ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 298, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ३०-३१ ] अध्याय ३ २७७ साथ यात्रोपयोगी आवश्यक सामग्री रहती है; उसी प्रकार उपर्युक्त अधिकारी पुरुषके लिये दिव्य-शरीर आदि उपकरणोंका वर्णन किया गया है, इसलिये उसका इस लोकसे ब्रह्मलोकमें जानेका कथन उचित ही है। सम्बन्ध—'ब्रह्मविद्याका फल बताते हुए श्रुतिने बहुत जगह ब्रह्मलोकमें जाने- की बात तो कही है, परन्तु देवयानमार्गसे जानेकी बात सर्वत्र नहीं कही है। इसलिये यह जिज्ञासा होती है कि ब्रह्मलोकमें जानेवाले सभी ब्रह्मवेत्ता देवयान- मार्गसे ही जाते हैं, या जिन-जिन विद्याओंके प्रकरणमें देवयानमार्गका वर्णन है, उन्हींके अनुसार उपासना करनेवाले पुरुष उस मार्गसे जाते हैं?' इसपर कहते हैं— अनियमः सर्वेषामविरोधः शब्दानुमाना- भ्याम् ॥ ३ । ३ । ३१ ॥ अनियमः=ऐसा नियम नहीं है कि उन्हीं विद्याओंके अनुसार उपासना करनेवाले देवयानमार्गद्वारा जाते हैं; सर्वेषाम्=अपितु ब्रह्मलोकमे जानेवाले सभी साधकोंकी गति उसी मार्गसे होती है (यही बात); शब्दानुमानाभ्याम्= श्रुति और स्मृतियोंसे सिद्ध होती है (इसलिये); अविरोधः=कोई विरोध नहीं है। व्याख्या—श्रुतिमे कई जगह साधकको ब्रह्मलोक और परमधामकी प्राप्ति बतलायी गयी है, परन्तु सब जगह देवयानमार्गका वर्णन नहीं है। उसी प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता आदि स्मृतियोंमे भी सब जगह मार्गका वर्णन नहीं है। अतः जहाँ ब्रह्मलोककी प्राप्ति बतलायी गयी है, वहाँ यदि मार्गका वर्णन न हो तो भी अन्य श्रुतियोंके वर्णनसे वह बात समझ लेनी चाहिये; क्योकि ब्रह्मलोकमे गमन होगा तो किसी-न-किसी मार्गसे ही होगा। अतः यह नियम नहीं है कि जिन प्रकरणोंमें देवयानमार्गका वर्णन है, उसके अनुसार उपासना करनेवाले ही उस मार्गसे जाते है, दूसरे नहीं। अपितु जिनका ब्रह्मलोकमे गमन कहा गया है, वे सभी देवयानमार्गसे जाते है, ऐसा माननेसे श्रुतिके कथनमे किसी प्रकारका विरोध नहीं आयेगा। यहाँ यह भी समझ लेना चाहिये कि जो यहीं परमात्माको प्राप्त हो जाते हैं, वे ब्रह्मलोकमे नहीं जाते। सम्बन्ध—'वसिष्ठ और व्यास आदि जो अधिकारप्राप्त ऋषिगण हैं, उनकी अर्चिमार्गसे गति होती है या वे इसी शरीरसे ब्रह्मलोकतक जा सकते हैं?' इसपर कहते हैं—