ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचौथा पाद सम्बन्ध—पहलेके तीन पादोंमें ब्रह्मको जगत्के जन्म आदिका कारण बताकर वेदवाक्योंद्वारा वह बात प्रमाणित की गयी। श्रुतियोंमें जहाँ-जहाँ सन्देह होता था, उन स्थलोंपर विचार करके उस सन्देहका निवारण किया गया। आकाश, आनन्दमय, ज्योति, प्राण आदि जो शब्द या नाम ब्रह्मपरक नहीं प्रतीत होते थे, जीवात्मा या जडप्रकृतिके बोधक जान पड़ते थे, उन सबको परब्रह्म परमात्मा- का वाचक सिद्ध किया गया। प्रसङ्गवश आयी हुई दूसरी-दूसरी बातोंका भी निर्णय किया गया। अब यह जिज्ञासा होती है कि वेदमें कहीं प्रकृतिका वर्णन है या नहीं? यदि है तो उसका स्वरूप क्या माना गया है? इत्यादि। इन्हीं सब ज्ञातव्य विषयोंपर विचार करनेके लिये चतुर्थ पाद आरम्भ किया जाता है। कठोपनिषद्में 'अव्यक्त' नाम आया है; वहाँ 'अव्यक्तम्' पद प्रकृतिका वाचक है या अन्य किसीका? इस शङ्काका निवारण करनेके लिये सूत्रकार कहते हैं— आनुमानिकमप्येकेषामिति चेन्न शरीररूपकविन्यस्त- गृहीतेर्दर्शयति च ॥ १ । ४ । १ ॥ चेत्=यदि कहो; आनुमानिकम्=अनुमानकल्पित जडप्रकृति; अपि= भी; एकेषाम्=किन्हींके मतमे वेदप्रतिपादित है; इति न=तो यह कथन ठीक नहीं है; शरीररूपकविन्यस्तगृहीतेः=क्योकि शरीर ही यहाँ रथके रूपकमे पड़कर 'अव्यक्त' शब्दसे गृहीत होता है। दर्शयति च=यही बात श्रुति दिखाती भी है। व्याख्या—कठोपनिषद् ( १ । ३ । ११ ) मे जो 'अव्यक्तम्' पद आया है, वह अनुमानकल्पित या सांख्यप्रतिपादित प्रकृतिका वाचक नहीं है; किन्तु आत्मा, शरीर, बुद्धि, मन, इन्द्रिय और विषय आदिकी जो रथ, रथी एवं सारथि आदिके रूपमे कल्पना की गयी है; उस कल्पनामे रथके स्थानपर शरीरको रक्खा गया है। उसीका नाम यहाँ 'अव्यक्त' है। कठोपनिषद्के इस रूपक-प्रकरणमे आत्माको रथी, शरीरको रथ, बुद्धिको सारथि, मनको लगाम, इन्द्रियोको घोड़ा और विषयोंको उन घोड़ोका चारा बताया गया है। इन उपकरणोद्वारा परमपद-