ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 114, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र १८—२०] अध्याय १ ९३ था, जो हृदयके भीतर है। उस समय इसका नाम 'स्वपिति' होता है।' इत्यादि। इस वर्णनमें आया हुआ 'आकाश' शब्द परमात्माका वाचक है। अतः यह सिद्ध होता है कि यहाँ सुषुप्तिके दृष्टान्तसे यह बात समझायी गयी है कि जिस प्रकार यह जीवात्मा निद्राके समय समस्त प्राणोंके सहित परमात्मामे विलीन-सा हो जाता है, उसी प्रकार प्रलयकालमे यह जड-चेतनात्मक समस्त जगत् परब्रह्ममे विलीन हो जाता है; तथा सृष्टिकालमे जाग्रत्की भाँति पुनः प्रकट हो जाता है। सम्बन्ध—आचार्य जैमिनि अपने मतकी पुष्टिके लिये दूसरी युक्ति देते हैं— वाक्यान्वयात् ॥ १ । ४ । १९ ॥ वाक्यान्वयात् = पूर्वापर वाक्योके समन्वयसे ( भी उस प्रकरणमे आये हुए जीव और मुख्यप्राणके लक्षणोका प्रयोग दूसरे ही प्रयोजनसे हुआ है, यह सिद्ध होता है)। व्याख्या—प्रकरणके आरम्भ (कौ० उ० ४ । १८) मे ब्रह्मको जानने योग्य बताकर अन्तमे उसीको जाननेवालेकी महिमाका वर्णन किया गया है। (कौ० उ० ४ । २०)। इस प्रकार पूर्वापरके वाक्योका समन्वय करनेसे यही सिद्ध होता है कि बीचमे आया हुआ जीवात्मा और मुख्यप्राणका वर्णन भी उस परब्रह्म परमात्माको ही जगत्का कारण सिद्ध करनेके लिये है। सम्बन्ध—इसी विषयमे आश्मरथ्य आचार्यका मत उपस्थित करते हैं— प्रतिज्ञासिद्धेर्लिङ्गमाश्मरथ्यः ॥ १ । ४ । २० ॥ लिङ्गम् = उक्त प्रकरणमे जीवात्मा और मुख्यप्राणके लक्षणोका वर्णन, ब्रह्मको ही जगत्का कारण बतानेके लिये हुआ है; प्रतिज्ञासिद्धेः = क्योकि ऐसा माननेमे ही पहले की हुई प्रतिज्ञाकी सिद्धि होती है; इति = ऐसा; आश्मरथ्यः = आश्मरथ्य आचार्य मानते हैं। व्याख्या—आश्मरथ्य आचार्यका कहना है कि अजातशत्रुने जो यह प्रतिज्ञा की थी कि "ब्रह्म ते ब्रवाणि—" 'तुझे ब्रह्मका स्वरूप बताऊँगा।' उसकी सिद्धि परब्रह्मको ही जगत्का कारण माननेसे हो सकती है, इसलिये उस प्रसङ्गमें जो जीवात्मा तथा मुख्य प्राणके लक्षणोका वर्णन आया है, वह इसी बातको सिद्ध करनेके लिये है कि जगत्का कारण परब्रह्म परमात्मा ही है।