ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 287, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ें२६६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ अवधारणात् = निर्धारित किये जानेके कारण; स्यात् = (आनन्दमय ही ब्रह्म है) यह बात सिद्ध होती है। व्याख्या—यदि कहो कि "तैत्तिरीयोपनिषद्की ब्रह्मवल्लीमे 'आत्मा' शब्दका प्रयोग तो सभी वाक्योके अन्तमे आया है, फिर केवल 'आत्मा' शब्दके प्रयोगसे 'आनन्दमय' को ही ब्रह्म कैसे मान लिया जाय ?" तो इसके उत्तरमें कहते हैं कि जिस 'आत्मा' शब्दकी सभी वाक्योंमें व्याप्ति है, वह ब्रह्मका वाचक नहीं है; अपितु अन्तमें जिसको निर्धारित कर दिया गया है, वह ब्रह्मका वाचक है। अन्नमय, प्राणमय आदि आत्माओंको शरीर और ब्रह्मको उनका अन्तरात्मा बतलानेके उद्देश्यसे वहाँ सबके साथ 'आत्मा' शब्दका प्रयोग किया गया है। इसीलिये अन्नमयका अन्तरात्मा उससे भिन्न प्राणमयको बतलाया; फिर प्राणमयका अन्तरात्मा उससे भिन्न मनोमयको बतलाया और मनोमयका अन्तरात्मा विज्ञानमयको तथा विज्ञानमयका भी अन्तरात्मा आनन्दमयको बतलाया। उसके बाद आनन्दमयका अन्तरात्मा अन्य किसीको नहीं बतलाया और अन्तमें यह निर्धारित कर दिया कि इसका शरीरसम्बन्धी आत्मा यह स्वयं ही है, जो कि पहले कहे हुए अन्य सब पुरुषोंका भी आत्मा है। यह कहकर उसीसे जगत्की उत्पत्तिका वर्णन किया। इस प्रकार यहाँ आनन्दमयको पूर्णरूपसे परमात्मा निश्चित कर दिया गया है। इसीसे यह सिद्ध होता है कि आनन्दमय शब्द परमात्माका वाचक है। सम्बन्ध—"इस प्रकरणमें आत्मासे आकाशादि भूतोंकी उत्पत्तिका वर्णन करने- के बाद पृथिवीसे ओषधि, ओषधिसे अन्न और अन्नसे पुरुषकी उत्पत्ति बतलायी, फिर कहा कि 'निश्चयपूर्वक वही यह पुरुष अन्नरसमय है।' इस वर्णनके अनुसार 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' इस वाक्यद्वारा बतलाया हुआ ब्रह्म ही यहाँ अन्नरसमय पुरुष है या उससे भिन्न ?" इस जिज्ञासापर कहते हैं— कार्याख्यानादपूर्वम् ॥ ३ । ३ । १८ ॥ कार्याख्यानात् = ब्रह्मका कार्य बतलाया जानेके कारण यह पुरुष; अपूर्वम् = वह पूर्वोक्त ब्रह्म नहीं हो सकता। व्याख्या—इस प्रकरणमें जिस अन्नरसमय पुरुषका वर्णन है, वह पूर्वोक्त परब्रह्म नहीं हो सकता, किन्तु अन्नका परिणामभूत यह सजीव मनुष्य-शरीर ही यहाँ