ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र ११-१३] अध्याय ३ २६३
सूत्र ११-१३] अध्याय ३ २६३ प्रियशिरस्त्वाद्यप्राप्तिरुपचयापचयौ हि भेदे ॥ ३ । ३ । १२ ॥ प्रियशिरस्त्वाद्यप्राप्तिः= 'प्रियशिरस्त्व'—'प्रियरूप सिरका होना' आदि धर्मोंकी प्राप्ति अन्यत्र ब्रह्मविद्याके प्रकरणमे नहीं होती है; हि=क्योकि; भेदे=इस प्रकार सिर आदि अङ्गोका भेद मान लेनेपर; उपचयापचयौ=ब्रह्ममे बढ़ने-घटने- का दोष उपस्थित होगा । व्याख्या—प्रिय उसका सिर है, मोद और प्रमोद पाँख है, इस प्रकार पक्षी- का रूपक देकर जो अङ्गोकी कल्पना की गयी है, यह ब्रह्मका स्वरूपगत धर्म नहीं है; अतः इसका संग्रह दूसरी जगह ब्रह्मविद्याके प्रसङ्गमे करना उचित नहीं है; क्योकि इस प्रकार अङ्ग-प्रत्यङ्गके भेदसे ब्रह्ममे भेद मान लेनेपर उसमे बढ़ने-घटने- के दोषकी आशङ्का होगी; इसलिये जो ब्रह्मके स्वाभाविक लक्षण न हो, किसी रूपकके उद्देश्यसे कहे गये हो, उनको दूसरी जगह नहीं लेना चाहिये । सम्बन्ध—उसमें जो आनन्द और ब्रह्म शब्द आये हैं, उनको दूसरी जगह लेना चाहिये या नहीं ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— इतरे त्वर्थसामान्यात् ॥ ३ । ३ । १३ ॥ तु=किन्तु; इतरे=दूसरे जो आनन्द आदि धर्म हैं वे (ब्रह्मके स्वरूपका प्रतिपादन करनेके लिये श्रुतिमें कहे गये हैं, इसलिये अन्यत्र ब्रह्मविद्याके प्रसङ्गमें उनका ग्रहण किया जा सकता है); अर्थसामान्यात्=क्योंकि उन सब स्थलोंमे अर्थकी समानता है । व्याख्या—रूपकके लिये अवयवकी कल्पनासे युक्त जो प्रियशिरस्त्व आदि धर्म हैं, उनको छोड़कर दूसरे-दूसरे जो आनन्द आदि स्वरूपगत धर्म हैं, उनका संग्रह प्रत्येक ब्रह्मविद्याके प्रसङ्गमे किया जा सकता है; क्योकि उनमे अर्थकी समानता है अर्थात् उन सबके द्वारा प्रतिपाद्य ब्रह्म एक ही है। सम्बन्ध—कठोपनिषद्में जो रथके रूपककी कल्पना करके इन्द्रिय आदिका घोड़े आदिके रूपमें वर्णन किया है, वहाँ तो इन्द्रिय आदि- के संयमकी बात समझानेके लिये वैसा कहना सार्थक मालूम होता है, परन्तु यहाँ तो पक्षीके रूपकका कोई विशेष प्रयोजन नही दीखता । अतः यहाँ इस रूपककी कल्पना किसलिये की गयी ? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
२६४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ आध्यानाय प्रयोजनाभावात् ॥ ३ । ३ । १४॥ प्रयोजनाभावात्=अन्य किसी प्रकारका प्रयोजन न होनेके कारण (यही मालूम होता है कि); आध्यानाय=उस परमेश्वरका भलीभाँति चिन्तन करनेके लिये (उसका तत्त्व रूपकद्वारा समझाया गया है)। व्याख्या—इस रूपकका दूसरा कोई प्रयोजन दिखलायी नहीं देता, इसलिये यही समझना चाहिये कि पहले जिस परब्रह्म परमेश्वरका सत्य, ज्ञान और अनन्तके नामसे वर्णन करके उसको सबके हृदयमें स्थित बतलाया है और उसकी प्राप्तिके महत्त्वका वर्णन किया है (तै० उ० २ । १)। उसको प्राप्त करनेका एकमात्र उपाय बारम्बार चिन्तन करना है पर उसके स्वरूपकी कुछ जानकारी हुए बिना चिन्तन नहीं हो सकता; अतः वह किस प्रकार सबके हृदयमे व्यास है, यह बात समझानेके लिये यहाँ अन्नमय आदि कोशवाचक शब्दोके द्वारा प्रकरण उठाया गया; क्योकि किसी पेटीमे बंद करके गुप्त रखे हुए रत्नकी भाँति वह परमेश्वर भी सबके हृदयमें बुद्धिरूप गुफाके भीतर छिपा है; यह तत्त्व समझाना है। वहाँ सबसे पहले जो यह अन्नमय स्थूल शरीर है, इसको पुरुषके नामसे कहकर उसके अंगोंकी पक्षीके अंगोसे तुलना करके आगेका प्रकरण चलाया गया, तथा क्रमशः एकका दूसरेको अन्तरात्मा बताते हुए प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय पुरुषका वर्णन किया गया। साथ ही प्रत्येकका आत्मा एक ही तत्त्वको निश्चित किया गया। इससे यह मालूम होता है कि उत्तरोत्तर सूक्ष्म तत्त्वके भीतर दृष्टि ले जाकर उस एक ही अन्तरात्माको लक्ष्य कराया गया है। वहाँ विज्ञानमय जीवात्माका वर्णन करके उसका भी अन्तरात्मा आनन्दमयको बतलाया। अन्तमे सबका अन्तरात्मा आनन्दमयको बतलाकर तथा उसका अन्तरात्मा भी उसीको बतलाकर इस रूपककी परम्पराको समाप्त कर दिया गया। इससे यही सिद्ध, होता है कि परब्रह्म परमेश्वरका भलीभाँति चिन्तन करनेके लिये उसके सूक्ष्म तत्त्वको समझाना ही इस रूपकका प्रयोजन है। सम्बन्ध—यहाँ आनन्दमय नामसे परमात्माको ही लक्ष्य कराया गया है, अन्य किसी तत्त्वको नहीं, यह निश्चय कैसे हो सकता है? इसपर कहते हैं— आत्मशब्दाच्च ॥ ३ । ३ । १५ ॥
सूत्र १४—१७ ] अध्याय ३ २६५
सूत्र १४—१७ ] अध्याय ३ २६५ आत्मशब्दात्=आत्मशब्दका प्रयोग होनेके कारण; च=भी ( यह सिद्ध हो जाता है )। व्याख्या—ऊपर कहे हुए कारणके सिवा, इस प्रकरणमे बारम्बार सबका अन्तरात्मा बताते हुए अन्तमे विज्ञानमयका अन्तरात्मा आनन्दमयको बतलाया है, उसके बाद उसका अन्तरात्मा दूसरे किसीको नहीं बतलाया । इससे यह सिद्ध हो जाता है कि यहाँ आनन्दमय शब्द ब्रह्मका ही वाचक है । सम्बन्ध—'आत्मा' शब्दका प्रयोग तो अधिकतर प्रत्यगात्मा ( जीवात्मा ) का ही वाचक होता है । फिर यह निश्चय कैसे हुआ कि यहाँ 'आत्मा' शब्द ब्रह्मका वाचक है ? इसपर कहते हैं— आत्मगृहीतिरितरवदुत्तरात् ॥ ३ । ३ । १६ ॥ आत्मगृहीतिः=आत्मशब्दसे परमात्माका ग्रहण; इतरवत्=दूसरी जगहकी भाँति; उत्तरात्=उसके बादके वर्णनसे ( सिद्ध होता है )। व्याख्या—जिस प्रकार 'आत्मा वा इदमेकमेवाग्र आसीन्नान्यत् किञ्चन मिषत् स ईक्षत लोकान्नु सृजै', ( ऐ० उ० १ । १ ) 'पहले यह एक आत्मा ही था, उसने इच्छा की कि मै लोकोंकी रचना करूँ।' ( ऐ० उ० १ । १ । १ ) इस श्रुतिमे प्रजाकी सृष्टिके प्रकरणको लेकर 'आत्मा' शब्दका प्रयोग हुआ है, इसलिये यहाँ 'आत्मा' शब्दको ब्रह्मका वाचक माना गया । उसी प्रकार तैत्तिरीय- श्रुतिमे भी आनन्दमयका वर्णन करनेके बाद तत्काल ही 'सोऽकामयत बहु स्याम्'— 'उसने इच्छा की कि मै बहुत हो जाऊँ।' इत्यादि वाक्योद्वारा उस आनन्दमय आत्मासे समस्त जगत्की उत्पत्तिका वर्णन किया गया है । अतः बादमे आये हुए इस वर्णनसे ही यह सिद्ध हो जाता है कि यहाँ 'आत्मा' शब्द परमात्माका ही वाचक है और 'आनन्दमय' नाम भी यहाँ उस परब्रह्मका ही है । सम्बन्ध—ऊपर कही हुई बातमें पुनः शङ्का उपस्थित करके उसका उत्तर देते हुए पूर्वोक्त सिद्धान्तको दृढ़ करते हैं— अन्वयादिति चेत्स्यादवधारणात् ॥ ३ । ३ । १७ ॥ चेत्=यदि कहो कि; अन्वयात्=प्रत्येक वाक्यमें आत्मशब्दका अन्वय होनेके कारण यह सिद्ध नहीं होता कि आनन्दमय ब्रह्म है; इति=तो इसका उत्तर यह है कि;
२६६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ अवधारणात् = निर्धारित किये जानेके कारण; स्यात् = (आनन्दमय ही ब्रह्म है) यह बात सिद्ध होती है। व्याख्या—यदि कहो कि "तैत्तिरीयोपनिषद्की ब्रह्मवल्लीमे 'आत्मा' शब्दका प्रयोग तो सभी वाक्योके अन्तमे आया है, फिर केवल 'आत्मा' शब्दके प्रयोगसे 'आनन्दमय' को ही ब्रह्म कैसे मान लिया जाय ?" तो इसके उत्तरमें कहते हैं कि जिस 'आत्मा' शब्दकी सभी वाक्योंमें व्याप्ति है, वह ब्रह्मका वाचक नहीं है; अपितु अन्तमें जिसको निर्धारित कर दिया गया है, वह ब्रह्मका वाचक है। अन्नमय, प्राणमय आदि आत्माओंको शरीर और ब्रह्मको उनका अन्तरात्मा बतलानेके उद्देश्यसे वहाँ सबके साथ 'आत्मा' शब्दका प्रयोग किया गया है। इसीलिये अन्नमयका अन्तरात्मा उससे भिन्न प्राणमयको बतलाया; फिर प्राणमयका अन्तरात्मा उससे भिन्न मनोमयको बतलाया और मनोमयका अन्तरात्मा विज्ञानमयको तथा विज्ञानमयका भी अन्तरात्मा आनन्दमयको बतलाया। उसके बाद आनन्दमयका अन्तरात्मा अन्य किसीको नहीं बतलाया और अन्तमें यह निर्धारित कर दिया कि इसका शरीरसम्बन्धी आत्मा यह स्वयं ही है, जो कि पहले कहे हुए अन्य सब पुरुषोंका भी आत्मा है। यह कहकर उसीसे जगत्की उत्पत्तिका वर्णन किया। इस प्रकार यहाँ आनन्दमयको पूर्णरूपसे परमात्मा निश्चित कर दिया गया है। इसीसे यह सिद्ध होता है कि आनन्दमय शब्द परमात्माका वाचक है। सम्बन्ध—"इस प्रकरणमें आत्मासे आकाशादि भूतोंकी उत्पत्तिका वर्णन करने- के बाद पृथिवीसे ओषधि, ओषधिसे अन्न और अन्नसे पुरुषकी उत्पत्ति बतलायी, फिर कहा कि 'निश्चयपूर्वक वही यह पुरुष अन्नरसमय है।' इस वर्णनके अनुसार 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' इस वाक्यद्वारा बतलाया हुआ ब्रह्म ही यहाँ अन्नरसमय पुरुष है या उससे भिन्न ?" इस जिज्ञासापर कहते हैं— कार्याख्यानादपूर्वम् ॥ ३ । ३ । १८ ॥ कार्याख्यानात् = ब्रह्मका कार्य बतलाया जानेके कारण यह पुरुष; अपूर्वम् = वह पूर्वोक्त ब्रह्म नहीं हो सकता। व्याख्या—इस प्रकरणमें जिस अन्नरसमय पुरुषका वर्णन है, वह पूर्वोक्त परब्रह्म नहीं हो सकता, किन्तु अन्नका परिणामभूत यह सजीव मनुष्य-शरीर ही यहाँ
सूत्र १८-१९] अध्याय ३ २६७
सूत्र १८-१९] अध्याय ३ २६७ अन्नरसमय पुरुषके नामसे कहा गया है; क्योंकि इस पुरुषको उस पूर्वोक्त ब्रह्मका आकाशादिके क्रमसे कार्य बतलाया गया है और इसका अन्तरात्मा प्राण- मय आदिके क्रमसे विज्ञानमय जीवात्माको बतलाया है तथा विज्ञानमयका आत्मा ब्रह्मको बतलाकर अन्तमे आनन्दके साथ उसकी एकता की गयी है। इसलिये जिसके 'सत्य', 'ज्ञान' और 'अनन्त' ये लक्षण बताये गये है तथा जो 'आत्मा' और 'आनन्दमय' नामसे जगत्का कारण बतलाया गया है, वह ब्रह्म इस अन्नरसमय पुरुषसे भिन्न सबका अन्तरात्मा है। सम्बन्ध—ग्यारहवें सूत्रसे 'आनन्द' के प्रकरणका विचार आरम्भ करके अठारहवें सूत्रतक उस प्रकरणको समाप्त कर दिया गया। अब पहले आरम्भ किये हुए प्रकरणपर दूसरी श्रुतियोंके विषयमे विचार आरम्भ किया जाता है— समान एवं चाभेदात् ॥ ३ । ३ । १९ ॥ समाने=एक शाखामें; च=भी; एवम्=इसी प्रकार विद्याकी एकता समझनी चाहिये; अभेदात्=क्योंकि दोनों जगह उपास्यमे कोई भेद नहीं है। व्याख्या—वाजसनेयी शाखाके शतपथ-ब्राह्मणमे 'सत्य ही ब्रह्म है, इस प्रकार उपासना करनी चाहिये, निस्सन्देह यह पुरुष सङ्कल्पमय है। वह जितने सङ्कल्पों- से युक्त होकर इस लोकसे प्रयाण करता है, परलोकमे जानेपर वैसे ही सङ्कल्प- वाला होकर उत्पन्न होता है, वह मनोमय प्राण-शरीरवाले आकाशस्वरूप आत्माकी उपासना करे।' इस प्रकार शाण्डिल्य-विद्याका वर्णन किया गया है (श० ब्रा० १० । ६ । ३ । २)*। उसी शाखाके बृहदारण्यकमे भी कहा है कि 'प्रकाश ही जिसका सत्य स्वरूप है वह पुरुष मनोमय है, वह धान और जौ आदिके सदृश सूक्ष्म परिमाणवाला है, वह उस हृदयाकाशमे स्थित है, वह सबका स्वामी और सबका अधिपति है तथा यह जो कुछ है, सभीकां उत्तम शासन करता है।' (बृह० उ० ५ । ६ । १)† इन दोनो ग्रन्थोंमें कही हुई इन विद्याओंमें
- 'सत्यं ब्रह्मेत्युपासीत । अथ खलु क्रतुमयोऽयं पुरुषः स यावत्क्रतुरयमस्माल्लो- कात्प्रेति एवंक्रतुर्भूत्वामुं लोकं प्रेत्याभिसंभवति स आत्मानमुपासीत मनोमयं प्राणशरीरं भारूपं सत्यसंकल्पमाकाशात्मानम्।' † 'मनोमयोऽयं पुरुषो भाः सत्यस्तस्मिन्नन्तर्हृदये यथा ब्रीहिर्वा यवो वा स एष सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः सर्वमिदं प्रशास्ति यदिदं किञ्च।' (बृह० उ० ५ । ६ । १)
२६८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ भेद है या अभेद ? यह संशय उपस्थित होनेपर सूत्रकार कहते हैं—जैसे भिन्न शाखाओंमें विद्याकी एकता और गुणोंका उपसंहार उचित माना गया है, उसी प्रकार एक शाखामें कही हुई विद्याओंमें भी एकता माननी चाहिये; क्योंकि वहाँ उपास्यमें भेद नहीं है। दोनों जगह एक ही ब्रह्म उपास्य बताया गया है। सम्बन्ध—उपास्यके सम्बन्धको लेकर किस जगह विद्याकी एकता माननी चाहिये और किस जगह नहीं ? इसका निर्णय करनेके लिये पूर्वपक्ष उपस्थित किया जाता है— सम्बन्धादेवमन्यत्रापि ॥ ३ । ३ । २० ॥ एवम्=इस प्रकार; सम्बन्धात्=उपास्यके सम्बन्धसे; अन्यत्र=दूसरी जगह; अपि=भी ( क्या विद्याकी एकता मान लेनी चाहिये ? ) । व्याख्या—इसी प्रकार एक ही उपास्यका सम्बन्ध बृहदारण्यकमें देखा जाता है। वहाँ पहले कहा गया है कि सत्य ही ब्रह्म है. इत्यादि ( बृह० उ० ५ । ५ । १ ); फिर इसी सत्यकी सूर्यमण्डलमें स्थित पुरुषके साथ और आँखमें स्थित पुरुषके साथ एकता की गयी है ( बृह० उ० ५ । ५ । २ )। उसके बाद दोनोंका रहस्यमय नाम क्रमशः 'अहर' और 'अहम्' बतलाया है। इस प्रकरण- में एक ही उपास्यका सम्बन्ध होनेपर भी स्थान-भेदसे पृथक्-पृथक् दो उपासनाएँ बतायी गयी हैं, अतः इनमें भेद मानना चाहिये या अभेद ? सम्बन्ध—पूर्वसूत्रमें उठायी हुई शङ्काका उत्तर अगले सूत्रमें देते हैं— न वा विशेषात् ॥ ३ । ३ । २१ ॥ न वा=इन दोनोंकी एकता नहीं माननी चाहिये; विशेषात्=क्योंकि इन दोनों पुरुषोंके रहस्यमय नाम और स्थानमें भेद किया गया है। व्याख्या—इन दोनों उपासनाओंके वर्णनमें स्थान और नाम भिन्न-भिन्न बताये गये हैं। सूर्यमण्डलमें स्थित सत्यपुरुषका तो रहस्यमय नाम 'अहर' कहा है और आँखमें स्थित पुरुषका रहस्यमय नाम 'अहम्' बतलाया है। इस प्रकार नाम और स्थानका भेद होनेके कारण इन उपासनाओंकी एकता नहीं मानी जा सकती; अतएव एकके नाम और गुणका उपसंहार दूसरे पुरुषमें नहीं करना चाहिये। सम्बन्ध—इस बातको श्रुतिप्रमाणसे स्पष्ट करते हैं—
सूत्र २०—२३ ] अध्याय ३ २६९
सूत्र २०—२३ ] अध्याय ३ २६९ दर्शयति च ॥ ३ । ३ । २२ ॥ दर्शयति च=श्रुति यही बात दिखलाती भी है। व्याख्या—जहाँ इस प्रकार स्थान और नामका भेद हो, वहाँ एक जगह कहे हुए गुण दूसरी जगह नहीं लिये जाते; यह बात श्रुतिद्वारा इस प्रकार दिखलायी गयी है। छान्दोग्योपनिषद्मे आधिदैविक सामके प्रसङ्गमे सूर्यस्थ पुरुषका वर्णन करके फिर आध्यात्मिक सामके प्रसङ्गमें आँखमे स्थित पुरुषका वर्णन किया गया है और वहाँ सूर्यस्थ पुरुषके नाम-रूप आदिका आँखमें स्थित पुरुषमे भी श्रुतिने स्वय विधान करके दोनोकी एकता की है (छा० उ० १ । ७ । ५ ) इससे यह सूचित होता है कि ऐसे स्थलोमें विद्याकी एकता मानकर एकके गुणोका अन्यत्र उपसंहार नहीं करना चाहिये; क्योकि ऐसे स्थलोंपर यदि सामान्यतः विद्याकी एकता मानकर गुणोका उपसंहार अभीष्ट होता तो उक्त प्रसङ्गमे श्रुति स्वयं सूर्यमे स्थित पुरुषके गुणोंका नेत्रवर्ती पुरुषमे विधान नहीं करती। सम्बन्ध—नेत्रवर्ती तथा सूर्यमण्डलवर्ती आदि पुरुषोंमे ब्रह्मके किन-किन गुणोका उपसंहार (अध्याहार) नहीं किया जा सकता ? इसका निर्णय ग्रन्थकार दो सूत्रोंद्वारा करते है— संभृतिद्युव्याप्त्यपि चातः ॥ ३ । ३ । २३ ॥ च=तथा; अतः = इसीलिये अर्थात् विद्याकी एकता न होनेके कारण ही; संभृतिद्युव्याप्ती-समस्त लोकोको धारण करना तथा द्युलोक आदि अखिल ब्रह्माण्डको व्याप्त करके स्थित होना—ये दोनों ब्रह्मसम्बन्धी गुण; अपि=भी अन्यत्र (नेत्रान्तर्वर्ती आदि पुरुषोंमे) नहीं लेने चाहिये। व्याख्या—बृहदारण्यकोपनिषद् ( ३ । ८ । ३ ) मे गार्गी और याज्ञवल्क्य- के संवादका वर्णन आता है। वहाँ गार्गिने याज्ञवल्क्यसे पूछा है—'जो द्युलोक- मे ऊपर है, जो पृथिवीसे नीचे है और जो द्युलोक एवं पृथिवीके मध्यमे है तथा स्वयं भी जो ये द्युलोक और पृथिवी हैं; इनके सिवा जिसे भूत, वर्तमान और भविष्य कहते हैं; वह सब किसमे ओतप्रोत है ?' इसके उत्तरमे याज्ञवल्क्यने कहा—'द्युलोकसे ऊपर और पृथिवीसे नीचेतक यह सब कुछ आकाशमें ओत- प्रोत है।' ( ३ । ८ । ४)। गार्गिने पूछा—'आकाश किसमे ओतप्रोत है?' ( ३ । ८ । ७) याज्ञवल्क्य बोले—'गार्गि ! उस तत्त्वको तो ब्रह्मवेत्ता पुरुष
२७० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ अक्षर कहते है, वह न मोटा है, न पतला है, न छोटा है, न बड़ा है, न लाल है, न चिकना है, न छाया है, न तम है, न वायु है, न आकाश है, न सङ्ग है, न रस है, न गन्ध है, न नेत्र है, न कान है, न वाणी है, न मन है, न तेज है, न प्राण है, न मुख है, न माप है, न भीतर है, न बाहर है, वह कुछ भी नहीं खाता, उसे कोई भी नहीं खाता ।' ( ३ । ८ । ८ ) इस प्रकार अक्षरब्रह्मके स्वरूपका वर्णन करके याज्ञवल्क्यने यह भी बताया कि 'ये सूर्य, चन्द्रमा, द्युलोक और पृथिवी आदि इसीके शासनमे है, इसीने इन सबको धारण कर रक्खा है।' ( ३ । ८ । ९ ) । इस प्रसङ्गमें अक्षरब्रह्मके स्वरूपका प्रतिपादन करते हुए दो बातें मुख्यरूपसे बतायी गयी है, एक तो वह द्युलोकसे ऊपर और पृथिवीके नीचेतक समस्त ब्रह्माण्डमे व्याप्त है और दूसरी बात यह है कि वही सबको धारण करनेवाला है । इन दोनो गुणोका नेत्रान्त- र्वती और सूर्यमण्डलवर्ती पुरुषोमे अध्याहार नहीं किया जा सकता; क्योकि प्रतीक उपासनाके लिये सीमित स्थानोमे स्थित कहे हुए पुरुष न तो सर्वव्यापक हो सकते हैं और न सबको धारण ही कर सकते है। इसी प्रकार अन्यत्र भी, जहाँ पूर्ण ब्रह्मका वर्णन नहीं है, उन प्रतीकोंमें इन गुणोंका उपसंहार नहीं हो सकता; यह भलीभाँति समझ लेना चाहिये । सम्बन्ध- 'उक्त पुरुषोंमें ब्रह्मके गुणोंका उपसंहार न हो, यह तो ठीक है, परन्तु पुरुषविद्यामें जो पुरुषके गुण बताये गये है, उनका उपसंहार तो अन्यत्र जहाँ-जहाँ पुरुषोंका वर्णन हो, उन सबमें होना ही चाहिये ।' ऐसी आशङ्का होनेपर कहते हैं— पुरुषविद्यायामिव चेतरेषामनाम्नानात् ॥ ३ । ३ । २४ ॥ पुरुषविद्यायाम् = पुरुषविद्यामे जो गुण बताये गये है; इव = वैसे गुण; च = भी; इतरेषाम् = अन्य पुरुषोके नहीं हो सकते; अनाम्नानात् = क्योकि श्रुतिमे उनके ऐसे गुण कहीं नहीं बताये गये है । व्याख्या—मुण्डकोपनिषद्मे ( २ । १ । २ से १० तक ) अक्षरब्रह्मका पुरुषके नामसे वर्णन किया गया है । वहाँ पहले अक्षरब्रह्मसे सबकी उत्पत्ति और उन्हींमें सबका लय ( २ । १ । १ ) बताकर उसे दिव्य अमूर्त पुरुष कहा गया है ( २ । १ । २ ) । फिर २ । १ । ३ से लेकर २ । १ । ९
सूत्र २४-२५ ] अध्याय ३ २७१
सूत्र २४-२५ ] अध्याय ३ २७१ तक उसीसे समस्त प्राण, इन्द्रिय, पञ्चभूत, सूर्य, चन्द्रमा, वेद, अग्नि, देवता, मनुष्य, अन्न, समुद्र तथा पर्वत आदिकी सृष्टि बतायी गयी है । तदनन्तर २ । १ । १० वें मन्त्रमे उस पुरुषकी महिमाका इस प्रकार वर्णन किया गया है—'पुरुष एवेदं विश्वं कर्म तपो ब्रह्म परामृतम् । एतद् यो वेद निहितं गुहायां सोऽविद्याग्रन्थि विकिरतीह सोम्य ।' अर्थात् 'पुरुष ही यह सब कुछ है, वही तप, कर्म और परम अमृतरूप ब्रह्म है । हे सोम्य ! हृदयरूप गुफामे स्थित इस अन्तर्यामी परम पुरुषको जो जानता है, वह यहीं इस मनुष्य- शरीरमे ही अविद्याजनित गाँठको छिन्न-भिन्न कर देता है ।' इस प्रकार इस पुरुषविद्याके प्रकरणमे जो पुरुषके सर्वोत्पादकत्व, परात्परत्व, सर्वव्यापकत्व तथा अविद्यानिवारकत्व आदि दिव्य गुण बताये गये है, उनका भी नेत्रान्तर्वर्ती और सूर्यमण्डलवर्ती आदि पुरुषोमे तथा जहाँ-जहाँ स्थूल, सूक्ष्म या कारणशरीरका वर्णन पुरुषके नामसे किया गया है, उन पुरुषोमे ( छा० उ० ५ । ९ । १ ) ( तै० उ० २ । १ से ७तक ) अध्याहार नहीं किया जा सकता; क्योकि श्रुतिमे कहीं भी उनके लिये वैसे गुणोंका प्रतिपादन नहीं किया गया है । उन प्रकरणोमे उन पुरुषोंके अन्तरात्मा परमपुरुषको लक्ष्य करानेके लिये उनको पुरुष नाम दिया गया है । सम्बन्ध—इसी प्रकार— वेधाद्यर्थभेदात् ॥ ३ । ३ । २५ ॥ वेधादि=बींधने आदिका वर्णन करके जो ब्रह्मको वेधका लक्ष्य बताया गया है, इन सबका अध्याहार भी अन्य विद्याओमे नहीं करना चाहिये, अर्थभेदात्= क्योंकि वहाँ प्रयोजनमे भेद है । व्याख्या—मुण्डकोपनिषद् ( २ । २ । ३ ) मे कहा है कि— धनुर्गृहीत्वौपनिषदं महास्त्रं शर ह्युपासानिशितं सन्धयीत । आयम्य तद्भावगतेन चेतसा लक्ष्यं तदेवाक्षरं सोम्य विद्धि ॥ 'हे सोम्य ! उपनिषद्मे वर्णित प्रणवरूप महान् धनुषको लेकर उसपर उपासनाद्वारा तीक्ष्ण किया हुआ बाण चढ़ाना चाहिये । फिर भावपूर्ण चित्तके द्वारा उस बाणको खींचकर तुम परम अक्षर परमेश्वरको ही लक्ष्य बनाकर उसे बींधो ।' इस वर्णनके पश्चात् दूसरे मन्त्रमे आत्माको ही बाणका रूप दिया गया है । इस
२७२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ प्रकार यहाँ जो ब्रह्मको आत्मरूप बाणके द्वारा बींधनेयोग्य बताया गया है; उसके इस वेध्यत्व आदि गुणोंका तथा ॐकारके धनुर्भाव और आत्माके बाणत्वका भी जहाँ ओंकारके द्वारा परमात्माकी उपासना करनेका प्रकरण है, उन ब्रह्मविद्याओमे उपसंहार नहीं करना चाहिये; क्योकि यहाँ चिन्तनमें तन्मयताका स्वरूप बतानेके लिये वैसा रूपक लिया गया है । इस तरह रूपककी कल्पनाद्वारा जो विशेष बात कही जाय, वे अन्य प्रकरणमे अनुपयुक्त होनेके कारण लेने योग्य नहीं हैं। सम्बन्ध—बीसवें सूत्रसे पचीसवें सूत्रतक भिन्न-भिन्न श्रुतियोंपर यह विचार किया गया कि उनमें कौन-कौन-सी बातें एक जगहसे दूसरी जगह अध्याहार करने योग्य नहीं हैं। अब परमगति अर्थात् परमधाम और परमात्माकी प्राप्तिविषयक श्रुतियोंपर विचार करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है । श्रुतियोंमें ब्रह्म- विद्याका फल कहीं तो केवल दुःख, शोक, बन्धन और शुभाशुभ कर्मोंकी निवृत्तिमात्र बतलाया है; कहीं उसके पश्चात् परम समता, परमधाम और परब्रह्म परमात्मा- की प्राप्तिका भी वर्णन है। अतः ब्रह्मविद्याके फलमें भेद है या नहीं ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— हानौ तूपायनशब्दशेषत्वात्कुशाच्छन्दस्तुत्युप- गानवत्तदुक्तम् ॥ ३ । ३ । २६ ॥ हानौ=जहाँ केवल दुःख, शोक, पुण्य, पाप आदिके नाशका ही वर्णन है ऐसी श्रुतिमें; तु=भी; उपायनशब्दशेषत्वात्=लाभरूप परमधामकी प्राप्ति आदि फलका भी अध्याहार कर लेना चाहिये, क्योंकि वह वाक्यका शेष भाग है; कुशाच्छन्दस्तुत्युपगानवत्=यह बात कुशा, छन्द, स्तुति और उपगानकी भाँति समझनी चाहिये; तत् उक्तम्=ऐसा पूर्वमीमांसामें कहा गया है । व्याख्या—उद्दालक आदि छः ऋषियोंको वैश्वानरविद्याका उपदेश देकर राजा अश्वपति कहते है कि जो इस विद्याको जानकर हवन करता है, उसके समस्त पाप उसी तरह भस्म हो जाते हैं, जिस प्रकार सींकका अग्रभाग अग्निमें डालनेसे हो जाता है । ( छा० उ० ५। २४ । ३) इसी प्रकार कठमें परमात्मज्ञानका फल कहीं केवल हर्ष-शोकका नाश (१।२। १२) और कहीं मृत्युमुखसे छूटना बताया , गया है (१।३।१५)। मुण्डकमे कहीं अविद्याका नाश (२।१।१०) और कहीं हृदयकी ग्रन्थि, समस्त संशय तथा कर्मोंका नाश कहा गया है (२।२।८)।
सूत्र २६ ] अध्याय ३ २७३
सूत्र २६ ] अध्याय ३ २७३ श्वेताश्वतरमे समस्त पाशोंसे छूट जाना तथा ( श्वे० उ० १ । ११; २ । १५; ४ । १५, १६; ५ । १३; ६ । १३ ) शोकका नाश होना ( श्वे० उ० ४ । ७) आदि ब्रह्मज्ञानका फल बताया गया है। इस प्रकार उपनिषदोंमे जगह-जगह ब्रह्मविद्याका फल पुण्य, पाप और नाना प्रकारके विकारोका नाश बतलाया गया है; उन मन्त्रोमे परमात्माकी या परमपदकी अथवा परमधामकी प्राप्ति नहीं बतलायी गयी। अत सूत्रकार कहते है कि 'ऐसे स्थलोमे जहाँ केवल दुःख, बन्धन एव कर्मोंके त्याग या नाश आदिकी बात बतायी गयी है, उसके वाक्य- शेषके रूपमे दूसरी जगह कहे हुए उपलब्धिरूप फलका भी अध्याहार कर लेना चाहिये। जैसे परमात्माका प्राप्त होना ( मु० उ० ३ । २ । ८), ब्रह्मधामकी प्राप्ति ( मु० उ० ३ । २ । ४ ), ब्रह्ममे लीन होना ( मु० उ० ३ । २ । ५ ) ब्रह्मलोकमें परम अमृतरूप हो जाना ( मु० उ० ३ । २ । ६ ), अर्चि आदि मार्गसे ब्रह्मलोकमे जाकर वहाँसे न लौटना (छा० उ० ४ । १५ । ५) आदि ही फलका वर्णन है; भाव यह कि जहाँ-जहाँ केवल हानि—पापनाश आदिका वर्णन है, वहाँ-वहाँ ब्रह्मलोक आदिकी प्राप्ति वाक्यशेष है और जहाँ केवल उपायन ( ब्रह्मधामकी प्राप्ति आदि ) का ही वर्णन है, वहाँ पूर्वोक्त हानि ( दुःखनाश आदि ) ही वाक्य-शेष है । इसलिये प्रत्येक समान-विद्यामें उसका अध्याहार कर लेना चाहिये; जिससे किसी प्रकारका विकल्प या फलभेद न रहे। इस प्रकार वाक्यशेष ग्रहण करनेका दृष्टान्त सूत्रकार देते हैं—जैसे कौषीतकि शाखावालोंने सामान्यतः वनस्पतिमात्रकी कुशा लेनेके लिये कहा है। परन्तु शाट्यायन शाखावाले उसके स्थानमे गूलरके काठकी बनी हुई कुशा लेनेके लिये कहते हैं; इसलिये उनका वह विशेष वचन कौषीतकिके सामान्य वचनका वाक्य-शेष माना जाता है और दोनों शाखावाले उसे स्वीकार करते है। इसी तरह एक शाखावाले 'छन्दोभिः स्तुवीत' (देव और असुरोके ) छन्दोंद्वारा स्तुति करे, इस प्रकार समान भावसे कहते है। किन्तु पैङ्गी शाखावाले 'देवोके छन्द पहले बोलने चाहिये' इस प्रकार विशेषरूपसे क्रम नियत कर देते हैं, तो उस क्रमको पूर्व कथनका वाक्य- शेष मानकर सभी स्वीकार करते हैं। जैसे किसी शाखामे 'षोडशिनः स्तोत्रमुपा- करोति' (षोडशीका स्तवन करे ) ऐसा सामान्य वचन मिलता है, परन्तु तैत्तिरीय शाखावाले इस कर्मको ऐसे समयमें कर्तव्य बतलाते हैं, जब ब्रह्मवेलामे तारे छिप गये हो और सूर्योदय अभी नहीं हुआ हो । अतः यह कालविशेषका वे० द० १८—
२७४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ नियम पूर्वकथित वाक्यका शेष होकर सबको मान्य होता है। तथा एक शाखावाले स्तुतिगानके विषयमें समानभावसे कहते हैं कि 'ऋत्विज उपगायन्ति'—'ऋत्विज् लोग स्तोत्रका गान करें' किन्तु दूसरी शाखावाले यह विधान करते है कि 'नाध्वर्यु- रुपगायति'—'अध्वर्युको स्तोत्र-गान नहीं करना चाहिये।' अतः इसको भी वाक्य-शेष मानकर सब यह स्वीकार करते हैं कि 'अध्वर्युको छोड़कर अन्य ऋत्विजोद्वारा स्तोत्रोंका गान होना चाहिये।' उसी प्रकार जहाँ केवल पाप आदिके नाशकी ही बात कही है, ब्रह्मलोकादिकी प्राप्ति नहीं बतलायी गयी है, वहाँ प्राप्तिरूप फलको भी वाक्यशेषके रूपमें ग्रहण कर लेना चाहिये। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि 'देवयानमार्गसे ब्रह्मलोकमे जानेवाले महापुरुषके पापकर्म नष्ट हो जाते हैं, परन्तु पुण्य-कर्म तो शेष रहते ही होंगे; अन्यथा उसका ब्रह्मलोकमें गमन कैसे सम्भव होगा ? क्योंकि ऊपरके लोकोंमें जाना शुभ कर्मोंका ही फल है।' इसपर कहते हैं— साम्पराये तर्तव्याभावात्तथा ह्यन्ये ॥ ३ । ३ । २७ ॥ साम्पराये=ज्ञानीके लिये परलोकमे; तर्तव्याभावात्=भोगके द्वारा पार करने योग्य कोई कर्मफल शेष नहीं रहता, इस कारण (उसके पुण्यकर्म भी यहीं समाप्त हो जाते हैं); हि=क्योंकि; तथा=यही बात; अन्ये=अन्य शाखावाले कहते हैं। व्याख्या—बृहदारण्यकोपनिषद्मे यह बात स्पष्ट शब्दोंमें बतायी गयी है कि 'उभे उ हैवौष एते तरति।' (४। ४। २२) अर्थात् 'यह ज्ञानी निश्चय ही पुण्य और पाप दोनोंको यहीं पार कर जाता है।' इससे यह सिद्ध होता है कि ज्ञानी पुरुषका शरीर त्याग देनेके बाद शुभाशुभ कर्मोंसे कोई सम्बन्ध नहीं रहता। उसे जो ब्रह्मलोक (नित्य धाम) प्राप्त होता है, वह किसी कर्मके फलरूपमें नहीं, अपितु ब्रह्मज्ञानके बलसे प्राप्त होता है। अतः उसके लिये परलोकमें जाकर भोगद्वारा पार करनेयोग्य कोई कर्मफल शेष नहीं रहता; इसलिये उसके पुण्यकर्म भी यहीं समाप्त हो जाते है। ज्ञानीके सञ्चित आदि समस्त कर्मोंका सर्वथा नाश हो जाता है, इस बातका समर्थन मुण्डकोपनिषद्मे भी इस प्रकार किया गया है—'तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्य-
सूत्र २७-२९ ] अध्याय ३ २७५
सूत्र २७-२९ ] अध्याय ३ २७५ मुपैति।' (मु० उ० ३ । १ । ३)--'उस समय ज्ञानी पुरुष पुण्य और पाप दोनोको हटाकर निर्मल हो सर्वोत्तम साम्यरूप परब्रह्मको प्राप्त कर लेता है।' सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि 'समस्त कर्मोंका नाश और ब्रह्मकी प्राप्तिरूप फल तो ब्रह्म-ज्ञानसे यहीं तत्काल प्राप्त हो जाता है। फिर देवयान- मार्गसे ब्रह्मलोकमें जाकर परमात्माको प्राप्त करनेकी बात क्यों कही गयी है?' इसपर कहते हैं— छन्दत उभयथाविरोधात् ॥ ३ । ३ । २८ ॥ छन्दतः=ज्ञानी पुरुषके सङ्कल्पके अनुसार; उभयथा=दोनो प्रकारकी स्थिति होनेमें; अविरोधात्=कोई विरोध नहीं है (इसलिये ब्रह्मलोकमें जानेका विधान है)। व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद् (३।१४।१) मे कहा है कि 'अथ खलु क्रतुमयः पुरुषो यथाक्रतुरस्मिँल्लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति।' अर्थात् 'यह पुरुष निश्चय ही सङ्कल्पमय है। इस लोकमें पुरुष जैसे सङ्कल्पवाला होता है, वैसा ही देहत्यागके पश्चात् यहाँसे परलोकमें जानेपर भी होता है।' इससे यह सिद्ध होता है कि जो ज्ञानी पुरुष किसी लोकमे जानेकी इच्छा न करके यहीं मुक्त होनेका सङ्कल्प रखता है, ब्रह्मज्ञानके लिये साधनमे प्रवृत्त होते समय भी जिसकी ऐसी ही भावना रही है, वह तो तत्काल यहीं ब्रह्म-सायुज्यको प्राप्त हो जाता है; परन्तु जो ब्रह्मलोक-दर्शनकी इच्छा रखकर साधनमे प्रवृत्त हुआ था तथा जिसका वहाँ जानेका सङ्कल्प है, वह देवयानमार्गसे वहाँ जाकर ही ब्रह्मको प्राप्त होता है। इस प्रकार साधकके सङ्कल्पानुसार दोनों प्रकारकी गति मान लेनेमे कोई विरोध नहीं है। सम्बन्ध—यदि इस प्रकार ब्रह्मलोकमें गये बिना यहाँ ही परमात्माको प्राप्त हो जाना मान लिया जाय तो क्या आपत्ति है? इसपर कहते हैं— गतेरर्थवत्त्वमुभयथान्यथा हि विरोधः ॥ ३ । ३ । २९ ॥ गतेः=गतिबोधक श्रुतिकी; अर्थवत्त्वम्=सार्थकता; उभयथा=दोनों प्रकारसे ब्रह्मकी प्राप्ति माननेपर ही होगी; हि=क्योंकि; अन्यथा=यदि अन्य प्रकारसे माने तो; विरोधः=श्रुतिमें परस्पर विरोध आयेगा। व्याख्या—श्रुतियोंमे कहीं तो तत्काल ही ब्रह्मकी प्राप्ति बतलायी है
(क० उ० २ । ३ । १४, १५), कहीं ब्रह्मलोकमे जानेपर बतायी है (मु० उ० ३ । २ । ६) । अतः यदि उपर्युक्त दोनों प्रकारसे उसकी व्यवस्था नहीं मानी जायगी तो दोनों प्रकारका वर्णन करनेवाली श्रुतियोंमें विरोध आयेगा। इसलिये यही मानना ठीक है कि साधकके संकल्पानुसार दोनों प्रकारसे ही परमात्माकी प्राप्ति हो सकती है। ऐसा माननेपर ही देवयान-मार्गसे गतिका वर्णन करनेवाली श्रुतिकी सार्थकता होगी और श्रुतियोंका परस्पर विरोध भी दूर हो जायगा। सम्बन्ध-पुनः उसी बातको सिद्ध करते हैं- उपपन्नस्तल्लक्षणार्थोपलब्धेलोकवत् ॥ ३ । ३ । ३० ॥ तल्लक्षणार्थोपलब्धेः = उस देवयानमार्गद्वारा ब्रह्मलोकमें जानेके उपयुक्त सूक्ष्म शरीरादि उपकरणोंकी प्राप्तिका कथन होनेसे; उपपन्नः = उनके लिये ब्रह्मलोकमे जानेका कथन युक्तिसङ्गत है; लोकवत् = लोकमे भी ऐसा देखा जाता है। व्याख्या-श्रुतिमें जहाँ साधकके लिये देवयानमार्गके द्वारा ब्रह्मलोकमें जानेकी बात कही है, उस प्रकरणमें उसके उपयोगी उपकरणोंका वर्णन भी पाया जाता है। श्रुतिमे कहा है कि यह जीवात्मा जिस सङ्कल्पवाला होता है, उस सङ्कल्पद्वारा मुख्य प्राणमे स्थित हो जाता है। मुख्य प्राण उदानवायुमे स्थित हो मन-इन्द्रियोंसे युक्त जीवात्माको उसके सङ्कल्पानुसार लोकमें जाता है। (प्र० उ० ३ । १०) इसी तरह दूसरी जगह अर्चि-अभिमानी देवतादिको प्राप्त होना कहा है। (छा० उ० ५ । १० । १, २) इस प्रकार समस्त कर्मोंका अत्यन्त अभाव हो जानेपर भी उसका दिव्य-शरीरसे सम्पन्न होना बतलाया गया है; किन्तु जिन साधकोंको शरीर रहते हुए परब्रह्म परमेश्वर प्रत्यक्ष हो जाते हैं, उनके लिये वैसा वर्णन नहीं आता (क० उ० २ । ३ । १४); अपितु उनके विषयमें श्रुतिने इस प्रकार कहा है कि-'योऽकामो निष्काम आप्तकाम आत्म- कामो न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति।' (बृह० उ० ४ । ४ । ६) अर्थात् 'जो कामनारहित, निष्काम, पूर्णकाम तथा केवल परमात्मा- को ही चाहनेवाला है, उसके प्राण ऊपरके लोकोंमें नहीं जाते। वह ब्रह्म होकर ही (यहाँ) ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है।' इसलिये यही मानना सुसंगत है कि साधकके सङ्कल्पानुसार दोनों प्रकारसे ही ब्रह्मकी प्राप्ति होती है। लोकमें भी देखा जाता है कि जिसको अपने स्थानसे कहीं अन्यत्र जाना होता है, उसके
सूत्र ३०-३१ ] अध्याय ३ २७७
सूत्र ३०-३१ ] अध्याय ३ २७७ साथ यात्रोपयोगी आवश्यक सामग्री रहती है; उसी प्रकार उपर्युक्त अधिकारी पुरुषके लिये दिव्य-शरीर आदि उपकरणोंका वर्णन किया गया है, इसलिये उसका इस लोकसे ब्रह्मलोकमें जानेका कथन उचित ही है। सम्बन्ध—'ब्रह्मविद्याका फल बताते हुए श्रुतिने बहुत जगह ब्रह्मलोकमें जाने- की बात तो कही है, परन्तु देवयानमार्गसे जानेकी बात सर्वत्र नहीं कही है। इसलिये यह जिज्ञासा होती है कि ब्रह्मलोकमें जानेवाले सभी ब्रह्मवेत्ता देवयान- मार्गसे ही जाते हैं, या जिन-जिन विद्याओंके प्रकरणमें देवयानमार्गका वर्णन है, उन्हींके अनुसार उपासना करनेवाले पुरुष उस मार्गसे जाते हैं?' इसपर कहते हैं— अनियमः सर्वेषामविरोधः शब्दानुमाना- भ्याम् ॥ ३ । ३ । ३१ ॥ अनियमः=ऐसा नियम नहीं है कि उन्हीं विद्याओंके अनुसार उपासना करनेवाले देवयानमार्गद्वारा जाते हैं; सर्वेषाम्=अपितु ब्रह्मलोकमे जानेवाले सभी साधकोंकी गति उसी मार्गसे होती है (यही बात); शब्दानुमानाभ्याम्= श्रुति और स्मृतियोंसे सिद्ध होती है (इसलिये); अविरोधः=कोई विरोध नहीं है। व्याख्या—श्रुतिमे कई जगह साधकको ब्रह्मलोक और परमधामकी प्राप्ति बतलायी गयी है, परन्तु सब जगह देवयानमार्गका वर्णन नहीं है। उसी प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता आदि स्मृतियोंमे भी सब जगह मार्गका वर्णन नहीं है। अतः जहाँ ब्रह्मलोककी प्राप्ति बतलायी गयी है, वहाँ यदि मार्गका वर्णन न हो तो भी अन्य श्रुतियोंके वर्णनसे वह बात समझ लेनी चाहिये; क्योकि ब्रह्मलोकमे गमन होगा तो किसी-न-किसी मार्गसे ही होगा। अतः यह नियम नहीं है कि जिन प्रकरणोंमें देवयानमार्गका वर्णन है, उसके अनुसार उपासना करनेवाले ही उस मार्गसे जाते है, दूसरे नहीं। अपितु जिनका ब्रह्मलोकमे गमन कहा गया है, वे सभी देवयानमार्गसे जाते है, ऐसा माननेसे श्रुतिके कथनमे किसी प्रकारका विरोध नहीं आयेगा। यहाँ यह भी समझ लेना चाहिये कि जो यहीं परमात्माको प्राप्त हो जाते हैं, वे ब्रह्मलोकमे नहीं जाते। सम्बन्ध—'वसिष्ठ और व्यास आदि जो अधिकारप्राप्त ऋषिगण हैं, उनकी अर्चिमार्गसे गति होती है या वे इसी शरीरसे ब्रह्मलोकतक जा सकते हैं?' इसपर कहते हैं—
२७८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ यावदधिकारमवस्थितिराधिकारिकाणाम् ॥ ३ । ३ । ३२ ॥ आधिकारिकाणाम् = जो अधिकार-प्राप्त कारक पुरुष हैं, उनकी; यावदधिकारम् = जबतक अधिकारकी समाप्ति नहीं होती तबतक; अवस्थितिः = अपनी इच्छानुसार स्थिति रहती है। व्याख्या-जो वसिष्ठ तथा व्यास आदि महापुरुष अधिकार लेकर परमेश्वरकी आज्ञासे यहाँ जगत्का कल्याण करनेके लिये आते हैं, उन कारक पुरुषोंका न तो साधारण जीवोंकी भाँति जाना-आना होता है और न जन्मना- मरना ही होता है। उनकी सभी क्रियाएँ साधारण जीवोंसे विलक्षण एवं दिव्य होती हैं। वे अपने इच्छानुसार शरीर धारण करनेमें समर्थ होते हैं अतः उनके लिये अर्चि आदि देवताओंकी सहायता आवश्यक नहीं है। जबतक उनका अधिकार रहता है, तबतक वे इस जगत्में आवश्यकतानुसार सभी लोकोंमे स्वतन्त्रतापूर्वक जा सकते हैं, अन्तमे परमात्मामें विलीन हो जाते हैं। इसलिये अन्य साधक या मुक्त पुरुष उनके समान नहीं हो सकते। सम्बन्ध-बत्तीसवें सूत्रतक ब्रह्मलोक और परमात्माकी प्राप्तिके विषयमें आयी हुई श्रुतियोंपर विचार किया गया। अब ब्रह्म और जीवके स्वरूपका वर्णन करनेवाली श्रुतियोंपर विचार करनेके लिये प्रकरण आरम्भ किया जाता है- अक्षरधियां त्ववरोधः सामान्यतद्भावाभ्यामौपसदव- तदुक्तम् ॥ ३ । ३ । ३३ ॥ अक्षरधियाम् = अक्षर अर्थात् परमात्माके निर्गुण निराकार विषयक लक्षणोंका; तु = भी; अवरोधः = सब जगह अध्याहार करना ( उचित है ); सामान्यतद्भावाभ्याम् = क्योंकि ब्रह्मके सभी विशेषण समान हैं तथा उसीके स्वरूपको लक्ष्य करानेवाले भाव हैं; औपसदवत् = अतः 'उपसत्' कर्मसम्बन्धी मन्त्रोंकी भाँति; तदुक्तम् = उनका अध्याहार कर लेना उचित है; यह बात कही गयी है। व्याख्या-बृहदारण्यकमे याज्ञवल्क्यने कहा है कि 'हे गार्गि ! जिसको तुम पूछ रही हो, उस तत्त्वको ब्रह्मवेत्तालोग अक्षर कहते हैं अर्थात् निर्गुण-निराकार, । अविनाशी ब्रह्म बतलाते हैं। वह न मोटा है, न पतला है, न छोटा है, न बड़ा
सूत्र ३२-३४] अध्याय ३ २७९
सूत्र ३२-३४] अध्याय ३ २७९ है' इत्यादि (बृह० उ० ३ । ८ । ८)। इस प्रकार वहाँ ब्रह्मको इन सब पदार्थोंसे, इन्द्रियोंसे और शरीरधारी जीवोंसे अत्यन्त विलक्षण बतलाया गया है। तथा मुण्डकोपनिषद्में अंगिरा ऋषिने शौनकसे कहा है कि 'वह परा विद्या है, जिससे उस अक्षर (परब्रह्म परमात्मा) की प्राप्ति होती है, जो जानने और पकड़नेमें आनेवाला नहीं है, जो गोत्र, वर्ण, आँख, कान, हाथ, पैर आदिसे रहित है, किन्तु सर्वव्यापी, अतिसूक्ष्म, विनाशरहित और समस्त प्राणियोंका कारण है, उसको ज्ञानी पुरुष सब ओरसे देखते हैं (मु० उ० १ । १ । ५, ६)। इस प्रकार वेदमें उस अक्षरब्रह्मके जो विशेषण बतलाये गये हैं, उनको ब्रह्मके वर्णनमें सभी जगह ग्रहण कर लेना चाहिये; क्योंकि ब्रह्मके सविशेष और निर्विशेष सभी लक्षण समान है तथा सभी उसीके भाव हैं अर्थात् उस ब्रह्मके स्वरूपका लक्ष्य करानेके लिये ही कहे हुए भाव हैं, इसलिये 'उपसत्' कर्म सम्बन्धी मन्त्रोंकी भाँति उनका अध्याहार कर लेना उचित है। यह बात कही गयी है। सम्बन्ध—'मुण्डक (३ । १ । १) और श्वेताश्वतर (४ । ६) में तो पक्षीके दृष्टान्तसे जीव और ईश्वरको मनुष्यके हृदयमें स्थित बतलाया है और कठोपनिषद्में छाया तथा धूपकी भाँति ईश्वर और जीवको मनुष्यके हृदयमें स्थित बतलाया है, इन श्रुतियोंमें जिस विद्या अथवा विज्ञानका वर्णन है, वह एक दूसरेसे भिन्न है या अभिन्न?' इस जिज्ञासापर कहते हैं— इयदामननात् ॥ ३ । ३ । ३४ ॥ (उक्त तीनों मन्त्रोंमें एक ही ब्रह्मविद्याका वर्णन है) इयदामननात्=क्योंकि सभी जगह इयत्ता (इतनापन) का वर्णन समान है। व्याख्या—मुण्डक और श्वेताश्वतरमे तो कहा है कि 'एक साथ रहकर परस्पर सखाभाव रखनेवाले दो पक्षी (जीवात्मा और परमात्मा) एक ही शरीररूप वृक्षका आश्रय लेकर रहते हैं, उन दोनोंमेंसे एक तो कर्मफलरूप सुख- दुःखोंको भोगता है और दूसरा न खाता हुआ केवल देखता रहता है। इस प्रकार यह जीव शरीरकी आसक्तिमें निमग्न होकर असमर्थताके कारण मोहित होकर चिन्ता करता रहता है। यदि यह भक्तोद्वारा सेवित अपने पास रहनेवाले सखा परमेश्वर और उसकी विचित्र महिमाको देख ले तो तत्काल ही शोकरहित हो जाय।' तथा कठोपनिषद्मे कहा है कि 'मनुष्य-शरीरमे परब्रह्मके उत्तम
२८० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ निवासस्थान् हृदयगुहामे छिपे हुए और अपने सत्यस्वरूपका अनुभव करनेवाले ( जीव और ईश्वर ) दोनो है, जो कि छाया और धूपकी भाँति भिन्न स्वभाववाले है। ऐसा ब्रह्मवेत्ता कहते है।' ( क० उ० १ । ३ । १ )। इन सभी स्थलोमे द्विवचनान्त शब्दोका प्रयोग करके जीव और ईश्वरको परिच्छिन्न स्थल—हृदयमें स्थित बताया गया है। इससे सिद्ध होता है कि तीनो जगह कही हुई विद्या एक है। इसी प्रकार जहाँ-जहाँ उस परब्रह्म परमेश्वरको प्राणियोके हृदयमे स्थित बताया गया है, उन सब स्थलोमे वर्णित विद्याकी भी एकता समझ लेनी चाहिये। सम्बन्ध—अब परमात्माको सर्वान्तर्यामी बतलानेवाली श्रुतियोंपर विचार आरम्भ करते हैं— अन्तरा भूतग्रामवत्स्वात्मनः ॥ ३ । ३ । ३५ ॥ भूतग्रामवत्=आकाशादि भूतसमुदायकी भाँति (वह परमात्मा); स्वात्मनः = साधकके अपने आत्माका भी; अन्तरा =अन्तरात्मा (अन्तर्यामी है); (आमननात्)= क्योकि यही बात अन्य श्रुतिमे कही गयी है। व्याख्या—राजा जनककी सभामे याज्ञवल्क्यसे चक्रायणके पुत्र उषस्तने कहा कि 'जो अपरोक्ष ब्रह्म है, जो सबका अन्तरात्मा है, उसको मुझे समझाइये।' तब याज्ञवल्क्यने कहा—'जो तेरा अन्तरात्मा है, वही सबका है।' उसके पुनः जिज्ञासा करनेपर याज्ञवल्क्यने विस्तारसे समझाया कि 'जो प्राणके द्वारा सबको प्राणक्रियासम्पन्न करता है।' आदि। उसके बाद उषस्तके पुनः पूछनेपर बताया कि 'दृष्टिके द्रष्टाको देखा नहीं जा सकता, श्रुतिके श्रोताको सुना नहीं जा सकता, मतिके मन्ताको मनन नहीं किया जा सकता, विज्ञातिके विज्ञाताको जाना नहीं जा सकता, यह तेरा अन्तरात्मा ही सबका अन्तरात्मा है' (बृह० उ० ३ । ४ । १, २)। फिर कहोलऋषिने भी वही बात पूछी कि 'जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म है, जो सबका अन्तरात्मा है, उसको मुझे समझायें।' याज्ञवल्क्यने उत्तरमे कहा कि 'जो तेरा अन्तरात्मा है, वही सबका अन्तरात्मा है। जो भूख, प्यास, शोक, मोह, बुढ़ापा और मृत्यु सबसे अतीत है' इत्यादि (बृह० उ०३ । ५ । १)। इन दोनो प्रकरणोको दृष्टिमें रखकर इस तरहके सभी प्रकरणोंका एक साथ निर्णय करते हैं। यहाँ यह प्रश्न उठता है कि 'इसमे जो अन्तरात्मा बतलाया गया है, वह
सूत्र ३५-३६ ] अध्याय ३ २८१
सूत्र ३५-३६ ] अध्याय ३ २८१ जीवात्मा है या परमात्मा ? यदि परमात्मा है तो किस प्रकार ?' इसका उत्तर देते हुए सूत्रकार कहते हैं—जिस प्रकार भूतसमुदायमे पृथिवीका अन्तरात्मा जल है, जलका तेज है, तेजका वायु है और वायुका भी आकाश है। अत. सबका अन्तरात्मा आकाश है। उसी प्रकार समस्त जड तत्त्वोका अन्तरात्मा जीवात्मा है और जो अपने आपका अर्थात् जीवात्माका भी अन्तरात्मा है, वह सबका अन्तरात्मा है; क्योकि अन्य श्रुतिमे यही बात कही गयी है। अर्थात् उसी प्रकरणके सातवे ब्राह्मणमे उद्दालकके प्रश्नका उत्तर देते हुए याज्ञवल्क्यने उस परब्रह्म परमात्माको पृथिवी आदि समस्त भूतसमुदायका अन्तर्यामी बतलाते हुए अन्तमे विज्ञानात्मा अर्थात् जीवात्मा- का भी अन्तर्यामी उसीको बतलाया है तथा प्रत्येक वाक्यके अन्तमे कहा है कि 'यही तेरा अन्तर्यामी अमृतस्वरूप आत्मा है।' श्वेताश्वतरमे भी कहा गया है कि 'सब प्राणियोंमें छिपा हुआ वह एक देव सर्वव्यापी और समस्त प्राणियोका अन्तरात्मा है, वह सबके कर्मोंका अधिष्ठाता, सबका निवासस्थान, सबका साक्षी, सर्वथा विशुद्ध और गुणातीत है'।' (श्वेता० उ० ६। ११) इसलिये यही सिद्ध होता है कि सबका अन्तरात्मा वह परब्रह्म पुरुषोत्तम ही है। जीवात्मा सबका अन्तरात्मा नहीं हो सकता। सम्बन्ध—अब कही हुई बातमें शङ्का उठाकर उसका उत्तर देते हैं— अन्यथाभेदानुपपत्तिरिति चेन्नोपदेशान्तरवत् ॥ ३ । ३ । ३६ ॥ चेत्=यदि कहो कि; अन्यथा=दूसरे प्रकारसे; अभेदानुपपत्तिः=अभेदकी सिद्धि नहीं होगी, इसलिये (उक्त प्रकरणमे जीवात्मा और परमात्माका अभेद मानना ही उचित है); इति न=तो यह ठीक नहीं; उपदेशान्तरवत्=क्योकि दूसरे उपदेशकी भाँति अभेदकी सिद्धि हो जायगी। व्याख्या—यदि कहो कि उक्त वर्णनके अनुसार जीवात्मा और परमात्माके भेदको उपाधिकृत न मानकर वास्तविक मान लेनेपर अभेदकी सिद्धि नहीं होगी, तो ऐसी बात नहीं है। दूसरी जगहके उपदेशकी भाँति यहाँ भी अभेदकी सिद्धि हो जायगी। अर्थात् जिस प्रकार दूसरी जगह कार्यकारणभावके अभिप्रायसे परब्रह्म परमेश्वरकी जड-प्रपञ्च और जीवात्माके साथ एकता करके उपदेश दिया गया है, उसी प्रकार प्रत्येक स्थानमे अभेदकी सिद्धि हो जायगी। भाव यह कि श्वेतकेतुको
२८२ , वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ उसके पिताने मिट्टी, लोहा और सोनेके अशद्वारा कार्य-कारणकी एकता समझायी, उसके बाद (छा० उ० ६ । ८ । १ से ६ । १६ । ३ तक) नौ बार पृथक्- पृथक् दृष्टान्त देकर प्रत्येकके अन्तमे यह बात कही है कि 'स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो' 'यह जो अणिमा अर्थात् अत्यन्त सूक्ष्म परमात्मा है, इसीका स्वरूप यह समस्त जगत् है, वही सत्य है, वह आत्मा है और वह तू है अर्थात् कार्य और कारणकी भाँति तेरी और उसकी एकता है।' उसी प्रकार सब जगह समझ लेना चाहिये । सम्बन्ध-यदि परमात्मा और जीवात्माका उपाधिकृत भेद और वास्तविक अभेद मान लिया जाय तो क्या हानि है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— व्यतिहारो विशिंषन्ति हीतरवत् ॥ ३ । ३ । ३७ ॥ व्यतिहारः = परस्पर व्यत्यय करके अभेदका वर्णन है, इसलिये उपाधिकृत भेद सिद्ध नहीं होता; हि = क्योंकि; इतरवत् = सभी श्रुतियाँ दूसरेकी भाँति; विशिंषन्ति = विशेषण देकर वर्णन करती हैं। व्याख्या-परमात्माके साथ जीवात्माकी एकताका प्रतिपादन करते हुए श्रुतिने कहा है कि 'तद् योऽहं सोऽसौ योऽसौ सोऽहम्।' अर्थात् 'जो मैं हूँ सो वह है और जो वह है सो मैं हूँ' (ऐ० आ० २ । ४ । ३ ) तथा 'त्वं वा अहमस्मि भगवो देवते अहं वै त्वमसि' (वराहोपनिषद् २ । ३४) अर्थात् 'हे भगवन् ! हे देव ! निश्चय ही 'तुम' मैं हूँ और 'मैं' तुम हो।' इस प्रकार व्यतिहारपूर्वक अर्थात् एकमे दूसरेके धर्मोंका विनिमय करते हुए एकताका प्रतिपादन किया गया है। ऐसा वर्णन उन्हीं स्थलोंपर किया जाता है, जहाँ इतर वस्तुकी भाँति वास्तवमें भेद होते हुए भी प्रकारान्तरसे अभेद बतलाना अभीष्ट हो। जैसा कि दूसरी जगह श्रुतिमें देखा जाता है—'अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथः।' (छा० उ० १ । ५ । १) अर्थात् 'निश्चय ही जो उद्गीथ है, वह प्रणव है और जो प्रणव है, वह उद्गीथ है।' उद्गीथ और प्रणवमे भेद होते हुए भी यहाँ उपासनाके लिये श्रुतिने व्यतिहारवाक्यद्वारा दोनोंकी एकताका प्रतिपादन किया है। इसी प्रकार यहाँ भी उपासनाके लिये परमात्माके साथ जीवात्माकी एकता बतायी गयी है, ऐसा समझना चाहिये। जहाँ उपाधिकृत भेद