ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 288, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र १८-१९] अध्याय ३ २६७ अन्नरसमय पुरुषके नामसे कहा गया है; क्योंकि इस पुरुषको उस पूर्वोक्त ब्रह्मका आकाशादिके क्रमसे कार्य बतलाया गया है और इसका अन्तरात्मा प्राण- मय आदिके क्रमसे विज्ञानमय जीवात्माको बतलाया है तथा विज्ञानमयका आत्मा ब्रह्मको बतलाकर अन्तमे आनन्दके साथ उसकी एकता की गयी है। इसलिये जिसके 'सत्य', 'ज्ञान' और 'अनन्त' ये लक्षण बताये गये है तथा जो 'आत्मा' और 'आनन्दमय' नामसे जगत्का कारण बतलाया गया है, वह ब्रह्म इस अन्नरसमय पुरुषसे भिन्न सबका अन्तरात्मा है। सम्बन्ध—ग्यारहवें सूत्रसे 'आनन्द' के प्रकरणका विचार आरम्भ करके अठारहवें सूत्रतक उस प्रकरणको समाप्त कर दिया गया। अब पहले आरम्भ किये हुए प्रकरणपर दूसरी श्रुतियोंके विषयमे विचार आरम्भ किया जाता है— समान एवं चाभेदात् ॥ ३ । ३ । १९ ॥ समाने=एक शाखामें; च=भी; एवम्=इसी प्रकार विद्याकी एकता समझनी चाहिये; अभेदात्=क्योंकि दोनों जगह उपास्यमे कोई भेद नहीं है। व्याख्या—वाजसनेयी शाखाके शतपथ-ब्राह्मणमे 'सत्य ही ब्रह्म है, इस प्रकार उपासना करनी चाहिये, निस्सन्देह यह पुरुष सङ्कल्पमय है। वह जितने सङ्कल्पों- से युक्त होकर इस लोकसे प्रयाण करता है, परलोकमे जानेपर वैसे ही सङ्कल्प- वाला होकर उत्पन्न होता है, वह मनोमय प्राण-शरीरवाले आकाशस्वरूप आत्माकी उपासना करे।' इस प्रकार शाण्डिल्य-विद्याका वर्णन किया गया है (श० ब्रा० १० । ६ । ३ । २)*। उसी शाखाके बृहदारण्यकमे भी कहा है कि 'प्रकाश ही जिसका सत्य स्वरूप है वह पुरुष मनोमय है, वह धान और जौ आदिके सदृश सूक्ष्म परिमाणवाला है, वह उस हृदयाकाशमे स्थित है, वह सबका स्वामी और सबका अधिपति है तथा यह जो कुछ है, सभीकां उत्तम शासन करता है।' (बृह० उ० ५ । ६ । १)† इन दोनो ग्रन्थोंमें कही हुई इन विद्याओंमें
- 'सत्यं ब्रह्मेत्युपासीत । अथ खलु क्रतुमयोऽयं पुरुषः स यावत्क्रतुरयमस्माल्लो- कात्प्रेति एवंक्रतुर्भूत्वामुं लोकं प्रेत्याभिसंभवति स आत्मानमुपासीत मनोमयं प्राणशरीरं भारूपं सत्यसंकल्पमाकाशात्मानम्।' † 'मनोमयोऽयं पुरुषो भाः सत्यस्तस्मिन्नन्तर्हृदये यथा ब्रीहिर्वा यवो वा स एष सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः सर्वमिदं प्रशास्ति यदिदं किञ्च।' (बृह० उ० ५ । ६ । १)