ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र २-३ ] अध्याय ३ २५७
सूत्र २-३ ] अध्याय ३ २५७ उत्पत्ति बतायी है। इस तरह भिन्न-भिन्न कारणोंसे और भिन्न-भिन्न क्रमसे जगत्की उत्पत्तिका वर्णन किया गया है। इन सब वेदवाक्योंकी एकता नहीं हो सकती। इसी प्रकार दूसरे विषयमे भी समझना चाहिये। ऐसा यदि कोई कहे तो यह ठीक नहीं है, क्योकि यहाँ सभी श्रुतियोंका अभिप्राय जगत्की उत्पत्तिके पहले उसके कारणरूप एक परमेश्वरको बताना है, उसीको 'सत्' नामसे कहा गया है तथा उसीका 'आत्मा', 'आनन्दमय', 'प्रजापति' और 'अव्याकृत' नामसे भी वर्णन किया गया है। इस प्रकार एक ही तत्त्वका प्रतिपादन करनेवाली एक विद्यामें वर्णनका भेद होना अनुचित नहीं है, उद्देश्य और फल एक होनेके कारण उन सबकी एकता ही है। सम्बन्ध—'मुण्डकोपनिषद्'में कहा है कि 'जिन्होंने शिरोव्रतका अर्थात् सिरपर जटा धारणपूर्वक ब्रह्मचर्यव्रतका विधिपूर्वक पालन किया हो, उन्हींको इस ब्रह्म- विद्याका उपदेश देना चाहिये।' (३।२।१०) किन्तु दूसरी शाखावालोंने ऐसा नहीं कहा है; अतः इस आथर्वणशाखामें बतायी हुई ब्रह्मविद्याका अन्य शाखामें कही हुई ब्रह्मविद्यासे अवश्य भेद होना चाहिये।" ऐसी शङ्का होनेपर कहते हैं— स्वाध्यायस्य तथात्वेन हि समाचारेऽधिकाराच्च सववच्च तन्नियमः ॥ ३ । ३ । ३ ॥ स्वाध्यायस्य = यह शिरोव्रतका पालन अध्ययनका अङ्ग है; हि=क्योंकि; समाचारे = आथर्वणशाखावालोंके परम्परागत शिष्टाचारमें; तथात्वेन = अध्ययनके अङ्गरूपसे ही उसका विधान है; च=तथा; अधिकारात् =उस व्रतका पालन करनेवालेका ही ब्रह्मविद्या-अध्ययनमें अधिकार होनेके कारण; च=भी; सववत् = 'सव' होमकी भाँति; तन्नियमः =वह शिरोव्रतवाला नियम आथर्वणशाखावालोंके लिये ही है। व्याख्या—आथर्वण-शाखाके उपनिषद् (मु० उ० ३ । २ । १०) में कहा गया है कि 'तेषामेवैतां ब्रह्मविद्यां वदेत शिरोव्रतं विधिवद् यैस्तु चीर्णम्।'—'उन्हीं- को इस ब्रह्मविद्याका उपदेश करना चाहिये, जिन्होंने विधिपूर्वक शिरोव्रतका पालन किया है।' उक्त शाखावालोंके लिये जो शिरोव्रतके पालनका नियम किया गया है, वह विद्याके भेदके कारण नहीं; अपितु उन शाखावालोंके अध्ययन- विषयक परम्परागत आचारमें ही यह नियम चला आता है कि जो शिरोव्रतका वे० द० १७—
२५८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ पालन करता हो, उसीको उक्त ब्रह्मविद्याका उपदेश करना चाहिये। उसीका उसमे अधिकार है। जिसने शिरोव्रतका पालन नहीं किया, उसका उस ब्रह्म- विद्याके अध्ययनमे अधिकार नहीं है। जिस प्रकार 'सव' होमका नियम उन्हींकी शाखावालोंके लिये है, वैसे ही इस शिरोव्रतके पालनका नियम भी उन्हींके लिये है। इस प्रकार यह नियम केवल अध्ययनाध्यापनके विषयमे ही होनेके कारण इससे ब्रह्मविद्याकी एकतामे किसी प्रकारका विरोध नहीं है। सम्बन्ध—सब उपनिषदोंमें एक परमात्माके स्वरूपको बतानेके लिये ही प्रकार- भेदसे ब्रह्मविद्याका वर्णन है, यह बात वेदप्रमाणसे भी सिद्ध करते हैं— दर्शयति च ॥ ३ । ३ । ४ ॥ दर्शयति च=श्रुति भी यही बात दिखाती है। व्याख्या—कठोपनिषद्में कहा है कि 'सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति'—'समस्त वेद जिस परम प्राप्य परमेश्वरका प्रतिपादन करते है।' इत्यादि (क० उ० १ । २ । १५) इसी प्रकारका वर्णन अन्यान्य श्रुतियोमे भी है। तथा श्रीमद्भगवद्गीतामे भगवान्ने भी कहा है कि 'वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः' (१५। १५) 'सब वेदोके द्वारा जाननेयोग्य मै ही हूँ।' इस प्रकार श्रुति-स्मृतियोके सभी वचनोका एक ही उद्देश्य देखनेमे आता है। इसलिये यही सिद्ध होता है कि ब्रह्मविद्या भिन्न-भिन्न नहीं है। सम्बन्ध—यदि यही बात है तो एक जगहके वर्णनमें दूसरी जगहकी अपेक्षा कुछ बातें अधिक बतायी गयी हैं और कहीं कुछ बातें कम हैं, ऐसी परिस्थितिमें विभिन्न प्रकरणोंके वर्णनकी एकता कैसे होगी? इस जिज्ञासापर कहते हैं— उपसंहारोऽर्थभेदाद्विधिशेषवत्समाने च ॥ ३ । ३ । ५ ॥ समाने=एक प्रकारकी विद्यामे; च=ही; अर्थाभेदात्=प्रयोजनमे भेद न होनेके कारण; उपसंहारः=एक जगह कहे हुए गुणोंका दूसरी जगह उपसंहार कर लेना; विधिशेषवत्=विधिशेषकी भाँति (उचित है)। व्याख्या—जिस प्रकार कर्मकाण्डमे प्रयोजनका भेद न होनेपर एक शाखामे बताये हुए यज्ञादिके विधिशेषरूप अग्निहोत्र आदि धर्मोंका दूसरी जगह भी उपसंहार (अध्याहार) कर लिया जाता है, उसी प्रकार विभिन्न प्रकरणोंमें आयी हुई ब्रह्मविद्याके वर्णनमे
सूत्र ४—६ ] अध्याय ३ २५९
सूत्र ४—६ ] अध्याय ३ २५९ भी प्रयोजन-भेद न होनेके कारण एक जगह कही हुई अधिक बातोका दूसरी जगह उपसंहार ( अध्याहार ) कर लेना चाहिये । सम्बन्ध—श्रुतिमें वर्णित जो ब्रह्मविद्याएँ है, उनमें कहीं शब्दभेदसे, कहीं नामभेदसे और कहीं प्रकरणके भेदसे भिन्नता प्रतीत होती है, अतः उनकी एकताका प्रतिपादन करनेके लिये सूत्रकार स्वयं शङ्का उठाकर उसका समाधान करते हैं— अन्यथात्वं शब्दादिति चेन्नाविशेषात् ॥ ३ । ३ । ६ ॥ चेत्=यदि ऐसा कहो कि; शब्दात्=कहे हुए शब्दसे; अन्यथात्वम्=दोनोकी भिन्नता प्रतीत होती है, अतः एकता सिद्ध नहीं होती; इति न=तो ऐसी बात नहीं है, अविशेषात्=विधि और फल आदिमे भेद न होनेके कारण (दोनो विद्याओंमे समानता है ) । व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद्के 'आठवे अध्यायमे दहरविद्या और प्राजापत्य- विद्या—इस प्रकार दो ब्रह्मविद्याओका वर्णन है। वे दोनो विद्याएँ परब्रह्म परमात्मा- की प्राप्तिका मार्ग बतानेवाली है, इसलिये उनकी समानता मानी जाती है। इसपर पूर्वपक्षकी ओरसे शङ्का उठायी जाती है कि दोनो विद्याओंमे शब्दका अन्तर है अर्थात् दहरविद्याके प्रकरणमे तो यह कहा गया है कि 'मनुष्य-शरीररूप ब्रह्मपुरमे हृदयरूप घरके भीतर जो आन्तरिक आकाश है और उसके भीतर जो वस्तु है, उसका अनुसन्धान करना चाहिये।' (छा० उ० ८ । १ । १) तथा प्राजापत्यविद्यामे 'अपहतपाप्मा' आदि विशेषणोसे युक्त आत्माको जाननेके योग्य बताया गया है (८ । ७ । १) । इस प्रकार दोनो विद्याओंके वर्णनमे शब्दका भेद है, इसलिये वे दोनो एक नहीं हो सकतीं। इसके उत्तरमे सूत्रकार कहते हैं कि ऐसी बात नहीं है, क्योकि दहरविद्यामे उस अन्तराकाशको ब्रह्मलोक, आत्मा और सबको धारण करनेवाला कहा गया है तथा उसे सब पापो और सब विकारोसे रहित तथा सत्यसङ्कल्प आदि समस्त दिव्य गुणोसे सम्पन्न बताकर (छा० उ० ८ । १ । ५) उसी जाननेयोग्य तत्त्वको ( छा० उ० ८ । १ । ६ ) परब्रह्म निश्चित किया गया है, उसी प्रकार प्राजापत्य-विद्यामे भी उस जाननेयोग्य तत्त्वको आत्मा नामसे कहकर उसे समस्त पापो औरविकारोसे रहित तथा सत्यसङ्कल्पत्व, सत्यकामत्व आदि दिव्य गुणोसे युक्त परब्रह्म निश्चित किया गया है। दहर-विद्यामे दहर
२६० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ आकाशको ही उपास्य बताया गया है, न कि उसके अन्तर्वर्ती लोकोंको ।, वहाँ प्रकारान्तरसे उस ब्रह्मको सबका आधार बतानेके लिये पहले उसके भीतरकी वस्तुओंको खोजनेके लिये कहा गया है । इस प्रकार वास्तवमे कोई भेद न होनेके कारण दोनो विद्याओंकी एकता है । इसी प्रकार दूसरी विद्याओंमे भी समानता समझ लेनी चाहिये । सम्बन्ध—पूर्वोक्त विद्याओंकी एकता सिद्ध करनेके लिये दूसरी असमान विद्याओंसे उनकी विशेषताका प्रतिपादन करते हैं— न वा प्रकरणभेदात्परोवरीयस्त्वादिवत् ॥ ३ । ३ । ७ ॥ वा=अथवा; परोवरीयस्त्वादिवत्=परम उत्कृष्टता आदि गुणोंसे युक्त दूसरी विद्याओंकी भाँति; प्रकरणभेदात्=प्रकरणके भेदसे उक्त दोनों विद्याएँ भिन्न; न=सिद्ध नहीं हो सकतीं । व्याख्या—छान्दोग्य और बृहदारण्यकोपनिषद्में उद्गीथ-विद्याका प्रकरण आता है, किन्तु छान्दोग्यमे जो उद्गीथ-विद्या है वह अत्यन्त श्रेष्ठ है, क्योकि वहाँ उद्गीथकी ॐ कार' अक्षरके साथ एकता करके उसका महत्त्व बढ़ाया गया है; ( छा० उ० १ । १ पूरा खण्ड ) इसलिये उसका फल भी अत्यन्त श्रेष्ठ बताया गया है (छा० उ० १ । ९ । १ से ४ तक ); किन्तु बृहदारण्यककी उद्गीथविद्या केवल प्राणोंका श्रेष्ठत्व सम्पादन करनेके लिये तथा यज्ञादिमें उद्गीथगानके समय स्वरकी विशेषता दिखानेके लिये है (बृह० उ० १ । ३ । १ से २७ तक) । इसलिये उसका फल भी वैसा नहीं बताया गया है । दोनो प्रकरणोंमे केवल देवासुर-संवाद- विषयक समानता है, पर उसमें भी उपासनाके प्रकारका भेद है । अतः किञ्चिन्मात्र समानताके कारण दोनोंकी समानता नहीं हो सकती। समानताके लिये उद्देश्य, विधेय और फलकी एकता चाहिये, वह उन प्रकरणोमे नहीं है । इसलिये उनमें भेद होना उचित है । किन्तु ऊपर कही हुई दहरविद्या और प्राजापत्य विद्यामे ऐसी बात नहीं है, केवल वर्णनका भेद है । अतः वर्णनमात्रका भेद होनेके कारण उत्तम और मध्यम फल आदिके भेदसे युक्त उद्गीथविद्याकी भाँति ऊपर कही हुई दहरविद्या और प्राजापत्यविद्यामे भेद सिद्ध नहीं हो सकता; क्योंकि दोनोके उद्देश्य, विधेय और फलमे भेद नहीं है । सम्बन्ध—अब दूसरे प्रकारकी शङ्काका उत्तर देकर दोनों विद्याओंकी एकता सिद्ध करते हैं—
सूत्र ७—१० ] अध्याय ३ २६१
सूत्र ७—१० ] अध्याय ३ २६१ संज्ञातश्चेत्तदुक्तमस्ति तु तदपि ॥ ३ । ३ । ८ ॥ चेत् = यदि कहो कि; संज्ञातः = संज्ञासे परस्पर-भेद होनेके कारण (एकता सिद्ध नहीं हो सकती) तो; तदुक्तम् = उसका उत्तर (सूत्र ३।३।१ मे) दे चुके हैं; तु = तथा; तदपि = वह (संज्ञाभेदके कारण होनेवाली विद्याविषयक विषमता) भी; अस्ति = अन्यत्र है। व्याख्या—यदि कहो कि उसमे संज्ञाका अर्थात् नामका भेद है; उस विद्या- का नाम दहरविद्या है और दूसरीका नाम प्राजापत्य-विद्या है, इसलिये दोनोंकी एकता नहीं हो सकती तो इसका उत्तर हम पहले (सूत्र ३।३।१ मे) ही दे चुके हैं। वहाँ बता आये है कि समस्त उपनिषदोंमे भिन्न-भिन्न नामोसे जिन ब्रह्मविद्याओका वर्णन है, उन सबमे विधिवाक्य, फल और उद्देश्य-विधेय आदिकी एकता होनेसे सब ब्रह्मविद्याओकी एकता है। इसलिये यहाँ संज्ञा-भेदसे कोई विरोध नहीं है। इसके सिवा, जिनमे उद्देश्य, विधेय और फल आदिकी समानता नहीं है, उन विद्याओमे संज्ञा आदिके कारण भेद होता है और वैसी विद्याओका वर्णन भी उपनिषदोंमे है ही (छा० उ० ३।१८।१ तथा ३।१९।१)। सम्बन्ध—नामका भेद होनेपर भी विद्यामें एकता हो सकती है, इस बातको सिद्ध करनेके लिये दूसरा कारण बतलाते हैं— व्याप्तेश्च समञ्जसम् ॥ ३ । ३ । ९ ॥ व्याप्तेः = ब्रह्म सर्वत्र व्याप्त है, इस कारण; च = भी; समञ्जसम् = ब्रह्मविद्याओ- मे समानता है। व्याख्या—परब्रह्म परमात्मा सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान् और सर्वज्ञ है, इसलिये ब्रह्मविषयक विद्याके भिन्न-भिन्न नाम और प्रकरण होनेपर भी उनकी एकता होना उचित है, क्योंकि उन ब्रह्मविषयक सभी विद्याओंका उद्देश्य एकमात्र परब्रह्म परमात्माके ही स्वरूपका नाना प्रकारसे प्रतिपादन करना है। सम्बन्ध—अब यह जिज्ञासा होती है कि विद्याओंकी एकता और भिन्नता- का निर्णय करनेके लिये प्रकरण, संज्ञा और वर्णनकी एकता और भेदकी अपेक्षा है या नहीं? इसपर कहते हैं— सर्वाभेदादन्यत्रेमे ॥ ३ । ३ । १० ॥
२६२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ सर्वभेदात् = सर्वरूप परब्रह्मसम्बन्धी विद्यासे; अन्यत्र = दूसरी विद्याके सम्बन्धमे; इमे = इन पूर्व सूत्रोमे कहे हुए सभी हेतुओंका उपयोग है। व्याख्या-परब्रह्म परमात्मा सबसे अभिन्न सर्वरूप है। अतः उनके तत्त्व- का प्रतिपादन करनेवाली विद्याओंमें भी भेद नहीं है। अतः संज्ञा, प्रकरण और शब्दसे इनकी भिन्नता सिद्ध नहीं की जा सकती; क्योंकि ब्रह्मकी सभी संज्ञाएँ हो सकती हैं। प्रत्येक प्रकरणमें उसकी बात आ सकती है तथा उसका वर्णन भी भिन्न-भिन्न सभी शब्दोंद्वारा किया जा सकता है। किन्तु ब्रह्मविद्याके अतिरिक्त जो दूसरी विद्याएँ हैं, जिनका उद्देश्य ब्रह्मका प्रतिपादन करना नहीं है; उनकी एक-दूसरोमे भिन्नता या अभिन्नताको समझनेके लिये पहले कहे हुए प्रकरण, संज्ञा और शब्द—इन तीनों हेतुओंका उपयोग किया जा सकता है। सम्बन्ध—'श्रुतिमें एक जगह ब्रह्मविद्याके प्रकरणमें ब्रह्मके जो आनन्द, सर्वज्ञता, सर्वकामता, सत्यसङ्कल्पत्व, सर्वेश्वरत्व तथा सर्वशक्तिमत्ता आदि धर्म बताये गये हैं, उनका उपसंहार ( संग्रह ) दूसरी जगह ब्रह्मके वर्णनमें किया जा सकता है या नही ?' इस जिज्ञासापर कहते हैं— आनन्दादयः प्रधानस्य ॥ ३ । ३ । ११ ॥ आनन्दादयः = आनन्द आदि; प्रधानस्य = सर्वश्रेष्ठ परब्रह्म परमात्माके धर्म हैं ( उन सबका अन्यत्र भी ब्रह्मके वर्णनमें अध्याहार कर लेना चाहिये ) । व्याख्या-आनन्द, सर्वगतत्व, सर्वात्मत्व तथा सर्वज्ञता आदि जितने भी परब्रह्म परमात्माके धर्म हैं, वे यदि श्रुतिमें एक जगह ब्रह्मके वर्णनमें आये हैं तो दूसरी जगह भी ब्रह्मके वर्णनमें उनका उपसंहार कर लेना चाहिये अर्थात् एक जगहके वर्णनमे जो धर्म या दिव्य गुण-सूचक विशेषण छूट गये हैं, उनकी पूर्ति अन्यत्रके वर्णनसे कर लेनी चाहिये। सम्बन्ध—'यदि ऐसी बात है, तब तो तैत्तिरीयोपनिषद्में जो आनन्दमय आत्माका प्रकरण प्रारम्भ करके कहा गया है कि 'प्रिय ही उसका सिर है, मोद दाहिना पंख है, प्रमोद बाँयाँ पंख है, आनन्द आत्मा है और ब्रह्म ही पुच्छ एवं प्रतिष्ठा है।' इसके अनुसार 'प्रियशिरस्त्व' आदि धर्मोंका भी सर्वत्र ब्रह्म- विद्यामें संग्रह हो सकता है ?' ऐसी आशङ्का होनेपर कहते हैं—
सूत्र ११-१३] अध्याय ३ २६३
सूत्र ११-१३] अध्याय ३ २६३ प्रियशिरस्त्वाद्यप्राप्तिरुपचयापचयौ हि भेदे ॥ ३ । ३ । १२ ॥ प्रियशिरस्त्वाद्यप्राप्तिः= 'प्रियशिरस्त्व'—'प्रियरूप सिरका होना' आदि धर्मोंकी प्राप्ति अन्यत्र ब्रह्मविद्याके प्रकरणमे नहीं होती है; हि=क्योकि; भेदे=इस प्रकार सिर आदि अङ्गोका भेद मान लेनेपर; उपचयापचयौ=ब्रह्ममे बढ़ने-घटने- का दोष उपस्थित होगा । व्याख्या—प्रिय उसका सिर है, मोद और प्रमोद पाँख है, इस प्रकार पक्षी- का रूपक देकर जो अङ्गोकी कल्पना की गयी है, यह ब्रह्मका स्वरूपगत धर्म नहीं है; अतः इसका संग्रह दूसरी जगह ब्रह्मविद्याके प्रसङ्गमे करना उचित नहीं है; क्योकि इस प्रकार अङ्ग-प्रत्यङ्गके भेदसे ब्रह्ममे भेद मान लेनेपर उसमे बढ़ने-घटने- के दोषकी आशङ्का होगी; इसलिये जो ब्रह्मके स्वाभाविक लक्षण न हो, किसी रूपकके उद्देश्यसे कहे गये हो, उनको दूसरी जगह नहीं लेना चाहिये । सम्बन्ध—उसमें जो आनन्द और ब्रह्म शब्द आये हैं, उनको दूसरी जगह लेना चाहिये या नहीं ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— इतरे त्वर्थसामान्यात् ॥ ३ । ३ । १३ ॥ तु=किन्तु; इतरे=दूसरे जो आनन्द आदि धर्म हैं वे (ब्रह्मके स्वरूपका प्रतिपादन करनेके लिये श्रुतिमें कहे गये हैं, इसलिये अन्यत्र ब्रह्मविद्याके प्रसङ्गमें उनका ग्रहण किया जा सकता है); अर्थसामान्यात्=क्योंकि उन सब स्थलोंमे अर्थकी समानता है । व्याख्या—रूपकके लिये अवयवकी कल्पनासे युक्त जो प्रियशिरस्त्व आदि धर्म हैं, उनको छोड़कर दूसरे-दूसरे जो आनन्द आदि स्वरूपगत धर्म हैं, उनका संग्रह प्रत्येक ब्रह्मविद्याके प्रसङ्गमे किया जा सकता है; क्योकि उनमे अर्थकी समानता है अर्थात् उन सबके द्वारा प्रतिपाद्य ब्रह्म एक ही है। सम्बन्ध—कठोपनिषद्में जो रथके रूपककी कल्पना करके इन्द्रिय आदिका घोड़े आदिके रूपमें वर्णन किया है, वहाँ तो इन्द्रिय आदि- के संयमकी बात समझानेके लिये वैसा कहना सार्थक मालूम होता है, परन्तु यहाँ तो पक्षीके रूपकका कोई विशेष प्रयोजन नही दीखता । अतः यहाँ इस रूपककी कल्पना किसलिये की गयी ? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
२६४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ आध्यानाय प्रयोजनाभावात् ॥ ३ । ३ । १४॥ प्रयोजनाभावात्=अन्य किसी प्रकारका प्रयोजन न होनेके कारण (यही मालूम होता है कि); आध्यानाय=उस परमेश्वरका भलीभाँति चिन्तन करनेके लिये (उसका तत्त्व रूपकद्वारा समझाया गया है)। व्याख्या—इस रूपकका दूसरा कोई प्रयोजन दिखलायी नहीं देता, इसलिये यही समझना चाहिये कि पहले जिस परब्रह्म परमेश्वरका सत्य, ज्ञान और अनन्तके नामसे वर्णन करके उसको सबके हृदयमें स्थित बतलाया है और उसकी प्राप्तिके महत्त्वका वर्णन किया है (तै० उ० २ । १)। उसको प्राप्त करनेका एकमात्र उपाय बारम्बार चिन्तन करना है पर उसके स्वरूपकी कुछ जानकारी हुए बिना चिन्तन नहीं हो सकता; अतः वह किस प्रकार सबके हृदयमे व्यास है, यह बात समझानेके लिये यहाँ अन्नमय आदि कोशवाचक शब्दोके द्वारा प्रकरण उठाया गया; क्योकि किसी पेटीमे बंद करके गुप्त रखे हुए रत्नकी भाँति वह परमेश्वर भी सबके हृदयमें बुद्धिरूप गुफाके भीतर छिपा है; यह तत्त्व समझाना है। वहाँ सबसे पहले जो यह अन्नमय स्थूल शरीर है, इसको पुरुषके नामसे कहकर उसके अंगोंकी पक्षीके अंगोसे तुलना करके आगेका प्रकरण चलाया गया, तथा क्रमशः एकका दूसरेको अन्तरात्मा बताते हुए प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय पुरुषका वर्णन किया गया। साथ ही प्रत्येकका आत्मा एक ही तत्त्वको निश्चित किया गया। इससे यह मालूम होता है कि उत्तरोत्तर सूक्ष्म तत्त्वके भीतर दृष्टि ले जाकर उस एक ही अन्तरात्माको लक्ष्य कराया गया है। वहाँ विज्ञानमय जीवात्माका वर्णन करके उसका भी अन्तरात्मा आनन्दमयको बतलाया। अन्तमे सबका अन्तरात्मा आनन्दमयको बतलाकर तथा उसका अन्तरात्मा भी उसीको बतलाकर इस रूपककी परम्पराको समाप्त कर दिया गया। इससे यही सिद्ध, होता है कि परब्रह्म परमेश्वरका भलीभाँति चिन्तन करनेके लिये उसके सूक्ष्म तत्त्वको समझाना ही इस रूपकका प्रयोजन है। सम्बन्ध—यहाँ आनन्दमय नामसे परमात्माको ही लक्ष्य कराया गया है, अन्य किसी तत्त्वको नहीं, यह निश्चय कैसे हो सकता है? इसपर कहते हैं— आत्मशब्दाच्च ॥ ३ । ३ । १५ ॥
सूत्र १४—१७ ] अध्याय ३ २६५
सूत्र १४—१७ ] अध्याय ३ २६५ आत्मशब्दात्=आत्मशब्दका प्रयोग होनेके कारण; च=भी ( यह सिद्ध हो जाता है )। व्याख्या—ऊपर कहे हुए कारणके सिवा, इस प्रकरणमे बारम्बार सबका अन्तरात्मा बताते हुए अन्तमे विज्ञानमयका अन्तरात्मा आनन्दमयको बतलाया है, उसके बाद उसका अन्तरात्मा दूसरे किसीको नहीं बतलाया । इससे यह सिद्ध हो जाता है कि यहाँ आनन्दमय शब्द ब्रह्मका ही वाचक है । सम्बन्ध—'आत्मा' शब्दका प्रयोग तो अधिकतर प्रत्यगात्मा ( जीवात्मा ) का ही वाचक होता है । फिर यह निश्चय कैसे हुआ कि यहाँ 'आत्मा' शब्द ब्रह्मका वाचक है ? इसपर कहते हैं— आत्मगृहीतिरितरवदुत्तरात् ॥ ३ । ३ । १६ ॥ आत्मगृहीतिः=आत्मशब्दसे परमात्माका ग्रहण; इतरवत्=दूसरी जगहकी भाँति; उत्तरात्=उसके बादके वर्णनसे ( सिद्ध होता है )। व्याख्या—जिस प्रकार 'आत्मा वा इदमेकमेवाग्र आसीन्नान्यत् किञ्चन मिषत् स ईक्षत लोकान्नु सृजै', ( ऐ० उ० १ । १ ) 'पहले यह एक आत्मा ही था, उसने इच्छा की कि मै लोकोंकी रचना करूँ।' ( ऐ० उ० १ । १ । १ ) इस श्रुतिमे प्रजाकी सृष्टिके प्रकरणको लेकर 'आत्मा' शब्दका प्रयोग हुआ है, इसलिये यहाँ 'आत्मा' शब्दको ब्रह्मका वाचक माना गया । उसी प्रकार तैत्तिरीय- श्रुतिमे भी आनन्दमयका वर्णन करनेके बाद तत्काल ही 'सोऽकामयत बहु स्याम्'— 'उसने इच्छा की कि मै बहुत हो जाऊँ।' इत्यादि वाक्योद्वारा उस आनन्दमय आत्मासे समस्त जगत्की उत्पत्तिका वर्णन किया गया है । अतः बादमे आये हुए इस वर्णनसे ही यह सिद्ध हो जाता है कि यहाँ 'आत्मा' शब्द परमात्माका ही वाचक है और 'आनन्दमय' नाम भी यहाँ उस परब्रह्मका ही है । सम्बन्ध—ऊपर कही हुई बातमें पुनः शङ्का उपस्थित करके उसका उत्तर देते हुए पूर्वोक्त सिद्धान्तको दृढ़ करते हैं— अन्वयादिति चेत्स्यादवधारणात् ॥ ३ । ३ । १७ ॥ चेत्=यदि कहो कि; अन्वयात्=प्रत्येक वाक्यमें आत्मशब्दका अन्वय होनेके कारण यह सिद्ध नहीं होता कि आनन्दमय ब्रह्म है; इति=तो इसका उत्तर यह है कि;
२६६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ अवधारणात् = निर्धारित किये जानेके कारण; स्यात् = (आनन्दमय ही ब्रह्म है) यह बात सिद्ध होती है। व्याख्या—यदि कहो कि "तैत्तिरीयोपनिषद्की ब्रह्मवल्लीमे 'आत्मा' शब्दका प्रयोग तो सभी वाक्योके अन्तमे आया है, फिर केवल 'आत्मा' शब्दके प्रयोगसे 'आनन्दमय' को ही ब्रह्म कैसे मान लिया जाय ?" तो इसके उत्तरमें कहते हैं कि जिस 'आत्मा' शब्दकी सभी वाक्योंमें व्याप्ति है, वह ब्रह्मका वाचक नहीं है; अपितु अन्तमें जिसको निर्धारित कर दिया गया है, वह ब्रह्मका वाचक है। अन्नमय, प्राणमय आदि आत्माओंको शरीर और ब्रह्मको उनका अन्तरात्मा बतलानेके उद्देश्यसे वहाँ सबके साथ 'आत्मा' शब्दका प्रयोग किया गया है। इसीलिये अन्नमयका अन्तरात्मा उससे भिन्न प्राणमयको बतलाया; फिर प्राणमयका अन्तरात्मा उससे भिन्न मनोमयको बतलाया और मनोमयका अन्तरात्मा विज्ञानमयको तथा विज्ञानमयका भी अन्तरात्मा आनन्दमयको बतलाया। उसके बाद आनन्दमयका अन्तरात्मा अन्य किसीको नहीं बतलाया और अन्तमें यह निर्धारित कर दिया कि इसका शरीरसम्बन्धी आत्मा यह स्वयं ही है, जो कि पहले कहे हुए अन्य सब पुरुषोंका भी आत्मा है। यह कहकर उसीसे जगत्की उत्पत्तिका वर्णन किया। इस प्रकार यहाँ आनन्दमयको पूर्णरूपसे परमात्मा निश्चित कर दिया गया है। इसीसे यह सिद्ध होता है कि आनन्दमय शब्द परमात्माका वाचक है। सम्बन्ध—"इस प्रकरणमें आत्मासे आकाशादि भूतोंकी उत्पत्तिका वर्णन करने- के बाद पृथिवीसे ओषधि, ओषधिसे अन्न और अन्नसे पुरुषकी उत्पत्ति बतलायी, फिर कहा कि 'निश्चयपूर्वक वही यह पुरुष अन्नरसमय है।' इस वर्णनके अनुसार 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' इस वाक्यद्वारा बतलाया हुआ ब्रह्म ही यहाँ अन्नरसमय पुरुष है या उससे भिन्न ?" इस जिज्ञासापर कहते हैं— कार्याख्यानादपूर्वम् ॥ ३ । ३ । १८ ॥ कार्याख्यानात् = ब्रह्मका कार्य बतलाया जानेके कारण यह पुरुष; अपूर्वम् = वह पूर्वोक्त ब्रह्म नहीं हो सकता। व्याख्या—इस प्रकरणमें जिस अन्नरसमय पुरुषका वर्णन है, वह पूर्वोक्त परब्रह्म नहीं हो सकता, किन्तु अन्नका परिणामभूत यह सजीव मनुष्य-शरीर ही यहाँ
सूत्र १८-१९] अध्याय ३ २६७
सूत्र १८-१९] अध्याय ३ २६७ अन्नरसमय पुरुषके नामसे कहा गया है; क्योंकि इस पुरुषको उस पूर्वोक्त ब्रह्मका आकाशादिके क्रमसे कार्य बतलाया गया है और इसका अन्तरात्मा प्राण- मय आदिके क्रमसे विज्ञानमय जीवात्माको बतलाया है तथा विज्ञानमयका आत्मा ब्रह्मको बतलाकर अन्तमे आनन्दके साथ उसकी एकता की गयी है। इसलिये जिसके 'सत्य', 'ज्ञान' और 'अनन्त' ये लक्षण बताये गये है तथा जो 'आत्मा' और 'आनन्दमय' नामसे जगत्का कारण बतलाया गया है, वह ब्रह्म इस अन्नरसमय पुरुषसे भिन्न सबका अन्तरात्मा है। सम्बन्ध—ग्यारहवें सूत्रसे 'आनन्द' के प्रकरणका विचार आरम्भ करके अठारहवें सूत्रतक उस प्रकरणको समाप्त कर दिया गया। अब पहले आरम्भ किये हुए प्रकरणपर दूसरी श्रुतियोंके विषयमे विचार आरम्भ किया जाता है— समान एवं चाभेदात् ॥ ३ । ३ । १९ ॥ समाने=एक शाखामें; च=भी; एवम्=इसी प्रकार विद्याकी एकता समझनी चाहिये; अभेदात्=क्योंकि दोनों जगह उपास्यमे कोई भेद नहीं है। व्याख्या—वाजसनेयी शाखाके शतपथ-ब्राह्मणमे 'सत्य ही ब्रह्म है, इस प्रकार उपासना करनी चाहिये, निस्सन्देह यह पुरुष सङ्कल्पमय है। वह जितने सङ्कल्पों- से युक्त होकर इस लोकसे प्रयाण करता है, परलोकमे जानेपर वैसे ही सङ्कल्प- वाला होकर उत्पन्न होता है, वह मनोमय प्राण-शरीरवाले आकाशस्वरूप आत्माकी उपासना करे।' इस प्रकार शाण्डिल्य-विद्याका वर्णन किया गया है (श० ब्रा० १० । ६ । ३ । २)*। उसी शाखाके बृहदारण्यकमे भी कहा है कि 'प्रकाश ही जिसका सत्य स्वरूप है वह पुरुष मनोमय है, वह धान और जौ आदिके सदृश सूक्ष्म परिमाणवाला है, वह उस हृदयाकाशमे स्थित है, वह सबका स्वामी और सबका अधिपति है तथा यह जो कुछ है, सभीकां उत्तम शासन करता है।' (बृह० उ० ५ । ६ । १)† इन दोनो ग्रन्थोंमें कही हुई इन विद्याओंमें
- 'सत्यं ब्रह्मेत्युपासीत । अथ खलु क्रतुमयोऽयं पुरुषः स यावत्क्रतुरयमस्माल्लो- कात्प्रेति एवंक्रतुर्भूत्वामुं लोकं प्रेत्याभिसंभवति स आत्मानमुपासीत मनोमयं प्राणशरीरं भारूपं सत्यसंकल्पमाकाशात्मानम्।' † 'मनोमयोऽयं पुरुषो भाः सत्यस्तस्मिन्नन्तर्हृदये यथा ब्रीहिर्वा यवो वा स एष सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः सर्वमिदं प्रशास्ति यदिदं किञ्च।' (बृह० उ० ५ । ६ । १)
२६८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ भेद है या अभेद ? यह संशय उपस्थित होनेपर सूत्रकार कहते हैं—जैसे भिन्न शाखाओंमें विद्याकी एकता और गुणोंका उपसंहार उचित माना गया है, उसी प्रकार एक शाखामें कही हुई विद्याओंमें भी एकता माननी चाहिये; क्योंकि वहाँ उपास्यमें भेद नहीं है। दोनों जगह एक ही ब्रह्म उपास्य बताया गया है। सम्बन्ध—उपास्यके सम्बन्धको लेकर किस जगह विद्याकी एकता माननी चाहिये और किस जगह नहीं ? इसका निर्णय करनेके लिये पूर्वपक्ष उपस्थित किया जाता है— सम्बन्धादेवमन्यत्रापि ॥ ३ । ३ । २० ॥ एवम्=इस प्रकार; सम्बन्धात्=उपास्यके सम्बन्धसे; अन्यत्र=दूसरी जगह; अपि=भी ( क्या विद्याकी एकता मान लेनी चाहिये ? ) । व्याख्या—इसी प्रकार एक ही उपास्यका सम्बन्ध बृहदारण्यकमें देखा जाता है। वहाँ पहले कहा गया है कि सत्य ही ब्रह्म है. इत्यादि ( बृह० उ० ५ । ५ । १ ); फिर इसी सत्यकी सूर्यमण्डलमें स्थित पुरुषके साथ और आँखमें स्थित पुरुषके साथ एकता की गयी है ( बृह० उ० ५ । ५ । २ )। उसके बाद दोनोंका रहस्यमय नाम क्रमशः 'अहर' और 'अहम्' बतलाया है। इस प्रकरण- में एक ही उपास्यका सम्बन्ध होनेपर भी स्थान-भेदसे पृथक्-पृथक् दो उपासनाएँ बतायी गयी हैं, अतः इनमें भेद मानना चाहिये या अभेद ? सम्बन्ध—पूर्वसूत्रमें उठायी हुई शङ्काका उत्तर अगले सूत्रमें देते हैं— न वा विशेषात् ॥ ३ । ३ । २१ ॥ न वा=इन दोनोंकी एकता नहीं माननी चाहिये; विशेषात्=क्योंकि इन दोनों पुरुषोंके रहस्यमय नाम और स्थानमें भेद किया गया है। व्याख्या—इन दोनों उपासनाओंके वर्णनमें स्थान और नाम भिन्न-भिन्न बताये गये हैं। सूर्यमण्डलमें स्थित सत्यपुरुषका तो रहस्यमय नाम 'अहर' कहा है और आँखमें स्थित पुरुषका रहस्यमय नाम 'अहम्' बतलाया है। इस प्रकार नाम और स्थानका भेद होनेके कारण इन उपासनाओंकी एकता नहीं मानी जा सकती; अतएव एकके नाम और गुणका उपसंहार दूसरे पुरुषमें नहीं करना चाहिये। सम्बन्ध—इस बातको श्रुतिप्रमाणसे स्पष्ट करते हैं—
सूत्र २०—२३ ] अध्याय ३ २६९
सूत्र २०—२३ ] अध्याय ३ २६९ दर्शयति च ॥ ३ । ३ । २२ ॥ दर्शयति च=श्रुति यही बात दिखलाती भी है। व्याख्या—जहाँ इस प्रकार स्थान और नामका भेद हो, वहाँ एक जगह कहे हुए गुण दूसरी जगह नहीं लिये जाते; यह बात श्रुतिद्वारा इस प्रकार दिखलायी गयी है। छान्दोग्योपनिषद्मे आधिदैविक सामके प्रसङ्गमे सूर्यस्थ पुरुषका वर्णन करके फिर आध्यात्मिक सामके प्रसङ्गमें आँखमे स्थित पुरुषका वर्णन किया गया है और वहाँ सूर्यस्थ पुरुषके नाम-रूप आदिका आँखमें स्थित पुरुषमे भी श्रुतिने स्वय विधान करके दोनोकी एकता की है (छा० उ० १ । ७ । ५ ) इससे यह सूचित होता है कि ऐसे स्थलोमें विद्याकी एकता मानकर एकके गुणोका अन्यत्र उपसंहार नहीं करना चाहिये; क्योकि ऐसे स्थलोंपर यदि सामान्यतः विद्याकी एकता मानकर गुणोका उपसंहार अभीष्ट होता तो उक्त प्रसङ्गमे श्रुति स्वयं सूर्यमे स्थित पुरुषके गुणोंका नेत्रवर्ती पुरुषमे विधान नहीं करती। सम्बन्ध—नेत्रवर्ती तथा सूर्यमण्डलवर्ती आदि पुरुषोंमे ब्रह्मके किन-किन गुणोका उपसंहार (अध्याहार) नहीं किया जा सकता ? इसका निर्णय ग्रन्थकार दो सूत्रोंद्वारा करते है— संभृतिद्युव्याप्त्यपि चातः ॥ ३ । ३ । २३ ॥ च=तथा; अतः = इसीलिये अर्थात् विद्याकी एकता न होनेके कारण ही; संभृतिद्युव्याप्ती-समस्त लोकोको धारण करना तथा द्युलोक आदि अखिल ब्रह्माण्डको व्याप्त करके स्थित होना—ये दोनों ब्रह्मसम्बन्धी गुण; अपि=भी अन्यत्र (नेत्रान्तर्वर्ती आदि पुरुषोंमे) नहीं लेने चाहिये। व्याख्या—बृहदारण्यकोपनिषद् ( ३ । ८ । ३ ) मे गार्गी और याज्ञवल्क्य- के संवादका वर्णन आता है। वहाँ गार्गिने याज्ञवल्क्यसे पूछा है—'जो द्युलोक- मे ऊपर है, जो पृथिवीसे नीचे है और जो द्युलोक एवं पृथिवीके मध्यमे है तथा स्वयं भी जो ये द्युलोक और पृथिवी हैं; इनके सिवा जिसे भूत, वर्तमान और भविष्य कहते हैं; वह सब किसमे ओतप्रोत है ?' इसके उत्तरमे याज्ञवल्क्यने कहा—'द्युलोकसे ऊपर और पृथिवीसे नीचेतक यह सब कुछ आकाशमें ओत- प्रोत है।' ( ३ । ८ । ४)। गार्गिने पूछा—'आकाश किसमे ओतप्रोत है?' ( ३ । ८ । ७) याज्ञवल्क्य बोले—'गार्गि ! उस तत्त्वको तो ब्रह्मवेत्ता पुरुष
२७० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ अक्षर कहते है, वह न मोटा है, न पतला है, न छोटा है, न बड़ा है, न लाल है, न चिकना है, न छाया है, न तम है, न वायु है, न आकाश है, न सङ्ग है, न रस है, न गन्ध है, न नेत्र है, न कान है, न वाणी है, न मन है, न तेज है, न प्राण है, न मुख है, न माप है, न भीतर है, न बाहर है, वह कुछ भी नहीं खाता, उसे कोई भी नहीं खाता ।' ( ३ । ८ । ८ ) इस प्रकार अक्षरब्रह्मके स्वरूपका वर्णन करके याज्ञवल्क्यने यह भी बताया कि 'ये सूर्य, चन्द्रमा, द्युलोक और पृथिवी आदि इसीके शासनमे है, इसीने इन सबको धारण कर रक्खा है।' ( ३ । ८ । ९ ) । इस प्रसङ्गमें अक्षरब्रह्मके स्वरूपका प्रतिपादन करते हुए दो बातें मुख्यरूपसे बतायी गयी है, एक तो वह द्युलोकसे ऊपर और पृथिवीके नीचेतक समस्त ब्रह्माण्डमे व्याप्त है और दूसरी बात यह है कि वही सबको धारण करनेवाला है । इन दोनो गुणोका नेत्रान्त- र्वती और सूर्यमण्डलवर्ती पुरुषोमे अध्याहार नहीं किया जा सकता; क्योकि प्रतीक उपासनाके लिये सीमित स्थानोमे स्थित कहे हुए पुरुष न तो सर्वव्यापक हो सकते हैं और न सबको धारण ही कर सकते है। इसी प्रकार अन्यत्र भी, जहाँ पूर्ण ब्रह्मका वर्णन नहीं है, उन प्रतीकोंमें इन गुणोंका उपसंहार नहीं हो सकता; यह भलीभाँति समझ लेना चाहिये । सम्बन्ध- 'उक्त पुरुषोंमें ब्रह्मके गुणोंका उपसंहार न हो, यह तो ठीक है, परन्तु पुरुषविद्यामें जो पुरुषके गुण बताये गये है, उनका उपसंहार तो अन्यत्र जहाँ-जहाँ पुरुषोंका वर्णन हो, उन सबमें होना ही चाहिये ।' ऐसी आशङ्का होनेपर कहते हैं— पुरुषविद्यायामिव चेतरेषामनाम्नानात् ॥ ३ । ३ । २४ ॥ पुरुषविद्यायाम् = पुरुषविद्यामे जो गुण बताये गये है; इव = वैसे गुण; च = भी; इतरेषाम् = अन्य पुरुषोके नहीं हो सकते; अनाम्नानात् = क्योकि श्रुतिमे उनके ऐसे गुण कहीं नहीं बताये गये है । व्याख्या—मुण्डकोपनिषद्मे ( २ । १ । २ से १० तक ) अक्षरब्रह्मका पुरुषके नामसे वर्णन किया गया है । वहाँ पहले अक्षरब्रह्मसे सबकी उत्पत्ति और उन्हींमें सबका लय ( २ । १ । १ ) बताकर उसे दिव्य अमूर्त पुरुष कहा गया है ( २ । १ । २ ) । फिर २ । १ । ३ से लेकर २ । १ । ९
सूत्र २४-२५ ] अध्याय ३ २७१
सूत्र २४-२५ ] अध्याय ३ २७१ तक उसीसे समस्त प्राण, इन्द्रिय, पञ्चभूत, सूर्य, चन्द्रमा, वेद, अग्नि, देवता, मनुष्य, अन्न, समुद्र तथा पर्वत आदिकी सृष्टि बतायी गयी है । तदनन्तर २ । १ । १० वें मन्त्रमे उस पुरुषकी महिमाका इस प्रकार वर्णन किया गया है—'पुरुष एवेदं विश्वं कर्म तपो ब्रह्म परामृतम् । एतद् यो वेद निहितं गुहायां सोऽविद्याग्रन्थि विकिरतीह सोम्य ।' अर्थात् 'पुरुष ही यह सब कुछ है, वही तप, कर्म और परम अमृतरूप ब्रह्म है । हे सोम्य ! हृदयरूप गुफामे स्थित इस अन्तर्यामी परम पुरुषको जो जानता है, वह यहीं इस मनुष्य- शरीरमे ही अविद्याजनित गाँठको छिन्न-भिन्न कर देता है ।' इस प्रकार इस पुरुषविद्याके प्रकरणमे जो पुरुषके सर्वोत्पादकत्व, परात्परत्व, सर्वव्यापकत्व तथा अविद्यानिवारकत्व आदि दिव्य गुण बताये गये है, उनका भी नेत्रान्तर्वर्ती और सूर्यमण्डलवर्ती आदि पुरुषोमे तथा जहाँ-जहाँ स्थूल, सूक्ष्म या कारणशरीरका वर्णन पुरुषके नामसे किया गया है, उन पुरुषोमे ( छा० उ० ५ । ९ । १ ) ( तै० उ० २ । १ से ७तक ) अध्याहार नहीं किया जा सकता; क्योकि श्रुतिमे कहीं भी उनके लिये वैसे गुणोंका प्रतिपादन नहीं किया गया है । उन प्रकरणोमे उन पुरुषोंके अन्तरात्मा परमपुरुषको लक्ष्य करानेके लिये उनको पुरुष नाम दिया गया है । सम्बन्ध—इसी प्रकार— वेधाद्यर्थभेदात् ॥ ३ । ३ । २५ ॥ वेधादि=बींधने आदिका वर्णन करके जो ब्रह्मको वेधका लक्ष्य बताया गया है, इन सबका अध्याहार भी अन्य विद्याओमे नहीं करना चाहिये, अर्थभेदात्= क्योंकि वहाँ प्रयोजनमे भेद है । व्याख्या—मुण्डकोपनिषद् ( २ । २ । ३ ) मे कहा है कि— धनुर्गृहीत्वौपनिषदं महास्त्रं शर ह्युपासानिशितं सन्धयीत । आयम्य तद्भावगतेन चेतसा लक्ष्यं तदेवाक्षरं सोम्य विद्धि ॥ 'हे सोम्य ! उपनिषद्मे वर्णित प्रणवरूप महान् धनुषको लेकर उसपर उपासनाद्वारा तीक्ष्ण किया हुआ बाण चढ़ाना चाहिये । फिर भावपूर्ण चित्तके द्वारा उस बाणको खींचकर तुम परम अक्षर परमेश्वरको ही लक्ष्य बनाकर उसे बींधो ।' इस वर्णनके पश्चात् दूसरे मन्त्रमे आत्माको ही बाणका रूप दिया गया है । इस
२७२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ प्रकार यहाँ जो ब्रह्मको आत्मरूप बाणके द्वारा बींधनेयोग्य बताया गया है; उसके इस वेध्यत्व आदि गुणोंका तथा ॐकारके धनुर्भाव और आत्माके बाणत्वका भी जहाँ ओंकारके द्वारा परमात्माकी उपासना करनेका प्रकरण है, उन ब्रह्मविद्याओमे उपसंहार नहीं करना चाहिये; क्योकि यहाँ चिन्तनमें तन्मयताका स्वरूप बतानेके लिये वैसा रूपक लिया गया है । इस तरह रूपककी कल्पनाद्वारा जो विशेष बात कही जाय, वे अन्य प्रकरणमे अनुपयुक्त होनेके कारण लेने योग्य नहीं हैं। सम्बन्ध—बीसवें सूत्रसे पचीसवें सूत्रतक भिन्न-भिन्न श्रुतियोंपर यह विचार किया गया कि उनमें कौन-कौन-सी बातें एक जगहसे दूसरी जगह अध्याहार करने योग्य नहीं हैं। अब परमगति अर्थात् परमधाम और परमात्माकी प्राप्तिविषयक श्रुतियोंपर विचार करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है । श्रुतियोंमें ब्रह्म- विद्याका फल कहीं तो केवल दुःख, शोक, बन्धन और शुभाशुभ कर्मोंकी निवृत्तिमात्र बतलाया है; कहीं उसके पश्चात् परम समता, परमधाम और परब्रह्म परमात्मा- की प्राप्तिका भी वर्णन है। अतः ब्रह्मविद्याके फलमें भेद है या नहीं ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— हानौ तूपायनशब्दशेषत्वात्कुशाच्छन्दस्तुत्युप- गानवत्तदुक्तम् ॥ ३ । ३ । २६ ॥ हानौ=जहाँ केवल दुःख, शोक, पुण्य, पाप आदिके नाशका ही वर्णन है ऐसी श्रुतिमें; तु=भी; उपायनशब्दशेषत्वात्=लाभरूप परमधामकी प्राप्ति आदि फलका भी अध्याहार कर लेना चाहिये, क्योंकि वह वाक्यका शेष भाग है; कुशाच्छन्दस्तुत्युपगानवत्=यह बात कुशा, छन्द, स्तुति और उपगानकी भाँति समझनी चाहिये; तत् उक्तम्=ऐसा पूर्वमीमांसामें कहा गया है । व्याख्या—उद्दालक आदि छः ऋषियोंको वैश्वानरविद्याका उपदेश देकर राजा अश्वपति कहते है कि जो इस विद्याको जानकर हवन करता है, उसके समस्त पाप उसी तरह भस्म हो जाते हैं, जिस प्रकार सींकका अग्रभाग अग्निमें डालनेसे हो जाता है । ( छा० उ० ५। २४ । ३) इसी प्रकार कठमें परमात्मज्ञानका फल कहीं केवल हर्ष-शोकका नाश (१।२। १२) और कहीं मृत्युमुखसे छूटना बताया , गया है (१।३।१५)। मुण्डकमे कहीं अविद्याका नाश (२।१।१०) और कहीं हृदयकी ग्रन्थि, समस्त संशय तथा कर्मोंका नाश कहा गया है (२।२।८)।
सूत्र २६ ] अध्याय ३ २७३
सूत्र २६ ] अध्याय ३ २७३ श्वेताश्वतरमे समस्त पाशोंसे छूट जाना तथा ( श्वे० उ० १ । ११; २ । १५; ४ । १५, १६; ५ । १३; ६ । १३ ) शोकका नाश होना ( श्वे० उ० ४ । ७) आदि ब्रह्मज्ञानका फल बताया गया है। इस प्रकार उपनिषदोंमे जगह-जगह ब्रह्मविद्याका फल पुण्य, पाप और नाना प्रकारके विकारोका नाश बतलाया गया है; उन मन्त्रोमे परमात्माकी या परमपदकी अथवा परमधामकी प्राप्ति नहीं बतलायी गयी। अत सूत्रकार कहते है कि 'ऐसे स्थलोमे जहाँ केवल दुःख, बन्धन एव कर्मोंके त्याग या नाश आदिकी बात बतायी गयी है, उसके वाक्य- शेषके रूपमे दूसरी जगह कहे हुए उपलब्धिरूप फलका भी अध्याहार कर लेना चाहिये। जैसे परमात्माका प्राप्त होना ( मु० उ० ३ । २ । ८), ब्रह्मधामकी प्राप्ति ( मु० उ० ३ । २ । ४ ), ब्रह्ममे लीन होना ( मु० उ० ३ । २ । ५ ) ब्रह्मलोकमें परम अमृतरूप हो जाना ( मु० उ० ३ । २ । ६ ), अर्चि आदि मार्गसे ब्रह्मलोकमे जाकर वहाँसे न लौटना (छा० उ० ४ । १५ । ५) आदि ही फलका वर्णन है; भाव यह कि जहाँ-जहाँ केवल हानि—पापनाश आदिका वर्णन है, वहाँ-वहाँ ब्रह्मलोक आदिकी प्राप्ति वाक्यशेष है और जहाँ केवल उपायन ( ब्रह्मधामकी प्राप्ति आदि ) का ही वर्णन है, वहाँ पूर्वोक्त हानि ( दुःखनाश आदि ) ही वाक्य-शेष है । इसलिये प्रत्येक समान-विद्यामें उसका अध्याहार कर लेना चाहिये; जिससे किसी प्रकारका विकल्प या फलभेद न रहे। इस प्रकार वाक्यशेष ग्रहण करनेका दृष्टान्त सूत्रकार देते हैं—जैसे कौषीतकि शाखावालोंने सामान्यतः वनस्पतिमात्रकी कुशा लेनेके लिये कहा है। परन्तु शाट्यायन शाखावाले उसके स्थानमे गूलरके काठकी बनी हुई कुशा लेनेके लिये कहते हैं; इसलिये उनका वह विशेष वचन कौषीतकिके सामान्य वचनका वाक्य-शेष माना जाता है और दोनों शाखावाले उसे स्वीकार करते है। इसी तरह एक शाखावाले 'छन्दोभिः स्तुवीत' (देव और असुरोके ) छन्दोंद्वारा स्तुति करे, इस प्रकार समान भावसे कहते है। किन्तु पैङ्गी शाखावाले 'देवोके छन्द पहले बोलने चाहिये' इस प्रकार विशेषरूपसे क्रम नियत कर देते हैं, तो उस क्रमको पूर्व कथनका वाक्य- शेष मानकर सभी स्वीकार करते हैं। जैसे किसी शाखामे 'षोडशिनः स्तोत्रमुपा- करोति' (षोडशीका स्तवन करे ) ऐसा सामान्य वचन मिलता है, परन्तु तैत्तिरीय शाखावाले इस कर्मको ऐसे समयमें कर्तव्य बतलाते हैं, जब ब्रह्मवेलामे तारे छिप गये हो और सूर्योदय अभी नहीं हुआ हो । अतः यह कालविशेषका वे० द० १८—
२७४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ नियम पूर्वकथित वाक्यका शेष होकर सबको मान्य होता है। तथा एक शाखावाले स्तुतिगानके विषयमें समानभावसे कहते हैं कि 'ऋत्विज उपगायन्ति'—'ऋत्विज् लोग स्तोत्रका गान करें' किन्तु दूसरी शाखावाले यह विधान करते है कि 'नाध्वर्यु- रुपगायति'—'अध्वर्युको स्तोत्र-गान नहीं करना चाहिये।' अतः इसको भी वाक्य-शेष मानकर सब यह स्वीकार करते हैं कि 'अध्वर्युको छोड़कर अन्य ऋत्विजोद्वारा स्तोत्रोंका गान होना चाहिये।' उसी प्रकार जहाँ केवल पाप आदिके नाशकी ही बात कही है, ब्रह्मलोकादिकी प्राप्ति नहीं बतलायी गयी है, वहाँ प्राप्तिरूप फलको भी वाक्यशेषके रूपमें ग्रहण कर लेना चाहिये। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि 'देवयानमार्गसे ब्रह्मलोकमे जानेवाले महापुरुषके पापकर्म नष्ट हो जाते हैं, परन्तु पुण्य-कर्म तो शेष रहते ही होंगे; अन्यथा उसका ब्रह्मलोकमें गमन कैसे सम्भव होगा ? क्योंकि ऊपरके लोकोंमें जाना शुभ कर्मोंका ही फल है।' इसपर कहते हैं— साम्पराये तर्तव्याभावात्तथा ह्यन्ये ॥ ३ । ३ । २७ ॥ साम्पराये=ज्ञानीके लिये परलोकमे; तर्तव्याभावात्=भोगके द्वारा पार करने योग्य कोई कर्मफल शेष नहीं रहता, इस कारण (उसके पुण्यकर्म भी यहीं समाप्त हो जाते हैं); हि=क्योंकि; तथा=यही बात; अन्ये=अन्य शाखावाले कहते हैं। व्याख्या—बृहदारण्यकोपनिषद्मे यह बात स्पष्ट शब्दोंमें बतायी गयी है कि 'उभे उ हैवौष एते तरति।' (४। ४। २२) अर्थात् 'यह ज्ञानी निश्चय ही पुण्य और पाप दोनोंको यहीं पार कर जाता है।' इससे यह सिद्ध होता है कि ज्ञानी पुरुषका शरीर त्याग देनेके बाद शुभाशुभ कर्मोंसे कोई सम्बन्ध नहीं रहता। उसे जो ब्रह्मलोक (नित्य धाम) प्राप्त होता है, वह किसी कर्मके फलरूपमें नहीं, अपितु ब्रह्मज्ञानके बलसे प्राप्त होता है। अतः उसके लिये परलोकमें जाकर भोगद्वारा पार करनेयोग्य कोई कर्मफल शेष नहीं रहता; इसलिये उसके पुण्यकर्म भी यहीं समाप्त हो जाते है। ज्ञानीके सञ्चित आदि समस्त कर्मोंका सर्वथा नाश हो जाता है, इस बातका समर्थन मुण्डकोपनिषद्मे भी इस प्रकार किया गया है—'तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्य-
सूत्र २७-२९ ] अध्याय ३ २७५
सूत्र २७-२९ ] अध्याय ३ २७५ मुपैति।' (मु० उ० ३ । १ । ३)--'उस समय ज्ञानी पुरुष पुण्य और पाप दोनोको हटाकर निर्मल हो सर्वोत्तम साम्यरूप परब्रह्मको प्राप्त कर लेता है।' सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि 'समस्त कर्मोंका नाश और ब्रह्मकी प्राप्तिरूप फल तो ब्रह्म-ज्ञानसे यहीं तत्काल प्राप्त हो जाता है। फिर देवयान- मार्गसे ब्रह्मलोकमें जाकर परमात्माको प्राप्त करनेकी बात क्यों कही गयी है?' इसपर कहते हैं— छन्दत उभयथाविरोधात् ॥ ३ । ३ । २८ ॥ छन्दतः=ज्ञानी पुरुषके सङ्कल्पके अनुसार; उभयथा=दोनो प्रकारकी स्थिति होनेमें; अविरोधात्=कोई विरोध नहीं है (इसलिये ब्रह्मलोकमें जानेका विधान है)। व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद् (३।१४।१) मे कहा है कि 'अथ खलु क्रतुमयः पुरुषो यथाक्रतुरस्मिँल्लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति।' अर्थात् 'यह पुरुष निश्चय ही सङ्कल्पमय है। इस लोकमें पुरुष जैसे सङ्कल्पवाला होता है, वैसा ही देहत्यागके पश्चात् यहाँसे परलोकमें जानेपर भी होता है।' इससे यह सिद्ध होता है कि जो ज्ञानी पुरुष किसी लोकमे जानेकी इच्छा न करके यहीं मुक्त होनेका सङ्कल्प रखता है, ब्रह्मज्ञानके लिये साधनमे प्रवृत्त होते समय भी जिसकी ऐसी ही भावना रही है, वह तो तत्काल यहीं ब्रह्म-सायुज्यको प्राप्त हो जाता है; परन्तु जो ब्रह्मलोक-दर्शनकी इच्छा रखकर साधनमे प्रवृत्त हुआ था तथा जिसका वहाँ जानेका सङ्कल्प है, वह देवयानमार्गसे वहाँ जाकर ही ब्रह्मको प्राप्त होता है। इस प्रकार साधकके सङ्कल्पानुसार दोनों प्रकारकी गति मान लेनेमे कोई विरोध नहीं है। सम्बन्ध—यदि इस प्रकार ब्रह्मलोकमें गये बिना यहाँ ही परमात्माको प्राप्त हो जाना मान लिया जाय तो क्या आपत्ति है? इसपर कहते हैं— गतेरर्थवत्त्वमुभयथान्यथा हि विरोधः ॥ ३ । ३ । २९ ॥ गतेः=गतिबोधक श्रुतिकी; अर्थवत्त्वम्=सार्थकता; उभयथा=दोनों प्रकारसे ब्रह्मकी प्राप्ति माननेपर ही होगी; हि=क्योंकि; अन्यथा=यदि अन्य प्रकारसे माने तो; विरोधः=श्रुतिमें परस्पर विरोध आयेगा। व्याख्या—श्रुतियोंमे कहीं तो तत्काल ही ब्रह्मकी प्राप्ति बतलायी है
(क० उ० २ । ३ । १४, १५), कहीं ब्रह्मलोकमे जानेपर बतायी है (मु० उ० ३ । २ । ६) । अतः यदि उपर्युक्त दोनों प्रकारसे उसकी व्यवस्था नहीं मानी जायगी तो दोनों प्रकारका वर्णन करनेवाली श्रुतियोंमें विरोध आयेगा। इसलिये यही मानना ठीक है कि साधकके संकल्पानुसार दोनों प्रकारसे ही परमात्माकी प्राप्ति हो सकती है। ऐसा माननेपर ही देवयान-मार्गसे गतिका वर्णन करनेवाली श्रुतिकी सार्थकता होगी और श्रुतियोंका परस्पर विरोध भी दूर हो जायगा। सम्बन्ध-पुनः उसी बातको सिद्ध करते हैं- उपपन्नस्तल्लक्षणार्थोपलब्धेलोकवत् ॥ ३ । ३ । ३० ॥ तल्लक्षणार्थोपलब्धेः = उस देवयानमार्गद्वारा ब्रह्मलोकमें जानेके उपयुक्त सूक्ष्म शरीरादि उपकरणोंकी प्राप्तिका कथन होनेसे; उपपन्नः = उनके लिये ब्रह्मलोकमे जानेका कथन युक्तिसङ्गत है; लोकवत् = लोकमे भी ऐसा देखा जाता है। व्याख्या-श्रुतिमें जहाँ साधकके लिये देवयानमार्गके द्वारा ब्रह्मलोकमें जानेकी बात कही है, उस प्रकरणमें उसके उपयोगी उपकरणोंका वर्णन भी पाया जाता है। श्रुतिमे कहा है कि यह जीवात्मा जिस सङ्कल्पवाला होता है, उस सङ्कल्पद्वारा मुख्य प्राणमे स्थित हो जाता है। मुख्य प्राण उदानवायुमे स्थित हो मन-इन्द्रियोंसे युक्त जीवात्माको उसके सङ्कल्पानुसार लोकमें जाता है। (प्र० उ० ३ । १०) इसी तरह दूसरी जगह अर्चि-अभिमानी देवतादिको प्राप्त होना कहा है। (छा० उ० ५ । १० । १, २) इस प्रकार समस्त कर्मोंका अत्यन्त अभाव हो जानेपर भी उसका दिव्य-शरीरसे सम्पन्न होना बतलाया गया है; किन्तु जिन साधकोंको शरीर रहते हुए परब्रह्म परमेश्वर प्रत्यक्ष हो जाते हैं, उनके लिये वैसा वर्णन नहीं आता (क० उ० २ । ३ । १४); अपितु उनके विषयमें श्रुतिने इस प्रकार कहा है कि-'योऽकामो निष्काम आप्तकाम आत्म- कामो न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति।' (बृह० उ० ४ । ४ । ६) अर्थात् 'जो कामनारहित, निष्काम, पूर्णकाम तथा केवल परमात्मा- को ही चाहनेवाला है, उसके प्राण ऊपरके लोकोंमें नहीं जाते। वह ब्रह्म होकर ही (यहाँ) ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है।' इसलिये यही मानना सुसंगत है कि साधकके सङ्कल्पानुसार दोनों प्रकारसे ही ब्रह्मकी प्राप्ति होती है। लोकमें भी देखा जाता है कि जिसको अपने स्थानसे कहीं अन्यत्र जाना होता है, उसके