ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२७८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ यावदधिकारमवस्थितिराधिकारिकाणाम् ॥ ३ । ३ । ३२ ॥ आधिकारिकाणाम् = जो अधिकार-प्राप्त कारक पुरुष हैं, उनकी; यावदधिकारम् = जबतक अधिकारकी समाप्ति नहीं होती तबतक; अवस्थितिः = अपनी इच्छानुसार स्थिति रहती है। व्याख्या-जो वसिष्ठ तथा व्यास आदि महापुरुष अधिकार लेकर परमेश्वरकी आज्ञासे यहाँ जगत्का कल्याण करनेके लिये आते हैं, उन कारक पुरुषोंका न तो साधारण जीवोंकी भाँति जाना-आना होता है और न जन्मना- मरना ही होता है। उनकी सभी क्रियाएँ साधारण जीवोंसे विलक्षण एवं दिव्य होती हैं। वे अपने इच्छानुसार शरीर धारण करनेमें समर्थ होते हैं अतः उनके लिये अर्चि आदि देवताओंकी सहायता आवश्यक नहीं है। जबतक उनका अधिकार रहता है, तबतक वे इस जगत्में आवश्यकतानुसार सभी लोकोंमे स्वतन्त्रतापूर्वक जा सकते हैं, अन्तमे परमात्मामें विलीन हो जाते हैं। इसलिये अन्य साधक या मुक्त पुरुष उनके समान नहीं हो सकते। सम्बन्ध-बत्तीसवें सूत्रतक ब्रह्मलोक और परमात्माकी प्राप्तिके विषयमें आयी हुई श्रुतियोंपर विचार किया गया। अब ब्रह्म और जीवके स्वरूपका वर्णन करनेवाली श्रुतियोंपर विचार करनेके लिये प्रकरण आरम्भ किया जाता है- अक्षरधियां त्ववरोधः सामान्यतद्भावाभ्यामौपसदव- तदुक्तम् ॥ ३ । ३ । ३३ ॥ अक्षरधियाम् = अक्षर अर्थात् परमात्माके निर्गुण निराकार विषयक लक्षणोंका; तु = भी; अवरोधः = सब जगह अध्याहार करना ( उचित है ); सामान्यतद्भावाभ्याम् = क्योंकि ब्रह्मके सभी विशेषण समान हैं तथा उसीके स्वरूपको लक्ष्य करानेवाले भाव हैं; औपसदवत् = अतः 'उपसत्' कर्मसम्बन्धी मन्त्रोंकी भाँति; तदुक्तम् = उनका अध्याहार कर लेना उचित है; यह बात कही गयी है। व्याख्या-बृहदारण्यकमे याज्ञवल्क्यने कहा है कि 'हे गार्गि ! जिसको तुम पूछ रही हो, उस तत्त्वको ब्रह्मवेत्तालोग अक्षर कहते हैं अर्थात् निर्गुण-निराकार, । अविनाशी ब्रह्म बतलाते हैं। वह न मोटा है, न पतला है, न छोटा है, न बड़ा