ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 286, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र १४—१७ ] अध्याय ३ २६५ आत्मशब्दात्=आत्मशब्दका प्रयोग होनेके कारण; च=भी ( यह सिद्ध हो जाता है )। व्याख्या—ऊपर कहे हुए कारणके सिवा, इस प्रकरणमे बारम्बार सबका अन्तरात्मा बताते हुए अन्तमे विज्ञानमयका अन्तरात्मा आनन्दमयको बतलाया है, उसके बाद उसका अन्तरात्मा दूसरे किसीको नहीं बतलाया । इससे यह सिद्ध हो जाता है कि यहाँ आनन्दमय शब्द ब्रह्मका ही वाचक है । सम्बन्ध—'आत्मा' शब्दका प्रयोग तो अधिकतर प्रत्यगात्मा ( जीवात्मा ) का ही वाचक होता है । फिर यह निश्चय कैसे हुआ कि यहाँ 'आत्मा' शब्द ब्रह्मका वाचक है ? इसपर कहते हैं— आत्मगृहीतिरितरवदुत्तरात् ॥ ३ । ३ । १६ ॥ आत्मगृहीतिः=आत्मशब्दसे परमात्माका ग्रहण; इतरवत्=दूसरी जगहकी भाँति; उत्तरात्=उसके बादके वर्णनसे ( सिद्ध होता है )। व्याख्या—जिस प्रकार 'आत्मा वा इदमेकमेवाग्र आसीन्नान्यत् किञ्चन मिषत् स ईक्षत लोकान्नु सृजै', ( ऐ० उ० १ । १ ) 'पहले यह एक आत्मा ही था, उसने इच्छा की कि मै लोकोंकी रचना करूँ।' ( ऐ० उ० १ । १ । १ ) इस श्रुतिमे प्रजाकी सृष्टिके प्रकरणको लेकर 'आत्मा' शब्दका प्रयोग हुआ है, इसलिये यहाँ 'आत्मा' शब्दको ब्रह्मका वाचक माना गया । उसी प्रकार तैत्तिरीय- श्रुतिमे भी आनन्दमयका वर्णन करनेके बाद तत्काल ही 'सोऽकामयत बहु स्याम्'— 'उसने इच्छा की कि मै बहुत हो जाऊँ।' इत्यादि वाक्योद्वारा उस आनन्दमय आत्मासे समस्त जगत्की उत्पत्तिका वर्णन किया गया है । अतः बादमे आये हुए इस वर्णनसे ही यह सिद्ध हो जाता है कि यहाँ 'आत्मा' शब्द परमात्माका ही वाचक है और 'आनन्दमय' नाम भी यहाँ उस परब्रह्मका ही है । सम्बन्ध—ऊपर कही हुई बातमें पुनः शङ्का उपस्थित करके उसका उत्तर देते हुए पूर्वोक्त सिद्धान्तको दृढ़ करते हैं— अन्वयादिति चेत्स्यादवधारणात् ॥ ३ । ३ । १७ ॥ चेत्=यदि कहो कि; अन्वयात्=प्रत्येक वाक्यमें आत्मशब्दका अन्वय होनेके कारण यह सिद्ध नहीं होता कि आनन्दमय ब्रह्म है; इति=तो इसका उत्तर यह है कि;