भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

पृष्ठ 108, कुल 417 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 108

सूत्र १०—१२ ] अध्याय १ ८९ 'जिसमें पाँच पञ्चजन और आकाश भी प्रतिष्ठित है, उसी आत्माको मृत्युसे रहित मैं विद्वान् अमृतस्वरूप ब्रह्म मानता हूँ।'—इस मन्त्रमे जो संख्यावाचक 'पञ्च-पञ्च' शब्द आये है, इनको लेकर पचीस तत्त्वोंकी कल्पना करना उचित नहीं है; क्योकि यहाँ ये संख्यावाचक शब्द दूसरे-दूसरे भावको व्यक्त करनेवाले हैं। इसके सिवा, 'पञ्च-पञ्च'से पचीस संख्या माननेपर भी उक्त मन्त्रमे वर्णित आकाश और आत्माको लेकर सत्ताईस तत्त्व होते है; जो सांख्यमतकी निश्चित गणनासे अधिक हो जाते है। अतः यही मानना ठीक है कि वेदमे न तो सांख्यसम्मत स्वतन्त्र 'प्रधान'का वर्णन है और न पचीस तत्त्वोका ही। जिस प्रकार श्वेताश्वतरोपनिषद्मे 'अजा' शब्दसे उस परब्रह्म परमेश्वरकी अनादि शक्तिका वर्णन किया गया है, उसी प्रकार यहाँ 'पञ्च पञ्चजनाः' पदोके द्वारा परमेश्वरकी अनेकविध कार्य-शक्तियोका वर्णन है। सम्बन्ध—तब फिर यहाँ 'पञ्च पञ्चजनाः' पदोंके द्वारा किनका ग्रहण होता है ? ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं— प्राणादयो वाक्यशेषात् ॥ १ । ४ । १२ ॥ वाक्यशेषात् = बादवाले मन्त्रमे कहे हुए वाक्यसे; प्राणादयः = ( यहाँ ) प्राण और इन्द्रियाँ ही ग्रहण करने योग्य है। व्याख्या—उपर्युक्त मन्त्रके बाद आया हुआ मन्त्र इस प्रकार है—'प्राणस्य प्राणमुत चक्षुषश्चक्षुरुत श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो ये मनो विदुः । ते निचिक्युर्ब्रह्म पुराणमग्र्यम्।' ( ४ । ४ । १८ ) अर्थात् 'जो विद्वान् उस प्राणके प्राण, चक्षुके चक्षु, श्रोत्रके श्रोत्र तथा मनके भी मनको जानते है, वे उस आदि पुराण-पुरुष परमेश्वरको जानते है।' इसके वर्णनसे यह सिद्ध होता है कि पूर्वमन्त्रमे 'पञ्च पञ्चजनाः' पदोके द्वारा पञ्च प्राण, पञ्च ज्ञानेन्द्रिय, पञ्च कर्मेन्द्रिय, मन तथा बुद्धि आदि परमेश्वरकी कार्यशक्तियोका ही वर्णन है; क्योकि उस ब्रह्मको ही उक्त मन्त्रमे प्राणका प्राण, चक्षुका चक्षु, श्रोत्रका श्रोत्र तथा मनका भी मन कहा गया है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि उस परब्रह्मके सम्बन्धसे ही प्राण आदि अपना कार्य करनेमे समर्थ होते है, इसलिये यहाँ इनके रूपमे उसीकी शक्तिविशेषका विस्तार बताया गया है।