ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ३५-३६ ] अध्याय ३ २८१ जीवात्मा है या परमात्मा ? यदि परमात्मा है तो किस प्रकार ?' इसका उत्तर देते हुए सूत्रकार कहते हैं—जिस प्रकार भूतसमुदायमे पृथिवीका अन्तरात्मा जल है, जलका तेज है, तेजका वायु है और वायुका भी आकाश है। अत. सबका अन्तरात्मा आकाश है। उसी प्रकार समस्त जड तत्त्वोका अन्तरात्मा जीवात्मा है और जो अपने आपका अर्थात् जीवात्माका भी अन्तरात्मा है, वह सबका अन्तरात्मा है; क्योकि अन्य श्रुतिमे यही बात कही गयी है। अर्थात् उसी प्रकरणके सातवे ब्राह्मणमे उद्दालकके प्रश्नका उत्तर देते हुए याज्ञवल्क्यने उस परब्रह्म परमात्माको पृथिवी आदि समस्त भूतसमुदायका अन्तर्यामी बतलाते हुए अन्तमे विज्ञानात्मा अर्थात् जीवात्मा- का भी अन्तर्यामी उसीको बतलाया है तथा प्रत्येक वाक्यके अन्तमे कहा है कि 'यही तेरा अन्तर्यामी अमृतस्वरूप आत्मा है।' श्वेताश्वतरमे भी कहा गया है कि 'सब प्राणियोंमें छिपा हुआ वह एक देव सर्वव्यापी और समस्त प्राणियोका अन्तरात्मा है, वह सबके कर्मोंका अधिष्ठाता, सबका निवासस्थान, सबका साक्षी, सर्वथा विशुद्ध और गुणातीत है'।' (श्वेता० उ० ६। ११) इसलिये यही सिद्ध होता है कि सबका अन्तरात्मा वह परब्रह्म पुरुषोत्तम ही है। जीवात्मा सबका अन्तरात्मा नहीं हो सकता। सम्बन्ध—अब कही हुई बातमें शङ्का उठाकर उसका उत्तर देते हैं— अन्यथाभेदानुपपत्तिरिति चेन्नोपदेशान्तरवत् ॥ ३ । ३ । ३६ ॥ चेत्=यदि कहो कि; अन्यथा=दूसरे प्रकारसे; अभेदानुपपत्तिः=अभेदकी सिद्धि नहीं होगी, इसलिये (उक्त प्रकरणमे जीवात्मा और परमात्माका अभेद मानना ही उचित है); इति न=तो यह ठीक नहीं; उपदेशान्तरवत्=क्योकि दूसरे उपदेशकी भाँति अभेदकी सिद्धि हो जायगी। व्याख्या—यदि कहो कि उक्त वर्णनके अनुसार जीवात्मा और परमात्माके भेदको उपाधिकृत न मानकर वास्तविक मान लेनेपर अभेदकी सिद्धि नहीं होगी, तो ऐसी बात नहीं है। दूसरी जगहके उपदेशकी भाँति यहाँ भी अभेदकी सिद्धि हो जायगी। अर्थात् जिस प्रकार दूसरी जगह कार्यकारणभावके अभिप्रायसे परब्रह्म परमेश्वरकी जड-प्रपञ्च और जीवात्माके साथ एकता करके उपदेश दिया गया है, उसी प्रकार प्रत्येक स्थानमे अभेदकी सिद्धि हो जायगी। भाव यह कि श्वेतकेतुको