भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

पृष्ठ 109, कुल 417 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 109

८८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ सम्बन्ध- "माध्यन्दिनी शाखावालोंके पाठके अनुसार 'प्राणस्य प्राणम्' इत्यादि मन्त्रमें अन्नका भी वर्णन होनेसे प्राण, चक्षु, श्रोत्र, मन और अन्नको लेकर पाँचकी संख्या पूर्ण हो जाती है; परन्तु काण्वशाखाके मन्त्रमें 'अन्न'का वर्णन नहीं है; अतः वहाँ उस परमेश्वरकी पञ्चविध कार्यशक्तियोंकी संख्या कैसे पूरी होगी ?" ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं— ज्योतिषैकेषामसत्यन्ने ॥ १ । ४ । १३ ॥ एकेषाम्=एक शाखावालोंके पाठमे; अन्ने=अन्नका वर्णन; असति= न होनेपर; ज्योतिषा=पूर्ववर्णित 'ज्योति'के द्वारा ( संख्या-पूर्ति की जा सकती है)। व्याख्या—'माध्यन्दिनी' शाखावालोंके पाठके अनुसार इस मन्त्रमें ब्रह्मको 'प्राणका प्राण' आदि बताते हुए 'अन्नका अन्न' भी कहा गया है । अतः उनके पाठानुसार यहाँ पाँचकी संख्या पूर्ण हो जाती है । परन्तु काण्वशाखावालोंके पाठमे 'अन्नस्य अन्नम्' इस अंशका ग्रहण नहीं हुआ है; अतः उनके अनुसार चारका ही वर्णन होनेपर पाँचकी संख्या-पूर्तिमें एककी कमी रह जाती है। अतः सूत्रकार कहते हैं कि काण्वशाखाके पाठमें अन्नका ग्रहण न होनेसे जो एककी कमी रहती है, उसकी पूर्ति ४ । ४ । १६ के मन्त्रमे वर्णित 'ज्योति' के द्वारा कर लेनी चाहिये । वहाँ उस ब्रह्मको 'ज्योतिकी भी ज्योति' बताया गया है । सत्रहवें मन्त्रका वर्णन तो सङ्केतमात्र है, इसलिये उसमे पाँच संख्याकी पूर्ति करना आवश्यक नहीं है, तो भी ग्रन्थकारने किसी प्रकार भी प्रसङ्गवश उठनेवाली शङ्काका निराकरण करनेके लिये यह सूत्र कहा है । सम्बन्ध—यहाँ यह शङ्का होती है कि 'श्रुतियोंमें जगत्‌के कारणका अनेक प्रकारसे वर्णन आया है । कहीं सत्‌से सृष्टि बतायी गयी है, कहीं असत्‌से । तथा जगत्‌की उत्पत्तिके क्रममें भी भेद है । कहीं पहले आकाशकी उत्पत्ति बतायी है, कहीं तेजकी, कहीं प्राणकी और कहीं अन्य किसीकी । इस प्रकार वर्णनमें भेद होनेसे वेदवाक्योंद्वारा यह निश्चित नहीं किया जा सकता कि जगत्‌का कारण केवल परब्रह्म परमेश्वर ही है तथा सृष्टिका क्रम अमुक प्रकारका ही है । इसपर कहते हैं— कारणत्वेन चाकाशादिषु यथाव्यपदिष्टोक्तेः ॥ १ । ४ । १४ ॥