ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 115, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ें९४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ सम्बन्ध—अब इसी विषयमें आचार्य औडुलोमिका मत दिया जाता है— उत्क्रमिष्यत एवं भावादित्यौडुलोमिः ॥ १ । ४ । २१॥ उत्क्रमिष्यतः=शरीर छोड़कर परलोकमे जानेवाले ब्रह्मज्ञानीका; एवं भावात्=इस प्रकार ब्रह्ममे विलीन होना ( दूसरी श्रुतिमे भी बताया गया ) है; इसलिये; ( यहाँ जीवात्मा और मुख्यप्राणका वर्णन, परब्रह्मको ही जगत्का कारण बतानेके लिये है; इति=ऐसा; औडुलोमिः=औडुलोमि आचार्य मानते हैं। व्याख्या—जिस प्रकार इस प्रकरणमे सोते हुए मनुष्यके समस्त प्राणोंसहित जीवात्माका परमात्मामे विलीन होना बताया गया है, इसी प्रकार शरीर छोड़कर ब्रह्मलोकमे जानेवाले ब्रह्मज्ञानीकी गतिका वर्णन करते हुए मुण्डकोपनिषद्मे कहा गया है कि— गताः कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठा देवाश्च सर्वे प्रतिदेवतासु । कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मा परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति ॥ यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रेऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय । तथा विद्वान् नामरूपाद् विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ ( ३ । २ । ७-८ ) ‘ब्रह्मज्ञानी महापुरुषका जब देहपात होता है, तब पंद्रह कलाएँ और सम्पूर्ण देवता अपने-अपने कारणभूत देवताओमे आकर स्थित हो जाते हैं; फिर समस्त कर्म और विज्ञानमय जीवात्मा ये सब-के-सब परम अविनाशी ब्रह्ममें एक हो जाते हैं; जिस प्रकार बहती हुई नदियाँ अपने नामरूपको छोड़कर समुद्रमें विलीन हो जाती है, वैसे ही विद्वान् ज्ञानी महात्मा नामरूपसे रहित होकर उत्तम-से-उत्तम दिव्य परम पुरुष परमात्माको प्राप्त हो जाता है ।’ इससे यह सिद्ध होता है कि उक्त प्रकरणमे जो जीवात्मा और मुख्यप्राण- का वर्णन हुआ है, वह सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति और प्रलयका कारण केवल परब्रह्मको बतानेके लिये ही है। ऐसा औडुलोमि आचार्य मानते हैं। सम्बन्ध—अब काशकृत्स्न आचार्यका मत उपस्थित करते हैं— अवस्थितेरिति काशकृत्स्नः ॥ १ । ४ । २२ ॥ अवस्थितेः=प्रलयकालमें सम्पूर्ण जगत्की स्थिति उस परमात्मामे ही होती है, इसलिये ( उक्त प्रकरणमे जीव और मुख्यप्राणका वर्णन परब्रह्मको जगत्का