भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

पृष्ठ 107, कुल 417 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 107

८६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ लाल, सफेद और काला-ये तीन रंगके रूप बताये गये हैं ?'' ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं- कल्पनोपदेशाच्च मध्वादिवदविरोधः ॥ १ । ४ । १० ॥ कल्पनोपदेशात् =यहाँ 'अजा'का रूपक मानकर उसके त्रिविध रूपोंकी कल्पनापूर्वक उपदेश किया गया है, इसलिये; च=भी; मध्वादिवत्=मधु आदि- की भाँति; अविरोधः=कोई विरोध नहीं है। व्याख्या-जैसे छान्दोग्य ( ३ । १ ) मे रूपककी कल्पना करते हुए, जो वास्तवमे मधु नहीं, उस सूर्यको मधु कहा गया है। बृहदारण्यकमे वाणीको, धेनु न होनेपर भी, धेनु कहा गया है ( बृह० उ० ५ । ८ । १ ), तथा द्युलोक आदिको अग्नि बताया गया है (बृह० उ० ६ । २ । ९ )। इसी प्रकार यहाँ भी रूपककी कल्पनामे भगवान्‌की शक्तिभूता प्रकृतिको 'अजा' नाम देकर उसके लाल, सफेद और काले तीन रंग बताये गये हैं; इसलिये कोई विरोध नहीं है। जिज्ञासुको समझानेके लिये रूपककी कल्पना करके वर्णन करना उचित ही है। सम्बन्ध-“पूर्व प्रकरणमे यह बात सिद्ध की गयी कि श्रुतिमें आया हुआ 'अजा' शब्द सांख्यशास्त्रोक्त त्रिगुणात्मिका प्रकृतिका नहीं, परब्रह्म परमात्माकी स्वरूपभूता अनादि शक्तिका वाचक है। किन्तु दूसरी श्रुतिमें 'पञ्चपञ्च' यह संख्यावाचक शब्द पाया जाता है। इससे यह धारणा होती है कि यहाँ सांख्योक्त पचीस तत्त्वोंका ही समर्थन किया गया है। ऐसी दशामें 'अजा' शब्द भी सांख्य- सम्मत मूल प्रकृतिका ही वाचक क्यों न माना जाय ?'' इस शङ्काका निराकरण करनेके लिये कहते हैं- न संख्योपसंग्रहादपि नानाभावादतिरेकाच्च ॥ १ । ४ । ११ ॥ संख्योपसंग्रहात् =( श्रुतिमे ) संख्याका ग्रहण होनेसे; अपि=भी; न=वह ( सांख्यमतोक्त तत्त्वोकी ) गणना नहीं है; नानाभावात् =क्योकि वह संख्या दूसरे-दूसरे अनेक भाव व्यक्त करनेवाली है; च=तथा; अतिरेकात्=( वहाँ ) उससे अधिकका भी वर्णन है। व्याख्या-बृहदारण्यकोपनिषद्‌में कहा गया है कि- यस्मिन् पञ्च पञ्चजना आकाशश्च प्रतिष्ठितः । तमेव मन्य आत्मानं विद्वान् ब्रह्मामृतोऽमृतम् ॥ (४ । ४ । १७)