ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 100, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र १-२ ] अध्याय १ ७९ स्वरूप परमेश्वरको ही प्राप्त करनेयोग्य कहा गया है। इस प्रकार पूरे रूपकमें सात वस्तुओंकी कल्पना हुई है। उन्हीं सातोंका वर्णन एकसे दूसरेको बलवान् बतानेमें भी होना चाहिये। वहाँ इन्द्रियोंकी अपेक्षा विषयोंको बलवान् बताया गया है। जैसे घास या चारा-दाना देखकर घोडे हठात् उस ओर आकृष्ट होते हैं; उसी प्रकार इन्द्रियाँ भी हठात् विषयोंकी ओर खिंच जाती हैं। फिर विषयोंसे परे मनकी स्थिति कही गयी है; क्योंकि यदि सारथि लगामको खींचे रक्खे तो घोडे चारा-दानाकी ओर हठात नहीं जा सकते हैं। उसके बाद मनसे परे बुद्धिका स्थान माना गया है; वही सारथि है। लगामकी अपेक्षा सारथिको श्रेष्ठ बतलाना उचित ही है, क्योंकि लगाम सारथिके ही अधीन रहती है। बुद्धिसे परे महान् आत्मा है; यह 'रथी' के रूपमें कहा हुआ जीवात्मा ही होना चाहिये। 'महान् आत्मा' का अर्थ महत्तत्त्व मान लें तो इस रूपकमें दो दोष आते हैं। एक तो बुद्धिरूप सारथिके स्वामी रथी आत्माको छोड देना और दूसरा जिसका रूपकमें वर्णन नहीं है, उस महत्तत्त्वकी व्यर्थ कल्पना करना। अत महान् आत्मा यहाँ रथीके रूपमें बताया हुआ जीवात्मा ही है। फिर महान् आत्मासे परे जो अव्यक्त कहा गया है, वह है भगवान्की मायाशक्ति। उसीका अंश कारण-शरीर है। उसे ही इस प्रसङ्गमें रथका रूप दिया गया है। अन्यथा रूपकमें रथकी जगह बताया हुआ शरीर एकसे दूसरेको श्रेष्ठ बतानेकी परम्परा- में छूट जाता है और अव्यक्त नामसे किसी अन्य तत्त्वकी अप्रासङ्गिक कल्पना करनी पडती है। अतः कारणशरीर भगवान्की प्रकृतिका अंश होनेसे उसे 'अव्यक्त' नामसे कहना अनुचित नहीं मालूम होता। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि शरीरको 'अव्यक्त' कहना कैसे ठीक होगा; क्योंकि यह तो प्रत्यक्ष ही व्यक्त है। इसपर कहते हैं— सूक्ष्मं तु तदर्हत्वात् ॥ १ । ४ । २ ॥ तु=किन्तु; सूक्ष्मम्=(इस प्रकरणमे 'शरीर' शब्दसे ) सूक्ष्म शरीर गृहीत होता है; तदर्हत्वात् =क्योंकि वही 'अव्यक्त' कहलानेके योग्य है। व्याख्या—परमात्माकी शक्तिरूप प्रकृति सूक्ष्म है, वह देखने और वर्णन करनेमें नहीं आती, उसीका अंश करणशरीर है; अतः उसको अव्यक्त कहना उचित ही है।