसरी युक्ति देते हैं— वाक्यान्वयात् ॥ १ । ४ । १९ ॥ वाक्यान्वयात् = पूर्वापर वाक्योके समन्वयसे ( भी उस प्रकरणमे आये हुए जीव और मुख्यप्राणके लक्षणोका प्रयोग दूसरे ही प्रयोजनसे हुआ है, यह सिद्ध होता है)। व्याख्या—प्रकरणके आरम्भ (कौ० उ० ४ । १८) मे ब्रह्मको जानने योग्य बताकर अन्तमे उसीको जाननेवालेकी महिमाका वर्णन किया गया है। (कौ० उ० ४ । २०)। इस प्रकार पूर्वापरके वाक्योका समन्वय करनेसे यही सिद्ध होता है कि बीचमे आया हुआ जीवात्मा और मुख्यप्राणका वर्णन भी उस परब्रह्म परमात्माको ही जगत्का कारण सिद्ध करनेके लिये है। सम्बन्ध—इसी विषयमे आश्मरथ्य आचार्यका मत उपस्थित करते हैं— प्रतिज्ञासिद्धेर्लिङ्गमाश्मरथ्यः ॥ १ । ४ । २० ॥ लिङ्गम् = उक्त प्रकरणमे जीवात्मा और मुख्यप्राणके लक्षणोका वर्णन, ब्रह्मको ही जगत्का कारण बतानेके लिये हुआ है; प्रतिज्ञासिद्धेः = क्योकि ऐसा माननेमे ही पहले की हुई प्रतिज्ञाकी सिद्धि होती है; इति = ऐसा; आश्मरथ्यः = आश्मरथ्य आचार्य मानते हैं। व्याख्या—आश्मरथ्य आचार्यका कहना है कि अजातशत्रुने जो यह प्रतिज्ञा की थी कि "ब्रह्म ते ब्रवाणि—" 'तुझे ब्रह्मका स्वरूप बताऊँगा।' उसकी सिद्धि परब्रह्मको ही जगत्का कारण माननेसे हो सकती है, इसलिये उस प्रसङ्गमें जो जीवात्मा तथा मुख्य प्राणके लक्षणोका वर्णन आया है, वह इसी बातको सिद्ध करनेके लिये है कि जगत्का कारण परब्रह्म परमात्मा ही है।

९४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ सम्बन्ध—अब इसी विषयमें आचार्य औडुलोमिका मत दिया जाता है— उत्क्रमिष्यत एवं भावादित्यौडुलोमिः ॥ १ । ४ । २१॥ उत्क्रमिष्यतः=शरीर छोड़कर परलोकमे जानेवाले ब्रह्मज्ञानीका; एवं भावात्=इस प्रकार ब्रह्ममे विलीन होना ( दूसरी श्रुतिमे भी बताया गया ) है; इसलिये; ( यहाँ जीवात्मा और मुख्यप्राणका वर्णन, परब्रह्मको ही जगत्का कारण बतानेके लिये है; इति=ऐसा; औडुलोमिः=औडुलोमि आचार्य मानते हैं। व्याख्या—जिस प्रकार इस प्रकरणमे सोते हुए मनुष्यके समस्त प्राणोंसहित जीवात्माका परमात्मामे विलीन होना बताया गया है, इसी प्रकार शरीर छोड़कर ब्रह्मलोकमे जानेवाले ब्रह्मज्ञानीकी गतिका वर्णन करते हुए मुण्डकोपनिषद्मे कहा गया है कि— गताः कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठा देवाश्च सर्वे प्रतिदेवतासु । कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मा परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति ॥ यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रेऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय । तथा विद्वान् नामरूपाद् विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ ( ३ । २ । ७-८ ) ‘ब्रह्मज्ञानी महापुरुषका जब देहपात होता है, तब पंद्रह कलाएँ और सम्पूर्ण देवता अपने-अपने कारणभूत देवताओमे आकर स्थित हो जाते हैं; फिर समस्त कर्म और विज्ञानमय जीवात्मा ये सब-के-सब परम अविनाशी ब्रह्ममें एक हो जाते हैं; जिस प्रकार बहती हुई नदियाँ अपने नामरूपको छोड़कर समुद्रमें विलीन हो जाती है, वैसे ही विद्वान् ज्ञानी महात्मा नामरूपसे रहित होकर उत्तम-से-उत्तम दिव्य परम पुरुष परमात्माको प्राप्त हो जाता है ।’ इससे यह सिद्ध होता है कि उक्त प्रकरणमे जो जीवात्मा और मुख्यप्राण- का वर्णन हुआ है, वह सम्पूर्ण जगत्‌की उत्पत्ति और प्रलयका कारण केवल परब्रह्मको बतानेके लिये ही है। ऐसा औडुलोमि आचार्य मानते हैं। सम्बन्ध—अब काशकृत्स्न आचार्यका मत उपस्थित करते हैं— अवस्थितेरिति काशकृत्स्नः ॥ १ । ४ । २२ ॥ अवस्थितेः=प्रलयकालमें सम्पूर्ण जगत्‌की स्थिति उस परमात्मामे ही होती है, इसलिये ( उक्त प्रकरणमे जीव और मुख्यप्राणका वर्णन परब्रह्मको जगत्‌का

सूत्र २१-२३ ] अध्याय १ ९५

सूत्र २१-२३ ] अध्याय १ ९५ कारण सिद्ध करनेके लिये ही है)। इति=ऐसा; काशकृत्स्नः=काशकृत्स्न आचार्य मानते हैं। व्याख्या-प्रलयकालमे सम्पूर्ण जगत्की स्थिति परमात्मामे ही बतायी गयी है (प्र० उ० ४। ८-९); इससे भी यही सिद्ध होता है कि उक्त प्रसङ्गमे जो सुषुप्तिकालमे प्राज्ञ और जीवात्माका परमात्मामे विलीन होना बताया है, वह परब्रह्मको जगत्का कारण सिद्ध करनेके लिये ही है। सम्बन्ध-'वेदमे 'शक्ति' (श्वेता० ६। ८), 'अजा' (श्वेता० १। ९ तथा ४। ५), 'माया' (श्वेता० ४। १०) तथा 'प्रधान' (श्वेता० १। १०) आदि नामोसे जिसका वर्णन किया गया है, उसीको ईश्वरकी अध्यक्षता- मे जगत्‌का कारण बताया गया है। गीता आदि स्मृतियोमे भी ऐसा ही वर्णन है (गीता ९। १०)। इससे यह स्पष्ट सिद्ध होता है कि जगत्‌का निमित्त कारण अर्थात् अधिष्ठाता, नियामक, संचालक तथा रचयिता तो अवश्य ही ईश्वर है; परन्तु उपादान-कारण 'प्रकृति' तथा 'माया' नामसे कहा हुआ 'प्रधान' ही है।' ऐसा मान लें तो क्या आपत्ति है? इसपर कहते हैं— प्रकृतिश्च प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात् ॥ १ । ४ । २३ ॥ प्रकृतिः=उपादान कारण; च=भी (ब्रह्म ही है), प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरो- धात्=क्योकि ऐसा माननेसे ही श्रुतिमे आये हुए प्रतिज्ञा-वाक्य तथा दृष्टान्त-वाक्य बाधित नहीं होगे। व्याख्या-श्वेतकेतुके उपाख्यानमे उसके पिताने श्वेतकेतुसे पूछा है कि 'उत तमादेशमप्राक्ष्यो येनाश्रुतं श्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातम्।' (छा० उ० ६। १। २-३) अर्थात् 'क्या तुमने अपने गुरुसे उस तत्त्वके उपदेश- के लिये भी जिज्ञासा की है, जिसके जाननेसे बिना सुना हुआ सुना हुआ हो- जाता है, बिना मनन किया मनन किया हुआ हो जाता है तथा बिना जाना हुआ जाना हुआ हो जाता है?' यह सुनकर श्वेतकेतुने अपने पितासे पूछा— 'भगवन् ! वह उपदेश कैसा है?' तब उसके पिताने दृष्टान्त देकर समझाया— 'यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्यात्।' (छा० उ० ६। १। ४) अर्थात् 'जिस प्रकार एक मिट्टीके ढेलेका तत्व जान लेनेपर मिट्टीकी बनी सब वस्तु जानी हुई हो जाती है कि 'यह सब मिट्टी है।' इसके बाद आरुणिने इसी

९६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ प्रकार सोने और लोहेका भी दृष्टान्त दिया है। यहाँ पहले जो पिताने प्रश्न किया है, वह तो प्रतिज्ञा-वाक्य है, और मिट्टी आदिके उदाहरणसे जो समझाया गया है, वह दृष्टान्त-वाक्य है। यदि ब्रह्मसे भिन्न 'प्रधान'को यहाँ उपादान कारण मान लिया जाय तो उसके एक अंशको जाननेपर प्रधानका ही ज्ञान होगा, ब्रह्म- का ज्ञान नहीं होगा। परंतु वहाँ ब्रह्मका ज्ञान कराना अभीष्ट है, अतः प्रतिज्ञा और दृष्टान्तकी सार्थकता भी जगत्का उपादान कारण ब्रह्मको माननेसे ही हो सकती है। मुण्डकोपनिषद् ( १ । १ । २ तथा १ । १ । ७) मे भी इसी प्रकार प्रतिज्ञा-वाक्य और दृष्टान्त-वाक्य मिलते हैं। बृहदारण्यकोपनिषद् ( ४ । ५ । ६, ८) में भी प्रतिज्ञा तथा दृष्टान्तपूर्वक उपदेश मिलता है। उन सब स्थलोंमें भी उनकी सार्थकता पूर्ववत् ब्रह्मको जगत्का कारण माननेसे ही हो सकती है; यह समझ लेना चाहिये। श्वेताश्वतरोपनिषद् आदिमे अजा, माया, शक्ति और प्रधान आदि नामोंसे जिसका वर्णन है, वह कोई स्वतन्त्र तत्त्व नहीं है। वह तो भगवान्‌के अधीन रहनेवाली उन्हींकी शक्तिविशेषका वर्णन है। यह बात वहाँके प्रकरणको देखने- से स्वतः स्पष्ट हो जाती है। आगे-पीछेके वर्णनपर विचार करनेसे भी यही सिद्ध होता है। श्वेताश्वतरोपनिषद्‌मे यह स्पष्ट कहा गया है कि 'उस परमेश्वरकी ज्ञान, बल और क्रियारूप नाना प्रकारकी दिव्य शक्तियाँ स्वाभाविक सुनी जाती हैं, ( ६ । ८)* तथा उस परमेश्वरका उससे भिन्न कोई कार्यकारण ( शरीर-इन्द्रिय आदि ) नहीं हैं।' ( ६ । ८ )† इससे भी यही सिद्ध होता है कि उस परमेश्वरकी शक्ति उससे भिन्न नहीं है। अग्निके उष्णत्व और प्रकाश- की भाँति उसका वह स्वभाव ही है। इसीलिये परमात्माको बिना मन और इन्द्रियोंके उन सबका कार्य करनेमे समर्थ कहा गया है। (श्वेता० ३।१९)‡

  • यह मन्त्र पृष्ठ २ की टिप्पणीमे आया है। † 'न तस्य कार्यं करणं च विद्यते।' ‡ अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः। स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम् ॥ 'वह परमात्मा हाथ-पैरसे रहित होकर भी समस्त वस्तुओंको ग्रहण करनेवाला तथा वेगपूर्वक गमन करनेवाला है। आँखोंके बिना ही सब कुछ देखता है, बिना कानोंके ही सब कुछ सुनता है, जाननेमें आनेवाली सब वस्तुओंको जानता है, परंतु उसको जाननेवाला कोई नहीं है। ज्ञानीजन उसे महान् आदिपुरुष कहते हैं।'

सूत्र २४ ] अध्याय १ ९७

सूत्र २४ ] अध्याय १ ९७ भगवद्गीतामें भी भगवान्‌ने जड प्रकृतिको सांख्योंकी भाँति जगत्‌का उपादान कारण नहीं बताया है; किन्तु अपनी अध्यक्षतामे अपनी ही स्वरूपभूता प्रकृतिको चराचर जगत्‌की उत्पत्ति करनेवाली कहा है ( गीता ९ । १० ) । जड प्रकृति जड और चेतन दोनोंका उपादान कारण किसी प्रकार भी नहीं हो सकती । अतः इस वर्णनमे प्रकृतिको भगवान्‌की स्वरूपभूता शक्ति ही समझना चाहिये । इसके सिवा, भगवान्‌ने सातवें अध्यायमे परा और अपरा नामसे अपनी दो प्रकृतियोंका वर्णन करके ( ७ । ४-५ ) अपनेको समस्त जड-चेतनात्मक जगत्‌का प्रभव और प्रलय बताते हुए ( ७ । ६ ) सबका महाकारण बताया है ( ७ । ७ ) । अतः श्रुतियो और स्मृतियोके वर्णनसे यही सिद्ध होता है कि वह परब्रह्म परमेश्वर ही जगत्‌का उपादान और निमित्त कारण है। सम्बन्ध—इसी बातको सिद्ध करनेके लिये फिर कहते हैं— अभिध्योपदेशाच्च ॥ १ । ४ । २४ ॥ अभिध्योपदेशात् = अभिध्या—चिन्तन अर्थात् संकल्पपूर्वक सृष्टि-रचनाका श्रुतिमें वर्णन होनेसे; च = भी ( यही सिद्ध होता है कि जगत्‌का उपादान कारण ब्रह्म ही है ) । व्याख्या—श्रुतिमे जहाँ सृष्टिरचनाका प्रकरण है, वहाँ स्पष्ट कहा गया है कि ‘सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेय’ ( तै० उ० २ । ६ ) अर्थात् ‘उसने सकल्प किया कि मैं एक ही बहुत हो जाऊँ, अनेक रूपोंमे प्रकट होऊँ।’ तथा ‘तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेय’ ( छा० उ० ६ । २ । ३ ) ‘उसने ईक्षण—सकल्प किया कि मै बहुत होऊँ, अनेक रूपोमे प्रकट हो जाऊँ।’ इस प्रकार अपनेको ही विविध रूपोंमें प्रकट करनेका संकल्प लेकर सृष्टिकर्ता परमात्माके सृष्टिरचनामें प्रवृत्त होनेका वर्णन श्रुतियोंमें उपलब्ध होता है । इससे भी यही सिद्ध होता है कि परब्रह्म परमेश्वर स्वयं ही जगत्‌का उपादान कारण है । इसके सिवा, श्रुतिमे यह भी कहा गया है कि ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत ।’ ( छा० उ० ३ । १४ । १ ) अर्थात् ‘निश्चय ही यह सब कुछ ब्रह्म है; क्योकि उससे उत्पन्न होता, उसीमे स्थित रहता तथा अन्तमे उसीमे लीन होता है, इस प्रकार शान्तचित्त होकर उपासना ( चिन्तन ) करे।’ इससे भी उपर्युक्त बातकी ही सिद्धि होती है । वे० द० ७—

९८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ सम्बन्ध—उक्त मतकी पुष्टिके लिये सूत्रकार कहते हैं— साक्षाच्चोभयाम्नानात् ॥ १ । ४ । २५ ॥ साक्षात्=श्रुति साक्षात् अपने वचनोंद्वारा; च=भी; उभयाम्नानात्= ब्रह्मके उभय ( उपादान और निमित्त ) कारण होनेकी बात दुहराती है, इससे भी ( ब्रह्म ही उपादान कारण सिद्ध होता है, प्रकृति नहीं ) । व्याख्या—श्वेताश्वतरोपनिषद्मे इस प्रकार वर्णन आता है—‘एक समय कुछ महर्षि यह विचार करनेके लिये एकत्र हुए कि जगत्का कारण कौन है ? हम किससे उत्पन्न हुए हैं ? किससे जी रहे हैं ? हमारी स्थिति कहाँ है ? हमारा अधिष्ठाता कौन है ? कौन हमें नियमपूर्वक सुख-दुःखमे नियुक्त करता है ? उन्होने सोचा, कोई कालको, कोई स्वभावको, कोई कर्मको, कोई होनहार- को, कोई पाँचो महाभूतोंको, कोई उनके समुदायको कारण मानते हैं, इनमे ठीक-ठीक कारण कौन है ? यह निश्चय करना चाहिये । फिर उनके मनमे यह विचार उठा कि इनमेसे एक या इनका समुदाय जगत्का कारण नहीं हो सकता; क्योकि ये चेतनके अधीन हैं, स्वतन्त्र नहीं है । तथा जीवात्मा भी कारण नहीं हो सकता; क्योकि वह सुख-दुःखका भोक्ता और पराधीन है ।* फिर उन्होने ध्यानयोगमे स्थित होकर उस परमदेव परमेश्वरकी अपने गुणोंसे छिपी हुई अपनी ही स्वरूपभूता शक्तिका दर्शन किया; जो परमेश्वर अकेला ही पूर्वोक्त कालसे लेकर आत्मातक समस्त कारणोंपर शासन करता है ।† उपर्युक्त वर्णनमे स्पष्ट ही उस परमात्माको सबका उपादान कारण और सञ्चालक ( निमित्त कारण ) बताया है । इसके सिवा, इसी उपनिषद्के २ । १६ मे तथा दूसरे-दूसरे उपनिषदोमे भी जगह-जगह उस परमात्माको सर्वरूप कहा है । इससे भी यही सिद्ध होता है कि वह परब्रह्म परमेश्वर ही इस जगत्का उपादान और निमित्त कारण है ।

  • किं कारणं ब्रह्म कुतः स्म जाता जीवाम केन क्व च सम्प्रतिष्ठाः । अधिष्ठिताः केन सुखेतरेषु वर्तामहे ब्रह्मविदो व्यवस्थाम् ॥ कालः स्वभावो नियतिर्यदृच्छा भूतानि योनिः पुरुष इति चिन्त्या । संयोग एषां न त्वात्मभावादात्माप्यनीशः सुखदुःखहेतोः ॥ ( श्वेता० १ । १-२ ) † यह मन्त्र पृष्ठ ८० मे आ गया है ।

सूत्र २५-२७] अध्याय १ ७९

सूत्र २५-२७] अध्याय १ ७९ सम्बन्ध-अब उक्त बातकी सिद्धिके लिये ही दूसरा प्रमाण देते हैं- आत्मकृतेः ॥ १ । ४ । २६ ॥ आत्मकृतेः = स्वयं अपनेको जगतरूपमें प्रकट करनेका वर्णन होनेसे (ब्रह्म ही जगत्का उपादान कारण सिद्ध होता है) । व्याख्या-तैत्तिरीयोपनिषद् (२ । ७) में कहा है कि 'प्रकट होनेसे पहले यह जगत् अव्यक्तरूपमें था, उसीसे ही यह प्रकट हुआ है, उस परब्रह्म परमेश्वर- ने स्वयं अपनेको ही इस जगत्के रूपमें प्रकट किया।' इस प्रकार कर्त्ता और कर्मके रूपमें उस एक ही परमात्माका वर्णन होनेसे स्पष्ट ही श्रुतिका यह कथन हो जाता है कि ब्रह्म ही इसका निमित्त और उपादान कारण है । सम्बन्ध-यहाँ यह शङ्का होती है कि परमात्मा तो पहलेसे ही नित्य कर्त्तारूपमें स्थित है, वह कर्म कैसे हो सकता है ? इसपर कहते हैं- परिणामात् ॥ १ । ४ । २७ ॥ परिणामात् = श्रुतिमें उनके जगतरूपमें परिणत होनेका वर्णन होनेसे (यही मानना चाहिये कि वह ब्रह्म ही इस जगत्का कर्त्ता है और वह स्वयं ही इस रूपमें बना है) । व्याख्या-तैत्तिरीयोपनिषद् (२ । ६) में कहा है कि 'तत्सृष्ट्वा तदेवानु- प्राविशत् । तदनुप्रविश्य सच त्यच्चाभवत् । निरुक्तं चानिरुक्तं च । निलयनं चा- निलयनं च । विज्ञानं चाविज्ञानं च । सत्यं चानृतं च । सत्यमभवत् । यदिदं किञ्च । तत्सत्यमित्याचक्षते ।' अर्थात् 'उस जगत्की रचना करनेके अनन्तर वह परमात्मा स्वयं उसमें साथ-साथ प्रविष्ट हो गया । उसमें प्रविष्ट होकर वह स्वयं ही सत् (मूर्त्त) और त्यत् (अमूर्त्त) भी हो गया । बतानेमें आनेवाले और न आनेवाले, आश्रय देनेवाले और न देनेवाले तथा चेतन और जड, सत्य और मिथ्या इन सबके रूपमें सत्यस्वरूप परमात्मा ही हो गया । जो कुछ भी यह दीखता और अनुभवमें आता है, वह सत्य ही है, इस प्रकार ज्ञानीजन कहते हैं।' इस प्रकार श्रुतिने परब्रह्म परमात्माके ही सब रूपोंमें परिणत होनेका प्रतिपादन किया है; इसलिये वही इस जगत्का उपादान और निमित्त कारण है । परिणाम- का अर्थ यहाँ विकार नहीं है । जैसे सूर्य अपनी अनन्त किरणोंका सब ओर प्रसार करते हैं, उसी प्रकार परमेश्वर अपनी अनन्त-अचिन्त्य ऐश्वर्यशक्तियोंका